भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५७६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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सत्यत्वमुपपद्येतेति ? अत्रोच्यते - नैष दोषः, सर्वव्यवहाराणामेव प्राग्ब्रह्मात्मताविज्ञानात्सत्यत्वो- पपत्तेः, स्वप्नव्यवहारस्येव प्राक्प्रबोधात् । यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिस्तावत् प्रमाणप्रमेयफललक्षणेषु विकारेष्वनृतत्वबुद्धिर्न कस्यचिदुत्पद्यते । विकारानैव त्वहं ममेत्यविद्ययाऽऽत्मात्मीयेन भावेन सर्वो जन्तुः प्रतिपद्यते स्वाभाविकीं ब्रह्मात्मतां हित्वा । तस्मात्प्राग्ब्रह्मात्मताप्रतिबोधादुपपन्नः सर्वो लौकिको वैदिकश्च व्यवहारः। यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य जनस्य स्वप्ने उच्चावचान्भावान्पश्यतो निश्चितमेव
भामती
मोक्षशास्त्रेण इति ॐ । परिहरति ॐ अत्रोच्यते इति ॐ । यद्यपि प्रत्यक्षादीनां तात्त्विकमबाधितत्वं नास्ति, युक्त्यागमाभ्यां बाधनात्, तथापि व्यवहारे बाधनाभावात्सांव्यवहारिकमबाधनम् । नहि प्रत्यक्षादिभिरर्थं परिच्छिद्य प्रवर्त्तमानो व्यवहारे विसंवाद्यते सांसारिकः कश्चित् । तस्मादबाधनान्न प्रमाणलक्षणमतिपतन्ति प्रत्यक्षादय इति । ॐ सत्यत्वोपपत्तेः इति ॐ । सत्यत्वाभिमानोपपत्तेरिति । ग्रहणकवाक्यमेतद् , विभजते ॐ यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिः इति ॐ । विकारानैव तु शरीरादीनहमित्यात्मभावेन पुत्रपश्वादीन् ममेत्यात्मीयभावेनेति योजना । ॐ वैदिकश्च इति ॐ । कर्मकाण्डमोक्षशास्त्रव्यवहारसमर्थना । ॐ स्वप्न- व्यवहारस्येव इति विभजते ॐ यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य इति ॐ । कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेणेति यदुक्तं
भामती-व्याख्या
बात यह भी है कि इस दर्शन (वेदान्त-शास्त्र) में वर्ण (अकारादि), पद, वाक्य और प्रकरणादि की अपेक्षा है [जैसा कि न्यायवार्तिककार शास्त्र का स्वरूप बताते हुए कहते हैं—"शास्त्रं पुनः प्रमाणादिवाचकपदसमूहः, पदं पुनः वर्णसमूहः, पदसमूहः सूत्रम्, सूत्रसमूहः प्रकरणम्, प्रकरणसमूह आह्निकम्, आह्निकसमूहोऽध्यायः" (न्या० वा० १।१।१)] । अभेदवाद में तो कथित वर्ण, पदादि का भेद मिथ्या या अलीक है, अतः ऐसे शास्त्र के द्वारा उत्पादित अद्वैत-ज्ञान भी असमीचीन (अप्रमा) ही होगा, क्योंकि अलीक धूम के द्वारा उत्पादित वह्निविषयक ज्ञान समीचीन नहीं होता, भाष्यकार ने यही कहा है— "कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्यात्मैकत्वस्य सत्यत्वमुपपद्येत" ।
समाधान - उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"नैष दोषः"। यद्यपि प्रत्यक्षादि को तात्त्विक प्रमाण (अबाधितविषयक) नहीं माना जाता, क्योंकि युक्ति और आगम के द्वारा प्रत्यक्षादि का विषय बाधित हो जाता है। तथापि सांव्यावहारिक प्रामाण्य प्रत्यक्षादि का माना जाता है, क्योंकि व्यवहार-काल में उनका विषय अबाधित होता है, अन्यथा सांसारिक पुरुष की प्रत्यक्षादि के विषय में प्रवृत्ति सफल न होती, किन्तु सफल होती है। फलतः व्यवहार-काल में अबाधित अनधिगत और असन्दिग्ध विषय को अपनाने के कारण प्रत्यक्षादि प्रमाण अपने सामान्य लक्षण से विभूषित हो जाते हैं; "सत्यत्वोपपत्तेः"— इस भाष्य का अर्थ है—'सत्यत्वाभिमानोपपत्तेः' । "सर्वव्यवहाराणां प्राग् ब्रह्मात्मताविज्ञानात् सत्यत्वोपपत्तेः"—यह भाष्य ग्रहणक वाक्य (व्याख्येय भाष्य) है, उसकी व्याख्या स्वयं भाष्यकार करता है—"यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिः"। यहाँ 'आत्मात्मीयेन भावेन' का इस प्रकार विश्लिष्ट अन्वय कर लेना चाहिए—"शरीरादिविकारान् अहमिति आत्मभावेन, पुत्रपश्वादीन् ममेति आत्मीयभावेन" । शरीरेन्द्रियादि में अहं और पुत्रपश्वादि में ममभाव का अध्यास स्पष्ट करते हुए भाष्यकार ने ग्रन्थ के आरम्भ में ही कहा है—"अहंममेति लौकिको व्यवहारः" । "वैदिकश्च व्यवहारः"—इस वाक्य के द्वारा भाष्यकार ने कर्मकाण्ड तथा मोक्ष-शास्त्र का समर्थन किया है—"स्वप्नव्यवहारस्येव"—इस दृष्टान्त की