भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

सांख्यादितर्कनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५९

प्रतिषिद्धः । तस्मात्समञ्जसमिदमौपनिषदं दर्शनम् ॥ ९ ॥

स्वपक्षदोषाच्च ॥ १० ॥

स्वपक्षे चैते प्रतिवादिनः साधारणा दोषाः प्रादुःष्युः । कथमिति ? उच्यते— यत्तावदभिहितं-विलक्षणत्वाच्चेदं जगद् ब्रह्मप्रकृतिकमिति, प्रधानप्रकृतिकतायामपि समानमेतत्, शब्दादिहीनात्प्रधानाच्छब्दादिमतो जगत उत्पत्त्युपगमात् । अत एव च विलक्षणकार्योत्पत्त्युपगमात्समानः प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यवादप्रसङ्गः। तथाऽपीतौ कार्यस्य कारणाविभागाभ्युपगमात्तद्वत्प्रसङ्गोऽपि समानः । तथा मृदितसर्वविशेषेषु विकारेष्वपीतावभागात्मतां गतेष्विदमस्य पुरुषस्योपादानमिदमस्येति प्राक्प्रलयात्प्रतिपुरुषं ये नियता भेदाः, न ते तथैव पुनरुत्पत्तौ नियन्तुं शक्यन्ते, कारणाभावात् । विनैव कारणेन नियमेऽभ्युपगम्यमाने कारणाभावसाम्यान्मुक्तानामपि पुनर्बन्धप्रसङ्गः । अथ केचिद्भेदा अपीतावविभागमापद्यन्ते केचिन्नोति चेत्—ये नापद्यन्ते तेषां प्रधानकार्यत्वं न प्राप्नोतीत्येवमेते दोषाः साधारणत्वान्नान्यतरस्मिन् पक्षे चोदयितव्या भवन्तीत्यदोषतामेवैषां द्रढयति, अवश्य्याश्रयितव्यत्वात् १०॥

भामती

मिथ्याज्ञानस्य समूलघातं निहतत्वादिति ॥ ९ ॥

कार्यकारणयोर्वैलक्षण्यं तावत्समानमेवोभयोः पक्षयोः, प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यवादप्रसङ्गोऽपीतो तद्वत्प्रसङ्गश्च प्रधानोपादानपक्ष एव नास्मत्पक्ष इति यद्यप्युपरिष्टात्प्रतिपादयिष्यामस्तथापि गुडजिह्विकया समानत्वापादनमिदानीमिति मन्तव्यमिदमस्य पुरुषस्य सुखदुःखोपादानं क्लेशकर्माशयादीदमस्येति । सुगममन्यत् ॥ १० ॥


भामती-व्याख्या

ब्रह्म से पृथक् जगत् की कभी भी स्वतन्त्र सत्ता मानी ही नहीं जाती ॥ ९ ॥

कार्य और कारण के सारूप्य का न होना—यह दोष तो ब्रह्मवाद और सांख्य-सम्मत प्रकृतिवाद—इन दोनों मतों में समान है। किन्तु उत्पत्ति के पूर्व असत्कार्यवाद का प्रसङ्ग और विलय हो जाने के पश्चात् पूर्ववत् कार्य की अनुत्पत्ति—ये दोनों दोष केवल प्रकृतिवाद में ही हैं, हमारे ब्रह्मवाद में नहीं। यद्यपि यह सब कुछ आगे चल कर कहा जायगा, तथापि यहाँ जो भाष्यकार ने सभी दोषों का प्रसङ्ग दोनों पक्षों में समानरूप से कहा है, वह 'गुड़जिह्विका' न्याय को लेकर कहा है [ बच्चे को कटु औषध पिलाने के लिए पहले उसकी जिह्वा पर गुड़ लगा दिया जाता है, उसके पश्चात् चिरायता, नीम या करेले का रस पिला दिया जाता है—इसी का नाम गुड़जिह्विका है। कटूक्ति से पहले मधुरोक्ति का प्रयोग सूत्रकारादि भी किया करते थे, जैसे पूर्वपक्ष का खण्डन करने के लिए सीधे 'न' या 'तुच्छम्' न कह कर 'अपिवा' या केवल 'वा' का मधुर प्रयोग करते थे, अत एव कल्पतरुकार ने आगे (ब्र. सू. ३।१।८ में) चलकर कहा है—"गुडजिह्विका मधुरोक्तिः, नैव युक्तमित्युक्ते नैष्ठुर्यं स्यादिति"। फलतः वेदान्ती के "तव पक्षे एवेमे दोषाः, नास्माकम्"—ऐसा कह देने पर लोग तालियाँ पीट देते और सांख्याचार्य का मर्मस्थल आहत हो जाता, अतः भाष्यकार ने कह दिया—"समानमेतत्"। समान दोषोद्भावन जय-पराजय का स्थान नहीं होता, जैसा कि कुमारिल भट्ट निर्णय देते हैं—

तस्माद् ययोः समो दोषः परिहारोऽपि वा समः ।
नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ॥ (श्लो. वा. पृ. ३४१) ] ।

भाष्यकार ने जो कहा है—"इदमस्य पुरुषस्योपादानम्, इदमस्य"। उसका अर्थ है—'इदं