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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१०९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथा डिम्ब का उचित सम्पर्क भी हुआ तो भी यदि क्षेत्र अर्थात् गर्भाशय में कोई विकृति (यथा Metritis वा Endometritis प्रभृति गर्भाशय की शोथयुक्त अवस्था) है तो गर्भाधान नहीं होगा। तथा यदि क्षेत्र निर्मल है किन्तु वहाँ पर रस अर्थात् पर्याप्त पोषक रक्त की अनुपस्थिति हो तो भी गर्भधारण होना कभी सम्भव नहीं। अतः (१) शक्ति-सम्पन्न शुक्र, (२) पूर्णता पर पहुँचे हुये डिम्ब, (३) स्वस्थ गर्भाशय तथा (४) वहाँ पर उचित रक्तसञ्चार इन चारों वस्तुओं के सम्यग्योग से गर्भाधान होता है। इसी को ध्यान में रखते हुये परम वैज्ञानिक सुश्रुत ने ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद्. इत्यादि लिखा है— प्राचीन ऋषियों के मत में उपर्युक्त चारों वस्तुओं के संयोग होने पर भी आत्मा का संयोग होना अपेक्षित है बिना आत्मा के गर्भोत्पत्ति नहीं होती। पूर्वजन्म के कर्मफल के अनुसार मन के सहित आत्मा दूसरे शरीर को ग्रहण करता है। महर्षि चरक ने भी लिखा है— ‘शुक्रासृगात्माशयकालसम्पद्यस्योपचाराश्च हितैस्तथाऽर्थैः । गर्भश्च काले च सुखी सुखं च सञ्जायते संपरिपूर्णदेहः’ ।। (चरक शारीर) शुक्र, आर्तव, आत्मा, काल (ऋतु) तथा हितकर आहार-विहार इनके सम्यग् योग से गर्भ समय में (नवम वा दशम वा एकादश मास में) सुखपूर्वक तथा सम्पूर्ण अवयवों से युक्त उत्पन्न होता है। कुछ स्वस्थ स्त्रियों को भी गर्भ देर से होता है। उसका कारण है—माता का अहितकर (विरुद्ध) आहार-विहार। चरक में लिखा है— योनिप्रदोषानमनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् । अकालयोगाद् बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ।। अर्थात्—यदि योनि में किसी प्रकार का दोष उपस्थित हो तथा सहवास के समय मन एकाग्र न हो एवं शुक्र, आर्त्तव अथवा माता के आहार-विहार के दोष से, अकाल में (ऋतुकाल से भिन्न समय में) तथा दौर्बल्य की स्थिति में मैथुन करने से प्रकृतिस्थ (बन्ध्यात्वरहित) स्त्रियों में भी सन्तानोत्पत्ति देर से होती है। ऋतुकाल वह समय होता है जिस समय डिम्बग्रन्थि से डिम्ब पक कर निकलता है। यदि उचित समय पर उससे शुक्रकीट का सम्पर्क न हो तो वह मर जाता है। अतः आर्त्तव के बाद के १० दिन मैथुन के लिये अधिक उपयुक्त हैं। सुश्रुत लिखते हैं— ‘नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं यथा। ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा’ ।। यमल गर्भ (Twin pregnancy) गर्भाशय के बीज का वायु के द्वारा जब दो भागों में विभाजन हो जाता है तब उस समय दो गर्भ उत्पन्न होते हैं, ऐसी प्राचीन आचार्यों की सम्मति है। जैसा कि सुश्रुत अपने शारीर-स्थान में लिखते हैं— ‘बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ। यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ’ ।। —(सुश्रुत शारीर) यमल गर्भ के कारण के विषय में महर्षि चरक भी बीज (आर्तव तथा शुक्र) की दो भागों में विभक्ति होने से यमल गर्भ की उत्पत्ति मानते हैं। तथा वायु जिस समय शुक्रार्त्तव को कई भागों में विभाजित कर देती है उस समय, कई सन्तति (Multiple pregnacy) उत्पन्न होती है। आधुनिक शास्त्रज्ञ वायु के द्वारा शुक्रार्त्तव के विभाजन को यमल वा अनेक गर्भ का कारण नहीं मानते। उनका यह कथन है कि एकबार गर्भाधान के कुछ काल बाद ही यदि दूसरा मैथुन किया जाय तो कभी-कभी गर्भ धारण हो जाता है। ऐसा देखा गया है कि एक आंग्लदेशीया महिला को दो सन्तति एक