भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० ० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आधुनिक शास्त्रज्ञ स्त्रियों के बन्ध्यात्व कारण को दो भागों में विभाजित करते हैं। प्रथम विभाग वह है जिसमें स्त्रियों के जननेन्द्रिय में कुछ विकृति उपस्थित होती है। इस समूह के अन्दर निम्न विकार आते हैं— १. डिम्ब ग्रन्थियों (Ovary) के रोग—इससे स्वस्थ तथा पके हुये डिम्ब ही नहीं तैयार होंगे। अतः गर्भ होना कैसे सम्भव हो सकता है। किन्तु यदि विकृति एक तरफ की डिम्बग्रन्थि तक ही सीमित हो तो दूसरी अविकृत ग्रन्थि से परिपक्व डिम्ब निकलता है और सन्तानोत्पत्ति होती है। २. डिम्बप्रणाली या फैलोपियन ट्यूब के विकार, यथा सल्पिंजाइटिस (Sulpingitis)—यह प्रायः दोनों तरफ की नलिकाओं में (Bilateral) होती है। इस अवस्था में स्त्री के गर्भाधान का अवसर अत्यन्त कम होता है। यह निश्चित है कि संक्रमण के द्वारा डिम्बप्रणाली का झालरदार किनारा (Abdominal osteum) बन्द हो जाता है अतः डिम्ब को डिम्बप्रणाली में आने का कोई मार्ग नहीं मिलता। अतः सन्तानोत्पादन इस अवस्था में असम्भव है। पूयमेह (Gonorrhea) और गर्भपात व प्रसव के अनन्तर जो बन्ध्यात्व हो जाता है उसका सब से मुख्य कारण डिम्बप्रणाली शोथ (Sutpingitis) है। ३. गर्भाशय में अर्बुद (Fibroid speoially and interstetial variy and submucus)—उपस्थित हो तो भी बन्ध्यात्व हो जाता है। स्मरण रखना चाहिये कि ये अर्बुद (fibroid) ३० वर्ष की अवस्था के पूर्व गर्भाशय की श्लेष्मिक कला के चिरकालीन शोथ के कारण भी बन्ध्या स्व हो जाता है। भग (Valba) तथा योनि (Vaginal) के रोग तथा श्वेतप्रदर (Laueorrhalal disoharges) ये सब भी बन्ध्यात्व उत्पन्न करते हैं। बन्ध्यात्व के कारण के दूसरे विभाग में स्त्रियों की जननेन्द्रियाँ यद्यपि स्वस्थ प्रतीत होती हैं किन्तु डिम्ब में ही यह सामर्थ्य नहीं होता कि वह शुक्रकीट (Sperm) से मिल कर एक हो जाय या वृद्धि प्रारम्भ कर दे। कभी-२ पशुओं पर प्रयोग करके देखा गया है कि एक मादा में एक नर से गर्भाधान नहीं होता किन्तु दूसरे नर से हो जाता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि मनुष्य जाति भी इस नियम के लिये अपवाद नहीं है। बन्ध्यात्व का सन्देह होने पर पूर्ण परीक्षा कर अबिलम्ब चिकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिये। आर्तव तथा उसके रोग और गर्भाधान तथा बन्ध्यात्व के विषय में प्राच्य, पाश्चात्त्य विद्वानों का संक्षिप्त समन्वय इस प्रकार समाप्त होता है। इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे प्रथमं परिशिष्टं समाप्तम्।