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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 629

लीलामात्रं सृष्टिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६११

गुरुतरसंरम्भेवाभाति, तथापि परमेश्वरस्य लीलैव केवलमेयम्, अपरिमितशक्तित्वात् । यदि नाम लोके लीलास्वपि किञ्चित्सूक्ष्मं प्रयोजनमुत्प्रेक्ष्येत, तथापि नैवात्र किंचित् प्रयोजनमुत्प्रेक्षितुं शक्यते, आप्तकामश्रुतेः । नाप्यप्रवृत्तिरुन्मत्तप्रवृत्तिर्वा; सृष्टिश्रुतेः, सर्वज्ञश्रुतेश्च । न चेयं परमार्थविषेया सृष्टिश्रुतिः, अविद्याकल्पितनामरूपव्यवहारगो-

भामती

क्रिया प्रयोजनानुसन्धानमन्तरेण दृष्टा न चास्यां चेतनस्यापि चैतन्यमनुपयोगि, सम्प्रसादेऽपि भावादिति युक्तं प्राज्ञस्यापि चैतन्याप्रच्युतेरन्यथा मृतशरीरेऽपि श्वासप्रश्वासप्रवृत्तिप्रसङ्गात् । यथा च स्वार्थपरार्थ-सम्पदासादितसमस्तकामानां कृतकृत्यतयाऽनाकुलमनसामकामानामेव लीलामात्रात्स्वध्यमुनिष्पादिनि प्रयोजने नैव तदुद्देशेन प्रवृत्तिरेवं ब्रह्मणोऽपि जगत्सर्जने प्रवृत्तिर्नोपपन्ना । दृष्टञ्च यदल्पबलवीर्यबुद्धी-नामशक्यमतिदुष्करं वा तदन्येषामनल्पबलवीर्यबुद्धीनां सुशकमीषत्करं वा न हि वानरैर्मारुतिप्रभृतिभि-र्लङ्घेनं बद्धो नीरनिधिरगाधो महासत्त्वानाम् । न चैष पार्थेन शिलीमुखेनं बद्धो न चायं न पीतः संक्षिप्य चुलुकेन हेलयेव कलशयोनिना महामुनिना । न चाद्यापि न दृश्यन्ते लीलामात्रविनिर्मितानि महाप्रासाद-प्रमदवनानि श्रीमन्मृगनरेन्द्राणामन्येषां मनसापि दुष्कराणि नरेश्वराणाम् । तस्मादुपपन्नं यदृच्छया वा स्वभावाद्वा लीलया वा जगत्सर्जनं भगवतो महेश्वरस्येति । अपि च नेयं पारमार्थिकी सृष्टिये॑नानुयुज्येत प्रयोजनम्, अपि त्वनाद्यविद्यानिबन्धना, अविद्या च स्वभावत एव कार्यान्मुखी न प्रयोजनमपेक्षते, नहि द्विचन्द्रालातचक्रगन्धर्वनगरादिविभ्रमाः समुद्दिष्टप्रयोजना भवन्ति । न च तत्कार्या विस्मयभयकम्पादयः स्वोत्पत्तौ प्रयोजनमपेक्षन्ते । सा च चैतन्यविविच्छुरिता जगदुत्पादहेतुरिति चेतनो जगद्योनिरित्याप्यंत इत्याह ॐ न चेयं परमार्थविषया इति ॐ । अपि च न ब्रह्म जगत्कारणमपि तत्त्वया विवक्षन्त्यागमा अपि तु

भामती-व्याख्या

का चैतन्य भी उस क्रिया में उपयोगी नहीं, क्योंकि सुषुप्त (प्राज्ञ) आत्मा में चैतन्य न होने पर भी श्वास-प्रश्वास क्रिया प्रवाहित रहती है'—ऐसा कहना युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि प्राज्ञात्मा में भी चैतन्य अक्षुण्ण रहता है, अन्यथा मृत शरीर में भी श्वासादि क्रिया होनी चाहिए ।

जिन व्यक्तियों के सभी स्वार्थ और परार्थ सिद्ध हो चुके हैं, ऐसे कृत-कृत्य प्रशान्तमनस्क और निष्काम पुरुषों की भी लीलामात्र से जब सभी प्रयोजन अपने-आप निष्पन्न हो जाते हैं, अतः उनकी प्रवृत्ति जैसे सर्वथा निष्प्रयोजन होती है, वैसे ही ब्रह्म की जगद्रचनारूप प्रवृत्ति उपपन्न हो जाती है । लोक में तो यह देखा ही जाता है कि जो कार्य अल्प बलवीर्य वाले व्यक्ति के लिए अत्यन्त अशक्य या दुष्कर होता है, वही कार्य महाशक्ति-सम्पन्न पुरुषों के लिए सुकर या ईषत्कर होता है । विशालकाय प्राणियों के लिए भी अगाध और अपार समुद्र में भी हनुमान्-जैसे वानरपुङ्गवों ने क्या महापर्वतों द्वारा सेतु बन्ध का निर्माण नहीं कर दिया था ? महाधनुर्धर अर्जुन ने क्या बाणों की अद्भुत वर्षा से सागर को पाट नहीं दिया था ? महर्षि अगस्त ने क्या महासागर को एक चुल्लू में भर की पी नहीं लिया था । नृप नरेश के सङ्कल्पमात्र से निर्मित गगन-चुम्बी अट्टालिकाएँ और मोहक प्रमद-वन क्या आज भी नहीं देखे जाते हैं ? फलतः ब्रह्म की जगद्रचना को चाहे याद्दच्छिक, चाहे स्वाभाविक या लीलामात्र कहा जाय, सर्वथा उपपन्न और युक्ति-संगत है ।

दूसरी बात यह भी है कि यह सृष्टि पारमार्थिकी नहीं मानी जाती कि जिसके प्रयोजन का प्रश्न उठता । अनादि अविद्या की देन यह सृष्टि है, अविद्या स्वभावतः विभ्रम कार्य को जन्म दे डालती है, किसी प्रयोजन की अपेक्षा नहीं करती, जैसे कि न तो द्विचन्द्र, अलातचक्र, गन्धर्वनगरादि विभ्रम किसी प्रयोजन को उद्देश्य करके उत्पन्न होते हैं और

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