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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 630

६१२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ २ पा. १ सू. ३४

परत्वात् ब्रह्मात्मभावप्रतिपादनपरत्वाच्चेत्येतदपि नैव विस्मर्तव्यम् ॥ ३३ ॥


( १२ वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम् । सू० ३४-३६ )

वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३४ ॥

पुनश्च जगज्जन्मादिहेतुत्वमीश्वरस्याक्षिप्यते, स्थूणानिखननन्यायेन प्रतिज्ञातस्यार्थस्य दृढीकरणाय । नेश्वरो जगतः कारणमुपपद्यते । कुतः ? वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गात् । कांश्चिदत्यन्तसुखभाजः करोति देवादीन्, कांश्चिदत्यन्तदुःखभाजः पश्वादीन्, कांश्चिन्मध्यमभोगभाजो मनुष्यादीनित्येवं विषमां सृष्टिं निर्मिमाणस्येश्वरस्य पृथग्जनस्येव रागद्वेषोपपत्तेः । श्रुतिस्मृत्यवधारितस्वच्छत्वाद्यीश्वरस्वभावविलोपो प्रसज्येत । तथा खलजनैरपि जुगुप्सितं निघृणत्वमतिक्रूरत्वं दुःखयोगविधानात्सर्वप्रजोपसंहाराच्च प्रसज्येत । तस्माद्वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गान्‍नेश्वरः कारणमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः—

भामती
जगत्ति ब्रह्मात्मभावं, तथा च सृष्टेरविवक्षायां तदाश्रयो दोषो निर्विषय एवेत्याशयेनाह ॐ ब्रह्मात्मभाव इति ॐ ॥ ३३ ॥


अतिरोहितोऽत्र पूर्वः पक्षः, उत्तरस्तूच्यते । उच्चावचमध्यमसुखदुःखभेदवत्प्राणभृत्प्रपञ्चं च सुखदुःखकारणं सुधाविषादि चानेकविधं विरचयतः प्राणभृद्दोषासत्पापपुण्यकर्माश्रितसहायस्यात्र भवतः परमेश्वरस्य न वैषम्यनैर्घृण्ये प्रसज्येते । न हि सभ्यः सभायां नियुक्तो युक्तवादिनं युक्तवाद्यसीति चायुक्तवादिनमयुक्तवाद्यसीति ब्रुवाणः सभापतिर्वा युक्तवादिनमनुगृह्णन्नयुक्तवादिनञ्च निगृह्णन्ननुरक्तो द्विष्टो

भामती-व्याख्या
न उनसे जनित विस्मय, भय और कम्पादि कार्य ही किसी प्रयोजन की अपेक्षा करते हैं। वह अविद्या चिदात्मा से तादात्म्य स्थापित करके ही जगत् की रचना करती है, अतः चेतन तत्त्व जगत् का उपादान कहा जाता है। भाष्यकार भी यही कह रहे हैं—"न चेयं परमार्थ-विषया"। वस्तुतः सृष्टि-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्यों का परम तात्पर्य ब्रह्मात्मभाव के प्रदर्शन में है। सृष्टि अविवक्षित होने के कारण सृष्टिविषयक दोष निर्विषयक हैं—"ब्रह्मात्मभावप्रतिपादनपरत्वात्" ॥ ३३ ॥


संशय—निर्दोष ब्रह्म में सृष्टि-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्यों का जो समन्वय किया गया, वह न्याय-विरुद्ध है ? अथवा नहीं ?

पूर्वपक्ष—ब्रह्म को यदि जगत् का रचयिता माना जाता है, तब उसमें वैषम्य और नैर्घृण्य (क्रूरभाव) प्रसक्त होता है, क्योंकि देवादिरूप सात्त्विक और सुखी सृष्टि के प्रति राग, मनुष्यादिरूप राजस एवं दुःखाक्रान्त प्राणियों से द्वेष, पशु-पक्ष्यादि तामस जगत् के निर्माण एवं प्रलयार्थ अतिक्रूरत्व अपेक्षित है ।

सिद्धान्त—यद्यपि भगवान् ने उच्च-नीचादि-भेद-भिन्न विश्व का निर्माण किया, जिसमें कोई सुखी और कोई दुःखी है, अमृत और विष-जैसी विषमताएँ हैं। तथापि उसमें किसी प्रकार का राग, द्वेष और क्रूरत्व नहीं, क्योंकि प्राणियों की अनादि कर्म-वासनाओं को अपने उदर में समेटे महाअविद्या विविधताओं और विषमताओं को जन्म देती जा रही है, भगवान् का क्या दोष ? जैसे किसी सभा में नियुक्त साक्षी या अध्यक्ष युक्तवादी का अनुमोदन और अयुक्तवादी का प्रतारण करता हुआ भी राग-द्वेषपूर्ण या पक्षपाती नहीं होता,