भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट १ १०९९ उत्पन्न हुई जिसमें एक का वर्ण गौर तथा दूसरी का वर्ण श्याम था। अन्वेषण से पता चला कि जिस समय तथोक्त महिला के पति ने सहवास किया था उसके कुछ समय बाद उसके एक हबसी भृत्य ने भी मैथुन किया था, इस प्रकार एक सन्तान गौर वर्ण की तथा दूसरी श्याम वर्ण की उत्पन्न हुई। अब विचारणा यह है कि क्या एक ही डिम्ब को दो शुक्रकीट पहुँच कर यमल गर्भ उत्पन्न करते हैं या कोई अन्य कारण यमल गर्भ की उत्पत्ति में सहायक होता है। वास्तव में साधारण नियम के अनुसार जिस समय आर्तव प्रारम्भ होता है उसके १४वें दिन डिम्बग्रन्थि से परिपक्व डिम्ब निकलता है। प्रायः एक मास में एक ही डिम्ब निकलता है। जैसे-यदि एक मास में बाईं ओर की डिम्ब ग्रन्थि Ovary से डिम्ब आया तो दूसरे मास में दाहिनी ओर की डिम्बग्रन्थि से डिम्ब आयेगा। पर कभी-कभी इस नियम के अपवाद स्वरूप दोनों ओर की डिम्ब ग्रन्थियों से एक ही मास में दो डिम्ब पकते हैं तथा वे ही भिन्न-भिन्न शुक्रकीटों (Sperms) द्वारा संयुक्त होकर यमल गर्भ उत्पन्न करते हैं तथा कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि एक बार गर्भाधान होने के बाद भी दूसरे महीने में दूसरी ओर की डिम्बग्रन्थि से एक डिम्ब आ जाता है उस समय भी यदि प्रसङ्ग किया गया तो पुनः गर्भाधान होकर यमल गर्भ उत्पन्न होता है। एक ही आर्तवकाल में यदि दो डिम्ब पृथक्-पृथक् शुक्र कीट से मिलकर यमल गर्भ उत्पन्न करें तो उसे Superfoecundation कहते हैं और यदि दो आर्तव कालों (Menstrual type) में अलग-अलग सम्भोग से यमल गर्भ उत्पन्न हो तो उसे Superfoetation कहते हैं। यमलगर्भ में लैङ्गिक विभेद आयुर्वेदज्ञ यह मानते हैं कि-गर्भाधान के समय यदि आर्तव की अधिकता हो तो कन्या तथा शुक्र की अधिकता हो तो पुत्र की उत्पत्ति होती है। शुक्रार्तव के वायु द्वारा विभाजित होने पर जिस ओर के विभाग में शुक्र की अधिकता हो उस ओर से पुत्र और जिस ओर आर्तव की अधिकता हो उस ओर से कन्या उत्पन्न होगी, यदि दोनों ही ओर शुक्र की अधिकता होगी तो दोनों ही पुत्र होंगे और यदि दोनों ओर के ही विभाग में आर्तव-बाहुल्य रहा हो तो दो कन्यायें उत्पन्न होंगी। जैसा कि चरक में भगवान् पतञ्जलि ने लिखा है— 'रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण तेन द्विविधीकृतेन। बीजेन कन्याञ्च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन' ।। शिशु की विकृति के कारण माता के आहार-विहार के व्यतिक्रम से दोष प्रकुपित होते हैं और ये प्रकुपित दोष भ्रूण की विकृति के कारण होते हैं। तथा कुछ लोग पूर्वजन्म के कर्मफल को भी विकृति का कारण मानते हैं। आजकल के वैज्ञानिक विभजन से ही सन्तान की वृद्धि मानते हैं। इसी विभजन द्वारा जब एक भाग अधिक बढ़ जाता है वा अविकसित रह जाता है उस समय तत्तत्स्थलों में विकृति उत्पन्न होती है। बन्ध्यत्व यदि पुरुषों के शुक्र में उत्पादन की शक्ति न हो तो उस पुरुष को 'बन्ध्य' कहते हैं तथा यदि स्त्री का आर्तव उत्पादन शक्ति से विहीन हो तो उस स्त्री को 'बन्ध्या' कहते हैं। बन्ध्य पुरुष वा बन्ध्या स्त्री के संयोग से चाहे वह ऋतुकाल में ही किया गया हो संतान उत्पन्न होना असम्भव है। जब तक कि चिकित्सा द्वारा बन्ध्यत्व दूर न किया जाय। यदि स्त्री तथा पुरुष दोनों स्वस्थ तथा युवा हों और उनके दाम्पत्य जीवन के चार साल में भी यदि सन्तान उत्पन्न न हो तो अवश्य दम्पति की परीक्षा करके चिकित्सा में प्रवृत्त होना चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA