भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६०२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. २५ |
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न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान- बलक्रिया च।' (श्वे० ६।८) इति। तस्मादेकस्यापि ब्रह्मणो विचित्रशक्तियोगात्क्षी- रादिविचित्रपरिणाम उपपद्यते ॥ २४ ॥
देवादिवदपि लोके ॥ २५ ॥
स्यादेतत् - उपपद्यते क्षीरादीनामचेतनानामनपेक्ष्यापि बाह्यं साधनं दध्यादि- भावः, दृष्टत्वात्। चेतनाः पुनः कुलालादयः साधनसामग्रीमपेक्ष्यैव तस्मै तस्मै कार्याय प्रवर्तमाना दृश्यन्ते। कथं ब्रह्म चेतनं सदसहायं प्रवर्तेतेति ? देवादिवदिति
भामती
सहकारिकारणाभावादनुपादानत्वं साध्यते, ततः क्षीरादिभिर्व्यभिचारः, तेऽपि हि बाह्यचेतनादिकारणान- पेक्षा एव कालपरिवासवशेन स्वत एव परिणामान्तरमासादयन्ति। अथान्तरकारणानपेक्षत्वं हेतूक्रियते, तदसिद्धमनिर्वच्यनामरूपबीजसहायत्वात्। तथा च श्रुतिः—"मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनन्तु महेश्वर- म्" इति। कार्यक्रमेण तत्परिपाकोऽपि क्रमवानुन्नेयः। एकस्मादपि च विचित्रशक्तेः कारणादनेक- कार्योत्पादो दृश्यते। यथैकस्मादग्नेर्दाहपाकावेकस्माद्वा कर्मणः संयोगविभागसंस्काराः ॥ २४ ॥
यदि तु चेतनत्वे सतीति विशेषणान्न क्षीरादिभिर्व्यभिचारः, दृष्टा हि कुलालादयो बाह्यमृदाद्य- पेक्षाश्चेतनश्च ब्रह्मेति, तत्रेवमुपतिष्ठते ॐदेवादिवद् इतिॐ लोक्यतेऽनेनेति लोकः शब्द एव तस्मिन् ॥२५॥
भामती-व्याख्या
माना ही नहीं जाता, जैसा कि श्रुति कहती है—"न तस्य कार्यं करणं च विद्यते" (श्वेता० ६।८)। द्वितीय कल्प में यदि कुलालादि के समान अत्यन्त भिन्न सहकारी कारण का अभाव होने से ब्रह्म में अनुपादानत्व सिद्ध किया जाता है—'ब्रह्म जगतोऽनुपादानम्, कुलालादि-वत्सहायकाभावात्। तब तो दुग्धादि में व्यभिचार है, क्योंकि चेतनादि बाह्य सामग्री के अभाव में भी दुग्धादि दध्यादिरूप कार्य के उपादान होते हैं। 'ब्रह्म जगतोऽनुपादानम्, आन्तरिककारणानपेक्षत्वात्'—इस प्रकार यदि आन्तर कारण (सहायक) के अभाव को हेतु बनाया जाता है, तब वह स्वरूपासिद्धिीरूप दोष से युक्त होकर हेत्वाभास हो जाता है, हेत्वाभास से साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती। ब्रह्म की आन्तरिक सहायक सामग्री का प्रतिपादन श्रुति करती है-"मायां तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनं तु महेश्वरम्” (श्वेता. ४।१०)। यद्यपि माया में सर्वकार्योत्पादन का सामर्थ्य है, तथापि मायागत संस्काररूप बीजों का परिपाक (कार्यकरणोन्मुखत्व) जिस-क्रम से होता है, उसी क्रम से कार्यों की क्रमशः उत्पत्ति होती है। यह जो कहा गया कि एकरस (अविचित्र) कारण से विचित्र कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती। वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि विचित्र शक्ति-सम्पन्न एक कारणतत्त्व से भी अनेक और विचित्र कार्य होते देखे जाते हैं, जैसे कि एक ही अग्नि से दाह, पाक और प्रकाशादि एक ही क्रिया से संयोग, विभाग और संस्कारादि अनेक कार्य उत्पन्न होते हैं ॥ २४ ॥
यदि 'ब्रह्म न जगतोऽनुपादानम्, चेतनत्वे सत्यसहायत्वात्'—इस प्रकार हेतु का 'चेतनत्व' विशेषण लगाया जाता है, तब क्षीरादि जड़ पदार्थों में व्यभिचार न होने पर भी देवों, पितरों और ऋषियों में व्यभिचार होता है—"देवादिवदपि लोके"। लोक्यते प्रकाश्यतेऽनेन'— इस व्युत्पत्ति के द्वारा 'लोक' पद से शब्द विवक्षित है, अर्थात् मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास और पुराणादिरूप शब्दों में देवादि का ऐसा ऐश्वर्य वर्णित है कि वे किसी बाह्य सामग्री के विना ही अनेक शरीर, महल और रथादि का निर्माण कर देते हैं ॥ २५ ॥