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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 639 में से

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पृष्ठ 627
लीलामात्रं सृष्टिः ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्६०९

श्रुत्यवगाह्यमेवेदमतिगम्भीरं ब्रह्म न तर्कावगाह्यम् । नच यथैकस्य सामर्थ्यं दृष्टं तथाऽन्यस्यापि सामर्थ्येन भवितव्यमिति नियमोऽस्तीति । प्रतिषिद्धसर्वविशेषस्यापि ब्रह्मणः सर्वशक्तियोगः संभवतीत्येतदप्यविद्याकल्पितरूपभेदोपन्यासेनोक्तमेव । तथा च शास्त्रम् — 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' (श्वे० ३।१९) इत्यकरणस्यापि ब्रह्मणः सर्वसामर्थ्ययोगं दर्शयति ॥ ३१ ॥

( ११ नप्रयोजनवत्त्वाधिकरणम् । सू० ३२--३३ )

न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ ३२ ॥

अन्यथा पुनश्चेतनकर्तृत्वं जगत आक्षिपति । न खलु चेतनः परमात्मेदं जगद्विम्बं विरचयितुमर्हति कुतः ? प्रयोजनवत्त्वात्प्रवृत्तीनाम् । चेतनो हि लोके बुद्धिपूर्वकारी पुरुषः प्रवर्तमानो न मन्दोपक्रमामपि तावत्प्रवृत्तिमात्मप्रयोजनानुपयोगिनीमारभमाणो दृष्टः, किमुत गुरुतरसंरम्भाम् ? भवति च लोकप्रसिद्धद्यनुवादिनी श्रुतिः — 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृह० २।४।५) इति । गुरुतरसंरम्भा चेयं प्रवृत्तिर्यदुच्चावचप्रपञ्चं जगद्विम्बं विरचयितव्यम् । यदीयमपि प्रवृत्तिश्चेतनस्य परमात्मन आत्मप्रयोजनोपयोगिनी परिकल्प्येत परितृप्तत्वं

भामती

न तावदुन्मत्तवदस्य मतिविभ्रमाज्जगत्प्रक्रिया, भ्रान्तस्य सर्वज्ञत्वानुपपत्तेः । तस्मात् प्रेक्षावतानेन जगत् कर्तव्यम् । प्रेक्षावतश्च प्रवृत्तिः स्वपरहिताहितप्राप्तिपरिहारप्रयोजना सती नाप्रयोजनाल्पायासापि सम्भवति, किं पुनरपरिमेयानेकविधोच्चावचप्रपञ्चजगद्विम्बविरचना महाप्रयासा । अत एव लीलापि परास्ता । अल्पायाससाध्या हि सा न चेयमप्यप्रयोजना, तस्या अपि सुखप्रयोजनवत्त्वात्तदर्थ्येन वा प्रवृत्तौ

भामती-व्याख्या

नहीं की जा सकती । [ न्यायसूत्रकार ने अनुमानों के तीन भेद बताए हैं — 'पूर्ववत्, शेषवत्, सामान्यतोदृष्टं च' (न्या. सू. १।१।५) । इनमें किन्हीं दो विशेष धर्मों का कहीं सहचार देख कर सामान्य धर्म के द्वारा अनुमान करना सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहलाता है, जैसे भौतिक प्राणियों में स्रष्टृत्व और शरीरित्व का सहचार देख कर 'स्रष्टृत्व' हेतु के द्वारा शरीरित्व का अनुमान — 'ईश्वरः शरीरी, जगत्स्रष्टृत्वात्, कुलालादिवत्' । यह अनुमान आगम प्रमाण से बाधित है — 'अशरीरं शरीरेषु' (कठो. १।२।२१) ] ॥ ३०-३१ ॥

संशय — सर्वथा परितृप्त और निष्काम स्रष्टा का जगत्सृजन युक्ति-विरुद्ध है ? अथवा नहीं ?

पूर्वपक्ष — निष्काम ब्रह्म जगत् की रचना यदि वैसे ही करता है, जैसे कोई उन्मत्त (विक्षिप्त) व्यक्ति अपने मति-विभ्रम से कुछ बना डालता है, तब वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता अतः ईश्वर को वैसे ही जगत् का सर्जन करना चाहिए, जैसे प्रेक्षावान् (प्रज्ञावान्) पुरुष कार्य करता है । प्रज्ञाशील पुरुष की प्रवृत्ति सदैव सभी के हित की प्राप्ति एवं अहित की निवृत्ति को ध्यान में रख कर ही होती है, उसकी प्रवृत्ति का लेशमात्र भी निष्प्रयोजन नहीं होता । जगद्रचना-जैसी महनीय एवं अनन्त उच्चावच विविधताओं और विषमताओं से परिपूर्ण रचना निष्प्रयोजन नहीं हो सकती । अत एव इसे किसी की लीला या क्रीड़ा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि क्रीड़ा के लिए इतने बड़े प्रयास (प्रयत्न) की अपेक्षा नहीं होती । दूसरी बात यह भी है कि क्रीड़ा भी निरर्थक नहीं होती, उसका मनोरञ्जनादि-जनित सुख-

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