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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

निरवयवस्य स्रष्टृत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६०७

इत्यभिप्रायः, तास्तु ब्रह्मवादिनोऽप्यविशिष्टाः । तथाणुवादिनोऽप्यणुरण्वन्तरेण संयुज्यमानो निरवयवत्वाद्वदि कात्स्न्र्येन संयुज्येत, ततः प्रथिमानुपपत्तेरणुमात्रत्व- प्रसङ्गः । अथैकदेशेन संयुज्येत, तथापि निरवयवत्वाभ्युपगमकोप इति स्वपक्षेऽपि समान एष दोषः । समानत्वाच्च नान्यतरस्मिन्नेव पक्ष उपक्षेप्तव्यो भवति । परिहृतस्तु ब्रह्मवादिना स्वपक्षे दोषः ॥ २९ ॥


भामती

परिणामे वा सावयवत्वमनिष्टं प्रसज्येत । ॐ तथाणुवादिनोऽपि इति ॐ । वैशेषिकाणां ह्यणुभ्यां संयुज्य द्व्यणुकमेकमारभ्यते, तैस्त्रिभिर्द्व्यणुकैस्त्र्यणुकमेकमारभ्यत इति प्रक्रिया । तत्र द्वयोरण्वोरनवयवयोः संयोगस्तावन्न व्याप्यानव्याप्नुवन्वा तत्र न वर्त्तेत । नह्यस्ति सम्भवः स एव तदानीं तत्र वर्त्तते न वर्त्तते चेति । तथा चोपर्यधःपार्श्वस्थाः षडपि परमाणवः समानदेशा इति प्रथिमानुपपत्तेरणुमात्रः पिण्डः प्रसज्येत । अव्यापने वा षडवयवः परमाणुः स्यादित्यनवयवत्वव्याकोपः । अशक्यञ्च सावयवत्वमुपेतुं, तथा सत्यनन्तावयवत्वेन सुमेरुराजसर्षपयोः समानपरिणामत्वप्रसङ्गः, तस्मात् समानो दोषः । आपा- तमात्रेण साम्यमुक्तं परमार्थतस्तु भाविकं परिणामं वा कार्यकारणभावं वेच्छतामेष दुर्वारो दोषो न पुनरस्माकं मायावादिनामित्याह ॐ परिहृतस्तु इति ॐ ॥ २९ ॥


भामती-व्याख्या

और यदि उसका अवयवशः परिणाम माना जाता है, तब सावयवत्व की आपत्ति होती है, जो कि अनिष्ट है ।

"तथाऽणुवादिनोऽपि"— इस भाष्य के द्वारा वैशेषिक-पक्ष में भी समानदोषता की प्रसक्ति की गई है, क्योंकि उनके मत की प्रक्रिया यह है कि दो परमाणु परस्पर संयुक्त होकर एक द्व्यणुक और तीन द्व्यणुक संयुक्त होकर एक त्र्यणुक आरम्भ करते हैं । वहाँ निरवयव- भूत दो परमाणुओं का संयोग दोनों परमाणुओं एवं एक परमाणु का अपनी ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे की ) छहों दिशाओं में विद्यमान छः परमाणुओं के साथ संयोग सभी परमाणुओं को व्याप्त करेगा । व्याप्त किए विना संयोग सम्भव नहीं, क्योंकि व्याप्त न करने का अर्थ है—सम्बन्धित न होना और संयुक्त होने का अर्थ—सम्बन्धित होना है । दोनों विरुद्ध घटनाएँ एक साथ घटित नहीं हो सकतीं । विभिन्न देशों ( छः दिशाओं ) में विद्यमान परमाणुओं से संयुक्त परमाणु के छः अवयव मानने होगे । इस सावयवत्वापत्ति से बचने के लिए यह मानना होगा कि द्व्यणुक-निर्माणार्थ जिन दो परमाणुओं एवं त्र्यणुक- रचनार्थ जिन छः परमाणुओं या तीन द्व्यणुकों का संयोग माना जाता है, वे सभी परमाणु एक ही देश में विद्यमान हैं । तब द्व्यणुक और त्र्यणुकादि सभी पिण्ड अणु परिमाण के ही रहेंगे, उनका मध्यम या महत्परिमाण न हो सकेगा, जैसा कि आचार्य वसुबन्धु कहते हैं—

षट्केन युगपद् योगात् परमाणोः षडंशता ।
षण्णां समानदेशत्वे पिण्डः स्यादणुमात्रकः ॥ (विंशति० १२)

इस प्रकार वैशेषिकों के पक्ष में परमाणु को सावय मानना सम्भव नहीं, निरवयव परमाणु का समग्रतया संयोग मानने पर प्रथिमा (महत्परिमाण) उपपन्न नहीं होती और अवयवशः संयोग मानने पर सावयवत्वापत्तिरूप समान दोष प्रसक्त होता है । अनन्त अवयव-परम्परा मानने पर सुमेरु पर्वत और सरसों के एक दाने का समान परिमाण का प्रसङ्ग दिखाया जा चुका है । भाष्यकार ने यहाँ पर सिद्धान्तों में दोष-साम्य का अभिधान आपाततः ही कर दिया है, वस्तुतः जो लोग परिणामवाद और आरम्भवाद को पारमार्थिक मानते हैं, उन्हीं