भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 593

ब्रह्मैकत्वनानात्वनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७५

इत्युपपद्यते, सम्यग्ज्ञानापनोद्यस्य कस्यचिन्मिथ्याज्ञानस्य संसारकारणत्वेनानभ्यु- पगमात् । उभयसत्यतायां हि कथमेकत्वज्ञानेन नानात्वज्ञानमपनुद्यत इत्युच्यते ? नन्वेकत्वैकान्ताभ्युपगमे नानात्वाभावात्प्रत्यक्षादीनि लौकिकानि प्रमाणानि व्याहन्येरन्निर्विषयत्वात्, स्थाण्वादिष्विव पुरुषादिज्ञानानि । तथा विधिप्रतिषेधशास्त्र- मपि भेदापेक्षत्वात्तदभावे व्याहन्येत मोक्षशास्त्रस्यापि शिष्यशास्त्रादिभेदापेक्षत्वात्त- दभावे व्याघातः स्यात् । कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्यात्मैकत्वस्य


भामती

दण्डकमण्डलु कुण्डलशालिनः कुण्डलित्वज्ञानं दण्डवत्तां कमण्डलुमत्तां वा बाधते । तत् कस्य हेतोः ? तेषां कुण्डलादीनां तस्मिन् भाविकत्वात्, तद्विहापि भाविकगोचरेणैकाम्यज्ञानेन न नानात्वं भाविकमपवद- नीयम् । नहि ज्ञानेन वस्त्वपनीयते, अपि तु मिथ्याज्ञानेनारोपितमित्यर्थः । चोदयति ॐ नन्वेकत्वैकान्ताभ्युपगमः इति ॐ । अबाधितानधिगतासन्दिग्धविज्ञानसाधनं प्रमाण- मिति प्रमाणसामान्यलक्षणोपपत्त्या प्रत्यक्षादीनि प्रमाणतामनुभवते । एकत्वैकान्ताभ्युपगमे तु तेषां सर्वेषां भेदविषयाणां बाधितत्वादप्रामाण्यं प्रसज्येत । तथा विधिप्रतिषेधशास्त्रमपि भावनाभाव्यभावककरणेति- कर्तव्यताभेदापेक्षत्वाद् व्याहन्येत । तथा च नास्तिक्यमेकदेशाक्षेपेण च सर्ववेदाक्षेपाद्वेदान्तानामप्यप्रामाण्य- मित्यभेदैकान्ताभ्युपगमहानिः । न केवलं विधिनिषेधाक्षेपेणास्य मोक्षशास्त्रस्याक्षेपः स्वरूपेणास्यापि भेदापे- क्षत्वादित्याह ॐ मोक्षशास्त्रस्यापि इति ॐ । अपि चास्मिन् दर्शने वर्णपदवाक्यप्रकरणादीनामलीकत्वात्तत्प्र- भवमद्वैतज्ञानमसभीचीनं भवेत् , न खल्वलीकाद् धूमाद् धूमकेतनज्ञानं समीचीनमित्याह ॐ कथं चानृतेन


भामती-व्याख्या

कमण्डलु और कुण्डलादि सभी कार्य वस्तुतः उत्पन्न होते हैं, अतः 'कुण्डलवदिदं काष्ठम्'— यह ज्ञान काष्ठगत कुण्डलित्व या दण्डवत्ता का बाधक नहीं। वैसे ही जीव और ब्रह्म का नानात्व (भेद) यदि वास्तविक होता, तब एकत्व-ज्ञान से उसका बाध नहीं होता, क्योंकि ज्ञान के द्वारा किसी वस्तु का अपनयन नहीं होता, अपितु मिथ्या ज्ञान के द्वारा आरोपित पदार्थों का ही बाध होता है।

शङ्का—भाष्यकार ने शङ्का उठाई है कि यदि एकान्तिक एकत्व ( अभेद ) माना जाता है, तब (१) लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाण, (२) विधि-निषेधात्मक शास्त्र एवं (३) मोक्षा- गम—ये सभी व्याहत ( बाधितविषयक ) हो जाते हैं, क्योंकि (१) जिस ज्ञान का विषय अबाधित, अनधिगत और असन्दिग्ध हो, उस ज्ञान को प्रमा और उसके साधन पदार्थ को प्रमाण कहा जाता है। इस प्रकार प्रमाण के सामान्य लक्षण से युक्त होकर ही प्रत्यक्षादि प्रमाणता की पदवी प्राप्त करते हैं किन्तु एकान्तिक एकत्व ( अभेद ) मान लेने पर उक्त प्रमाणता सुरक्षित नहीं रहती, क्योंकि वे सभी प्रमाण भेदविषयक हैं, अभेद के द्वारा भेद का बाध हो जाने से उनमें अप्रामाण्य प्रसक्त होता है। (२) विधि-निषेधात्मक शास्त्र भी भावना ( शाब्दी और आर्थी द्विविध कृति ), भाव्य ( कार्य ), भावक ( शब्दादि ), करण ( यागादि ) तथा इतिकर्त्तव्य ( करण के सहायक व्यापार ) के भेद की अपेक्षा करने के कारण भेदाभ्यु- पगम से व्याहत हो जाता है। विधि-निषेधात्मक शास्त्रों के व्याहत हो जाने से परलोकादि का अभाव एवं नास्तिक्य प्राप्त होता है। (३) वेद के विधि-निषेधात्मक एक भाग पर आक्षेप होने के कारण वेदान्तरूप मोक्षगम का भी अप्रामाण्य एवं एकान्तिक एकत्वाभ्युपगम की हानि प्रसक्त होती है। केवल विधि-निषेधात्मक भाग के आक्षेप से ही यह वेदान्तरूप मोक्ष-शास्त्र व्याहत नहीं होता, अपितु भेद-सापेक्ष होने के कारण स्वरूपतः ( साक्षात् ) बाधित होता है—"मोक्षशास्त्रस्यापि शिष्यशास्त्रादिभेदापेक्षत्वात् तदभावे व्याघातः स्यात्" । दूसरी