भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५७४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' (बृ० ४।५।१५) इत्यादिना ब्रह्मात्मत्वदर्शिनं प्रति समस्तस्य क्रियाकारकफललक्षणस्य व्यवहारस्याभावम् । न चायं व्यवहाराभावोऽवस्थाविशेषनिबद्धोऽभिधीयत इति युक्तं वक्तुम्, 'तत्त्वमसि' इति ब्रह्मात्मभावस्यानवस्थाविशेषनिबन्धनत्वात् । तस्करदृष्टान्तेन चानृताभिसंधस्य बन्धनं सत्याभिसंधस्य च मोक्षं दर्शयन्नेकत्वमेवैकं पारमार्थिकं दर्शयति' (छा० ६।१६) । मिथ्याज्ञानविजृम्भितं च नानात्वम् । उभयसत्यतायां हि कथं व्यवहारगोचरोऽपि जन्तुरनृताभिसंध इत्युच्येत ? 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' ( बृ० ४।४।१९) इति च भेददृष्टिमपवदन्नेवैतद्दर्शयति । न चास्मिन्दर्शने ज्ञानान्मोक्ष
भामती
वस्थायां बाधकान्निवर्त्तन्ते एवं तत्त्वमस्यादिवाक्यपरिभावनाभ्यासपरिपाकभुवा शारीरस्य ब्रह्मात्मभावसाक्षात्कारेण बाधकेन निवर्त्तन्ते । स्यादेतत् - 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येद्' इत्यादिना मिथ्याज्ञानाधीनो व्यवहारः क्रियाकारकादिलक्षणः सम्यग्ज्ञानेनापनीयत इति न ब्रूते, किन्त्ववस्थाभेदाश्रयो व्यवहारोऽवस्थान्तरप्राप्त्या निवर्त्तते, यथा बालकस्य कामचारवादभक्षतोपनयनप्राप्तौ निवर्त्तन्ते । न च तावतासौ मिथ्याज्ञाननिबन्धनो भवेत्येवमत्रापीत्यत आह ॐ न चायं व्यवहाराभावः इति ॐ । कुतः ? ॐ तत्त्वमसीति ब्रह्मात्मभावस्य इति ॐ । न खल्वेतद्वाक्यमवस्थाविशेषविनियतं ब्रह्मात्मभावमाह जीवस्य, अपि तु न भुजङ्गो रज्जुरियमितिवत् सनातनं तमभिभवति । अपि च सत्यानृताभिधानेनाप्येतदेव युक्तमित्याह ॐ तस्करदृष्टान्तेन च इति ॐ । ॐ न चास्मिन् दर्शने इति ॐ । नहि जातु काष्ठस्य
भामती-व्याख्या
बाध न हो, वैसे ही जीवभाव का जब तक बाध नहीं होता, तब तक स्वाप्न व्यवहार के समान समस्त वैदिक और लौकिक व्यवहार प्रवृत्त हो जाता है। जाग्रद् बाध जैसे स्वप्नावस्था का बाधक और स्वाप्न व्यवहार का निवर्त्तक हो जाता है, वैसे ही "तत्त्वमसि"—आदि महावाक्यों के श्रवणादिरूप अभ्यास-परम्परा की परिपक्व अवस्था में समुत्पन्न ब्रह्मभावविषयक साक्षात्काररूप बाधक अज्ञान और उसके व्यवहार का निवर्तक हो जाता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्" (बृह० उ० ४।५।१५) ।
शङ्का—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्"—यह श्रुति यह नहीं कहती है कि 'क्रिया, कारकादि समस्त व्यवहार मिथ्याज्ञान-प्रयुक्त है, सम्यक् ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का बाध हो जाने पर उक्त व्यवहार निवृत्त हो जाता है'। किन्तु उक्त श्रुति यह व्यवस्था देती है कि प्रत्येक अवस्था का व्यवहार भिन्न है, एक अवस्था का व्यवहार दूसरी अवस्था के प्राप्त होने पर निवृत्त हो जाता है, जैसे उपनयन संस्कार से पहले बालक का किसी के घर भी खा-पी लेना आदि ऐच्छिक व्यवहार यज्ञोपवीत हो जाने पर निवृत्त हो जाता है। इतने मात्र से उस ऐच्छिक व्यवहार को भ्रममात्र नहीं माना जा सकता। वैसे ही संसारावस्था में आत्मा का समस्त लौकिक और वैदिक व्यवहार सत्य होने पर भी मोक्षावस्था में निवृत्त हो जाता है, उसे मिथ्याज्ञान-प्रयुक्त मानने की क्या आवश्यकता ?
समाधान—भाष्यकार उस शङ्का का निरास करते हुए कहते हैं कि "व्यवहाराभावोऽवस्थाविशेषनिबद्धः", क्योंकि "तत्त्वमसीति ब्रह्मात्मभावस्यानवस्थाविशेषनिबद्धः"। अर्थात् "तत्त्वमसि"—यह वाक्य किसी अवस्था-विशेष के लिए ही जीव में ब्रह्मरूपता का बोधक नहीं, अपितु 'न भुजङ्गः, रज्जुरियम्'—यह वाक्य जैसे सनातन रज्जुरूपता का बोधक है, वैसे ही सार्वदिक ब्रह्मरूपता का अभिधान करता है। जैसे काष्ठरूप कारण में दण्ड,