साथ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट १ १०९९ उत्पन्न हुई जिसमें एक का वर्ण गौर तथा दूसरी का वर्ण श्याम था। अन्वेषण से पता चला कि जिस समय तथोक्त महिला के पति ने सहवास किया था उसके कुछ समय बाद उसके एक हबसी भृत्य ने भी मैथुन किया था, इस प्रकार एक सन्तान गौर वर्ण की तथा दूसरी श्याम वर्ण की उत्पन्न हुई। अब विचारणा यह है कि क्या एक ही डिम्ब को दो शुक्रकीट पहुँच कर यमल गर्भ उत्पन्न करते हैं या कोई अन्य कारण यमल गर्भ की उत्पत्ति में सहायक होता है। वास्तव में साधारण नियम के अनुसार जिस समय आर्तव प्रारम्भ होता है उसके १४वें दिन डिम्बग्रन्थि से परिपक्व डिम्ब निकलता है। प्रायः एक मास में एक ही डिम्ब निकलता है। जैसे-यदि एक मास में बाईं ओर की डिम्ब ग्रन्थि Ovary से डिम्ब आया तो दूसरे मास में दाहिनी ओर की डिम्बग्रन्थि से डिम्ब आयेगा। पर कभी-कभी इस नियम के अपवाद स्वरूप दोनों ओर की डिम्ब ग्रन्थियों से एक ही मास में दो डिम्ब पकते हैं तथा वे ही भिन्न-भिन्न शुक्रकीटों (Sperms) द्वारा संयुक्त होकर यमल गर्भ उत्पन्न करते हैं तथा कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि एक बार गर्भाधान होने के बाद भी दूसरे महीने में दूसरी ओर की डिम्बग्रन्थि से एक डिम्ब आ जाता है उस समय भी यदि प्रसङ्ग किया गया तो पुनः गर्भाधान होकर यमल गर्भ उत्पन्न होता है। एक ही आर्तवकाल में यदि दो डिम्ब पृथक्-पृथक् शुक्र कीट से मिलकर यमल गर्भ उत्पन्न करें तो उसे Superfoecundation कहते हैं और यदि दो आर्तव कालों (Menstrual type) में अलग-अलग सम्भोग से यमल गर्भ उत्पन्न हो तो उसे Superfoetation कहते हैं। यमलगर्भ में लैङ्गिक विभेद आयुर्वेदज्ञ यह मानते हैं कि-गर्भाधान के समय यदि आर्तव की अधिकता हो तो कन्या तथा शुक्र की अधिकता हो तो पुत्र की उत्पत्ति होती है। शुक्रार्तव के वायु द्वारा विभाजित होने पर जिस ओर के विभाग में शुक्र की अधिकता हो उस ओर से पुत्र और जिस ओर आर्तव की अधिकता हो उस ओर से कन्या उत्पन्न होगी, यदि दोनों ही ओर शुक्र की अधिकता होगी तो दोनों ही पुत्र होंगे और यदि दोनों ओर के ही विभाग में आर्तव-बाहुल्य रहा हो तो दो कन्यायें उत्पन्न होंगी। जैसा कि चरक में भगवान् पतञ्जलि ने लिखा है— 'रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण तेन द्विविधीकृतेन। बीजेन कन्याञ्च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन' ।। शिशु की विकृति के कारण माता के आहार-विहार के व्यतिक्रम से दोष प्रकुपित होते हैं और ये प्रकुपित दोष भ्रूण की विकृति के कारण होते हैं। तथा कुछ लोग पूर्वजन्म के कर्मफल को भी विकृति का कारण मानते हैं। आजकल के वैज्ञानिक विभजन से ही सन्तान की वृद्धि मानते हैं। इसी विभजन द्वारा जब एक भाग अधिक बढ़ जाता है वा अविकसित रह जाता है उस समय तत्तत्स्थलों में विकृति उत्पन्न होती है। बन्ध्यत्व यदि पुरुषों के शुक्र में उत्पादन की शक्ति न हो तो उस पुरुष को 'बन्ध्य' कहते हैं तथा यदि स्त्री का आर्तव उत्पादन शक्ति से विहीन हो तो उस स्त्री को 'बन्ध्या' कहते हैं। बन्ध्य पुरुष वा बन्ध्या स्त्री के संयोग से चाहे वह ऋतुकाल में ही किया गया हो संतान उत्पन्न होना असम्भव है। जब तक कि चिकित्सा द्वारा बन्ध्यत्व दूर न किया जाय। यदि स्त्री तथा पुरुष दोनों स्वस्थ तथा युवा हों और उनके दाम्पत्य जीवन के चार साल में भी यदि सन्तान उत्पन्न न हो तो अवश्य दम्पति की परीक्षा करके चिकित्सा में प्रवृत्त होना चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११० ० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आधुनिक शास्त्रज्ञ स्त्रियों