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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 628

६१० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. ३२

परमात्मनः श्रूयमाणं बाध्येत । प्रयोजनाभावे वा प्रवृत्त्यभावोऽपि स्यात् । अथ चेतनोऽपि सन्नुन्मत्तो बुद्ध्यपराधादन्तरेणात्मारम्भप्रयोजनं प्रवर्त्तमानो दृष्टस्तथा परमा- त्मापि प्रवर्तिष्यत इत्युच्येत, तथा सति सर्वज्ञत्वं परमात्मनः श्रूयमाणं बाध्येत । तस्मादश्लिष्टा चेतनात्सृष्टिरिति ॥ ३२ ॥

लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥ ३३ ॥

तुशब्देनाक्षेपं परिहरति । यथा लोके कस्यचिदाप्तैषणस्य राज्ञो राजामात्यस्य वा व्यतिरिक्तं किंचित्प्रयोजनमनभिसंधाय केवलं लीलारूपाः प्रवृत्तयः क्रीडाविहारेषु भवन्ति, यथा चोच्छ्वासप्रश्वासादयोऽनभिसंधाय बाह्यं किंचित्प्रयोजनं स्वभावादेव सम्भवन्ति, एवमीश्वरस्याप्यनपेक्ष्य किंचित्प्रयोजनान्तरं स्वभावादेव केवलं लीला- रूपा प्रवृत्तिर्भविष्यति । न हीश्वरस्य प्रयोजनान्तरं निरूप्यमाणं न्यायतः श्रुतितो वा सम्भवति । न च स्वभावः पर्यन्ुयोक्तुं शक्यते । यद्यप्यस्माकमियं जगद्विम्बविरचना


भामती

तदभावे कृतार्थत्वानुपपत्तेः परेषां चोपकार्याणामभावेन तदुपकाराय अपि प्रवृत्तेरयोगात् । तस्मात् प्रेक्षावत्प्रवृत्तिः प्रयोजनवत्तया व्याप्ता तदभावेऽनुपपन्ना ब्रह्मोपादानतां जगतः प्रतिक्षिपतिरिति प्राप्तम् ॥ २ ॥

एवं प्राप्तेऽभिधीयते— लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ।

भवेदेतदेवं यदि प्रेक्षावत्प्रवृत्तिः प्रयोजनवत्तया व्याप्ता भवेत्तत्तन्निवृत्तौ निवर्तेत, शिंशपात्वमिव वृक्षतानिवृत्तौ, न त्वेतदस्ति प्रेक्षावतामननुसंहितप्रयोजनानामपि यादृच्छिकीषु क्रियासु प्रवृत्तिदर्शनात् । अन्यथा 'न कुर्वीत वृथा चेष्टाम्' इति धर्मसूत्रकृतां प्रतिषेधो निर्विषयः प्रसज्येत । न चोन्मत्तान् प्रत्येतत् सूत्रमर्थवत्तेषां तदर्थबोधतदनुष्ठानानुपपत्तेः । अपि चादृष्टहेतुकोत्पत्तिका श्वासप्रश्वासलक्षणा प्रेक्षावतां


भामती-व्याख्या

प्राप्ति प्रयोजन होता है । जगद्रचना का सुख-प्राप्ति भी प्रयोजन नहीं हो सकता, क्योंकि जगत् की उत्पत्ति से पहले सुख का भी अभाव होता है । जिन प्राणियों का हित-साधन करने के लिए जगद्रचना अभिलषित है, उनका भी पहले अभाव होता है, अतः परोपकारार्थ भी प्रपञ्च-रचना सम्भव नहीं । फलतः प्रज्ञाशील पुरुष की प्रवृत्ति प्रयोजनवत्ता से व्याप्त होती है, अतः प्रयोजन के अभाव में प्रवृत्ति उपपन्न नहीं हो सकती । इस प्रकार जगद्रचना की प्रवृत्ति अनुपपन्न होकर ब्रह्मगत जगदुपादानत्व का निराकरण कर देती है ॥ ३२ ॥

सिद्धान्त—सूत्रकार ने "लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्" कह कर सिद्धान्त की स्थापना करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रेक्षावान् पुरुष की प्रवृत्ति प्रयोजनवत्ता से व्याप्त होती, तब अवश्य ब्रह्मगत जगत्कर्तृत्व पर आघात आ सकता था कि व्यापकीभूत प्रयोजन- वत्ता की निवृत्ति से ब्रह्मनिष्ठ जगदुपादानता की निवृत्ति वैसे ही हो जाती, जैसे वृक्षत्व की निवृत्ति हो जाने से शिंशपात्व की निवृत्ति हो जाती है, किन्तु प्रज्ञावान् पुरुषों की भी कुछ प्रवृत्तियाँ बिना उद्देश्य एवं बिना प्रयोजन की देखी जाती हैं । यदि ऐसा न हो, तब निष्प्रयोजन प्रवृत्ति पर धर्म-शास्त्रकार ऐसा अंकुश न लगाते—"न कुर्वीत वृथा चेष्टाम्" (मनु. ४।६३) । उन्मत्त व्यक्तियों की प्रवृत्ति को रोकने के लिए उक्त मनु-वचन की सार्थकता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इस वचन के द्वारा भी उन्हें व्यर्थ चेष्टा से उपरत नहीं किया जा सकता, उन्हें न तो इस वचन का अर्थ-बोध होगा और न वे इस आज्ञा का पालन ही करेंगे ।

दूसरी बात यह भी है कि प्रेक्षावान् व्यक्तियों की भी श्वास-प्रश्वास क्रिया ऐसी है, जो बिना किसी प्रयोजन के केवल अदृष्टानुप्राणित हो स्वभावतः ही सञ्चारित है । 'चेतनात्मा

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