भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअद्वैतस्य स्रष्टृत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६०१
उपसंहारदर्शनात्। इह हि लोके कुलालादयो घटपटादीनां कर्तारो मृद्दण्डचक्रसूत्रसलिलाद्यनेककारकसाधनोपसंहारेण संगृहीतसाधनाः सन्तस्तत्तत्कार्यं कुर्वाणा दृश्यन्ते । ब्रह्म चासहायं तवाभिप्रेतं, तस्य साधनान्तरानुपसंग्रहे सति कथं स्रष्टृत्वमुपपद्येत ? तस्मान्न ब्रह्म जगत्कारणमिति चेत्, नैष दोषः, यतः क्षीरवद् द्रव्यस्वभावविशेषादुपपद्यते । यथा हि लोके क्षीरं जलं वा स्वयमेव दधिहिमकरकादिभावेन परिणमतेऽनपेक्ष्य बाह्यं साधनं, तथेहापि भविष्यति । ननु क्षीराद्यपि दध्यादिभावेन परिणममानमपेक्षत एव बाह्यं साधनमौष्ण्यादिकं, कथमुच्यते क्षीरवदिति ? नैष दोषः, स्वयमपि हि क्षीरं यां च यावतीं च परिणाममात्रामनुभवति तावत्येव त्वर्यते त्वौष्ण्यादिना दधिभावाय । यदि च स्वयं दधिभावशीलता न स्यान्नैवौष्ण्यादिनापि बलाद्दधिभावमापद्येत । नहि वायुराकाशो वौष्ण्यादिना बलाद्दधिभावमापद्यते । साधनसामग्र्या च तस्य पूर्णता संपाद्यते । परिपूर्णशक्तिकं तु ब्रह्म । न तस्यान्येन केनचित्पूर्णता संपादयितव्या । श्रुतिश्च भवति—'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते
भामती
क्षेपाद्योगाद् द्वितीयतया च क्रमवत्तत्सहकारिसमवधानानुपपत्तेः । तदिदमुक्तम् ॐ इह हि लोके इति ॐ । एकैकं मृदादि कारकं, तेषां तु सामग्र्यं साधनम्, ततो हि कार्यं साधयत्येव, तस्मान्नाद्वितीयं ब्रह्म जगदुपादानमिति प्राप्ते, उच्यते—"क्षीरवद्धि"। इदं तावद्ब्रूवान् पृष्टो व्याचष्टां, किं तात्त्विकमस्य रूपमपेक्ष्येदमुच्यते उतानादिनामरूपबीजसहितं काल्पनिकं सार्वज्ञ्यं सर्वशक्तित्वम् ? तत्र पूर्वस्मिन् कल्पे किं नाम ततोऽद्वितीयादसहायादुपजायते ? नहि तस्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावस्य वस्तुसत्कार्यमस्ति, तथा च श्रुतिः—"न तस्य कार्यं करणञ्च विद्यते" इति । उत्तरस्मिंस्तु कल्पे यदि कुलालादिवदत्यन्तव्यतिरिक्त-
भामती-व्याख्या
विचित्र प्रपञ्च का उपादान कारण माना गया है, वह युक्ति-सङ्गत नहीं, क्योंकि विचित्र कारण से ही विचित्र कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है, एकरूप (अविचित्र) कारण से नानारूप कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती। यदि होगी, तब उसमें आकस्मिकत्व (अकारणकत्व) प्रसक्त होगा, क्योंकि कारण का भेद ही कार्य के भेद का हेतु है, जैसे दूध और बीजरूप विभिन्न कारणों से उत्पन्न होने के ही कारण दधि और अंकुररूप कार्यों का भेद देखा जाता है। आकाश की उत्पत्ति के समय वायु आदि की उत्पत्ति क्यों नहीं हुई ? इस प्रश्न का समुचित उत्तर विभिन्न कारणवादी ही दे सकता है कि 'उनके कारण भिन्न-भिन्न हैं, जिस क्रम से कारण उपस्थित होते गए, उसी क्रम से कार्य उत्पन्न होते गये'। किन्तु एक, अद्वितीय ब्रह्म को समस्त कार्य-सक्षम माननेवाला उस प्रश्न का उत्तर क्या देगा ? एक काल में ही समस्त कार्य उत्पन्न होना चाहिए, क्योंकि सर्व-सक्षम कारणतत्त्व की क्षमता का न तो अवरोध या निलम्बन किया जा सकता है और न एक कारण में क्रम बिठाया जा सकता है, भाष्यकार यही कह रहे हैं—"इह हि लोके कुलालादयो घटादीनां कर्त्तारः।" भाष्यकार ने प्रत्येक मृदादि को 'कारक' एवं मृत, दण्ड, चक्र, कुलालादि के समुच्चय को 'साधन' पद से निर्दिष्ट किया है, क्योंकि कर्त्ता आदि कारकों का समुच्चय होने पर कार्य की सिद्धि हो ही जाती है। फलतः अद्वितीय ब्रह्म जगत् का उपादान नहीं हो सकता ।
सिद्धान्त —सूत्रकार ने 'क्षीरवद्धि' ऐसा कह कर सिद्धान्त स्थापित किया है। सारांश यह है कि पूर्वपक्षी से यह पूछा जा सकता है कि उसने क्या तात्त्विक (शुद्ध) ब्रह्म में अनुपादानत्व की प्रसक्ति की है ? अथवा अनादि नाम-रूप-बीज-सहित (विशिष्ट) ब्रह्म में ? प्रथम कल्प में तो इष्टापत्ति है, क्योंकि शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप ब्रह्म का वस्तुतः कोई कार्य
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