भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1149, कुल 1167 में से

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१०९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथा डिम्ब का उचित सम्पर्क भी हुआ तो भी यदि क्षेत्र अर्थात् गर्भाशय में कोई विकृति (यथा Metritis वा Endometritis प्रभृति गर्भाशय की शोथयुक्त अवस्था) है तो गर्भाधान नहीं होगा। तथा यदि क्षेत्र निर्मल है किन्तु वहाँ पर रस अर्थात् पर्याप्त पोषक रक्त की अनुपस्थिति हो तो भी गर्भधारण होना कभी सम्भव नहीं। अतः (१) शक्ति-सम्पन्न शुक्र, (२) पूर्णता पर पहुँचे हुये डिम्ब, (३) स्वस्थ गर्भाशय तथा (४) वहाँ पर उचित रक्तसञ्चार इन चारों वस्तुओं के सम्यग्योग से गर्भाधान होता है। इसी को ध्यान में रखते हुये परम वैज्ञानिक सुश्रुत ने ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद्. इत्यादि लिखा है— प्राचीन ऋषियों के मत में उपर्युक्त चारों वस्तुओं के संयोग होने पर भी आत्मा का संयोग होना अपेक्षित है बिना आत्मा के गर्भोत्पत्ति नहीं होती। पूर्वजन्म के कर्मफल के अनुसार मन के सहित आत्मा दूसरे शरीर को ग्रहण करता है। महर्षि चरक ने भी लिखा है— ‘शुक्रासृगात्माशयकालसम्पद्यस्योपचाराश्च हितैस्तथाऽर्थैः । गर्भश्च काले च सुखी सुखं च सञ्जायते संपरिपूर्णदेहः’ ।। (चरक शारीर) शुक्र, आर्तव, आत्मा, काल (ऋतु) तथा हितकर आहार-विहार इनके सम्यग् योग से गर्भ समय में (नवम वा दशम वा एकादश मास में) सुखपूर्वक तथा सम्पूर्ण अवयवों से युक्त उत्पन्न होता है। कुछ स्वस्थ स्त्रियों को भी गर्भ देर से होता है। उसका कारण है—माता का अहितकर (विरुद्ध) आहार-विहार। चरक में लिखा है— योनिप्रदोषानमनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् । अकालयोगाद् बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ।। अर्थात्—यदि योनि में किसी प्रकार का दोष उपस्थित हो तथा सहवास के समय मन एकाग्र न हो एवं शुक्र, आर्त्तव अथवा माता के आहार-विहार के दोष से, अकाल में (ऋतुकाल से भिन्न समय में) तथा दौर्बल्य की स्थिति में मैथुन करने से प्रकृतिस्थ (बन्ध्यात्वरहित) स्त्रियों में भी सन्तानोत्पत्ति देर से होती है। ऋतुकाल वह समय होता है जिस समय डिम्बग्रन्थि से डिम्ब पक कर निकलता है। यदि उचित समय पर उससे शुक्रकीट का सम्पर्क न हो तो वह मर जाता है। अतः आर्त्तव के बाद के १० दिन मैथुन के लिये अधिक उपयुक्त हैं। सुश्रुत लिखते हैं— ‘नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं यथा। ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा’ ।। यमल गर्भ (Twin pregnancy) गर्भाशय के बीज का वायु के द्वारा जब दो भागों में विभाजन हो जाता है तब उस समय दो गर्भ उत्पन्न होते हैं, ऐसी प्राचीन आचार्यों की सम्मति है। जैसा कि सुश्रुत अपने शारीर-स्थान में लिखते हैं— ‘बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ। यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ’ ।। —(सुश्रुत शारीर) यमल गर्भ के कारण के विषय में महर्षि चरक भी बीज (आर्तव तथा शुक्र) की दो भागों में विभक्ति होने से यमल गर्भ की उत्पत्ति मानते हैं। तथा वायु जिस समय शुक्रार्त्तव को कई भागों में विभाजित कर देती है उस समय, कई सन्तति (Multiple pregnacy) उत्पन्न होती है। आधुनिक शास्त्रज्ञ वायु के द्वारा शुक्रार्त्तव के विभाजन को यमल वा अनेक गर्भ का कारण नहीं मानते। उनका यह कथन है कि एकबार गर्भाधान के कुछ काल बाद ही यदि दूसरा मैथुन किया जाय तो कभी-कभी गर्भ धारण हो जाता है। ऐसा देखा गया है कि एक आंग्लदेशीया महिला को दो सन्तति एक साथ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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