भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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परिशिष्ट १ १०९७ Containd in the secretion of the uterine glands' —Midwifery by Tenteachers. आर्तव के विकार आर्तव की अधिक प्रवृत्ति वा आर्तवकालान्तर में भी प्रवृत्ति को रक्तप्रदर या असृग्दर (Excessive and irregular menstruation) कहते हैं। जैसा कि सुश्रुत ने लिखा है— ‘तदेवातिप्रसङ्गेन प्रवृत्तमनृतावपि । असृग्दरं विजानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणात्’ ।। आधुनिक शास्त्रज्ञ इस रक्तस्राव के लिये दो पृथक्-पृथक् संज्ञाओं का व्यवहार करते हैं। यदि आर्तवकाल में ही अधिक आर्तवस्राव हो तो उसे मेनोरेजिया (Menerrhagia) कहते हैं। तथा यदि आर्तवकालान्तर में भी आर्तव दिखाई पड़े तो उसे मेट्रोरोज़िया (Metrorrhagia) कहते हैं। सुश्रुत ने आर्तव के विकार का वर्णन करते हुए शरीर के दूसरे अध्याय में आर्तवनाश का भी वर्णन किया है। आधुनिक परिभाषा के अनुसार उसे एमनोरिया (Amenorhoea) कहेंगे। सुश्रुत ने आर्तवविकार तथा शुक्र के विकार को बन्ध्यात्व का कारण माना है। ऋतुकाल में तथा जिस समय गर्भाशय शुद्ध हो उस अवस्था में यदि स्त्री-पुरुष मैथुन में प्रवृत्त हों तो निश्चित गर्भाधान होता है। सुश्रुत शारीर में लिखते हैं— ‘ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः । ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्र्यादङ्कुरो यथा’ ।। जिस प्रकार उचित ऋतु (अंकुर निकलने के लिये उपयुक्त समय), क्षेत्र (भूमि), जल तथा बीज इन चारों के संसर्ग से अंकुर उत्पन्न होता है उसी प्रकार ऋतु (ऋतुकाल), क्षेत्र (गर्भाशय), अम्बु (आहार रस) तथा बीज (शुक्र) इनके संयोग होने पर निश्चित गर्भाधान होता है। यदि आर्तव शब्द से—आजकल के डिम्ब (Ovum) का ग्रहण कर लिया जाय जैसा कि उचित भी प्रतीत होता है तो आधुनिक शास्त्रज्ञों के मत में भी भिन्नता नहीं पड़ती। उनके मत में भी आर्तव के बाद के १० दिनों में ही गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है। नारी-जननेन्द्रियों के वर्णन के समय, डिम्बग्रन्थि तथा ट्यूब का वर्णन किया जा चुका है। डिम्बग्रन्थि से पका हुआ डिम्ब (Mature Ovum) बाहर निकल कर डिम्बप्रणाली में प्रवेश करता है उसी दशा में शुक्रकीट (Sperm) वहाँ पहुँच कर डिम्ब से संयुक्त होता है, इस प्रकार गर्भाधान फेलोपियन ट्यूब में होता है, वहाँ से वह शनैः शनैः गर्भाशय की तरफ प्रस्थान करता है तथा प्रायः छठे दिन के पश्चात् वह गर्भाशय में प्रविष्ट होता है। तथा तब तक गर्भाशय भी अपने आने वाले मेहमान की अभ्यर्थना के लिये सुसज्जित रहता है। गर्भाशय की कला (Endometrium) पहले की अपेक्षा अधिक मोटी हो जाती है और उसका रक्तसंचार भी बहुत बढ़ जाता है। जिस समय डिम्ब गर्भित (Fertilized) हो जाता है उसकी वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है तथा वह शनैः-शनैः गर्भाशय की तरफ प्रस्थान भी करता रहता है यह ऊपर कहा जा चुका है। गर्भाशय में प्रविष्ट होने पर यह सुकोमल गर्भाशय कला के सम्पर्क में आता है, उससे चिपक जाता है। भ्रूण (Chrionicviliu) के शरीर से बाहर की तरफ कुछ अंकुर निकले रहते है (Chorionic viliu) वे जिस धातु के सम्पर्क में आते हैं उसे खाते जाते हैं। इस प्रकार वे गर्भकला को खाकर उसमें एक खात की तरह रचना उपस्थित कर देते हैं। गर्भाशय की श्लैष्मिक कला इस समय तक डिम्ब को पूर्णतया आच्छादित कर लेती है। अब भ्रूण गर्भकला के अन्दर ही अन्दर बढ़ता है। भ्रूण के अंकुरों (Chorionic viliu) में दो तरह के अंकुर होते हैं—एक तो वे जिनके सहारे वह (भ्रूण) गर्भाशय में लटकता रहता है, दूसरे वे जो कि समीपवर्ती धातु से रक्त को ग्रहण करते हैं। बाद में इन्हीं अंकुरों में रक्तवाहिनियाँ बनती हैं। यह आधुनिक शास्त्रज्ञों का मत है। अब हम यदि सुश्रुत के पूर्वोक्त श्लोक पर विचार करें तो दोनों की एकवाक्यता सुस्पष्ट हो जाती है। यदि डिम्ब पक कर जब शक्ति-सम्पन्न (जो गर्भाधान योग्य हो) शुक्र से संयुक्त होता है तभी गर्भ धारण हो सकता है। तथा यदि शुक्र

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