के बन्ध्यात्व कारण को दो भागों में विभाजित करते हैं। प्रथम विभाग वह है जिसमें स्त्रियों के जननेन्द्रिय में कुछ विकृति उपस्थित होती है। इस समूह के अन्दर निम्न विकार आते हैं— १. डिम्ब ग्रन्थियों (Ovary) के रोग—इससे स्वस्थ तथा पके हुये डिम्ब ही नहीं तैयार होंगे। अतः गर्भ होना कैसे सम्भव हो सकता है। किन्तु यदि विकृति एक तरफ की डिम्बग्रन्थि तक ही सीमित हो तो दूसरी अविकृत ग्रन्थि से परिपक्व डिम्ब निकलता है और सन्तानोत्पत्ति होती है। २. डिम्बप्रणाली या फैलोपियन ट्यूब के विकार, यथा सल्पिंजाइटिस (Sulpingitis)—यह प्रायः दोनों तरफ की नलिकाओं में (Bilateral) होती है। इस अवस्था में स्त्री के गर्भाधान का अवसर अत्यन्त कम होता है। यह निश्चित है कि संक्रमण के द्वारा डिम्बप्रणाली का झालरदार किनारा (Abdominal osteum) बन्द हो जाता है अतः डिम्ब को डिम्बप्रणाली में आने का कोई मार्ग नहीं मिलता। अतः सन्तानोत्पादन इस अवस्था में असम्भव है। पूयमेह (Gonorrhea) और गर्भपात व प्रसव के अनन्तर जो बन्ध्यात्व हो जाता है उसका सब से मुख्य कारण डिम्बप्रणाली शोथ (Sutpingitis) है। ३. गर्भाशय में अर्बुद (Fibroid speoially and interstetial variy and submucus)—उपस्थित हो तो भी बन्ध्यात्व हो जाता है। स्मरण रखना चाहिये कि ये अर्बुद (fibroid) ३० वर्ष की अवस्था के पूर्व गर्भाशय की श्लेष्मिक कला के चिरकालीन शोथ के कारण भी बन्ध्या स्व हो जाता है। भग (Valba) तथा योनि (Vaginal) के रोग तथा श्वेतप्रदर (Laueorrhalal disoharges) ये सब भी बन्ध्यात्व उत्पन्न करते हैं। बन्ध्यात्व के कारण के दूसरे विभाग में स्त्रियों की जननेन्द्रियाँ यद्यपि स्वस्थ प्रतीत होती हैं किन्तु डिम्ब में ही यह सामर्थ्य नहीं होता कि वह शुक्रकीट (Sperm) से मिल कर एक हो जाय या वृद्धि प्रारम्भ कर दे। कभी-२ पशुओं पर प्रयोग करके देखा गया है कि एक मादा में एक नर से गर्भाधान नहीं होता किन्तु दूसरे नर से हो जाता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि मनुष्य जाति भी इस नियम के लिये अपवाद नहीं है। बन्ध्यात्व का सन्देह होने पर पूर्ण परीक्षा कर अबिलम्ब चिकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिये। आर्तव तथा उसके रोग और गर्भाधान तथा बन्ध्यात्व के विषय में प्राच्य, पाश्चात्त्य विद्वानों का संक्षिप्त समन्वय इस प्रकार समाप्त होता है। इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे प्रथमं परिशिष्टं समाप्तम्।

परिशिष्ट २ अकारादि-क्रमानुसार निघण्टुभाग-स्थित द्रव्यों के व्यवहारोपयोगी अङ्ग तथा उनकी मात्राएँ द्रव्य अङ्ग मात्रा अंकोट छाल १/२ माशे अधःपुष्पी पत्ते, बीज २-३ अकरकरा जड़ ३ माशे अखरोट फल की गूदी १-२ तोले अगर लकड़ी ६ रत्ती से ३ माशे अगस्त छाल, फूल ३ से ६ माशे छाल अजमोदा बीज २ से ८ माशे अडूसा जड़ की छाल, पत्ते १ से ४ माशे अतीस जड़ ६ रत्ती से १ ॥ माशे अदरक कन्द-स्वरस २ माशे से १ तोले अनन्तमूल जड़ ३ माशे से १ तोले अनार दाना, छिलका ६ माशे से १ ॥ तोले अपराजिता जड़-बीज ३ ॥ से ५ रत्ती अफीम फल-रस १/४ से १ रत्ती अभरक भस्म १ से ३ रत्ती अमरबेल लता ६ माशे से १ तोले अमरूद फल-पत्ते-छाल ६ माशे से २ तोले अमलतास फल की गूदी १-२ तोले अमलबेत गूदी १ से ३ माशे अरनी छाल ६ माशे से २ तोले अर्जुन छाल ६ माशे से १ ॥ तोले अशोक छाल १ तोले से ३ तोले अष्टवर्ग कन्द ६ माशे से १ तोले असगन्ध जड़ ३ माशे से १ तोले आक जड़ की छाल, फूल १-३ माशे आम फल, छाल ६ माशे से १ तोले CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आमला फल का छिलका ५ माशे से १ तोले आमाहल्दी जड़ की गाँठ १ से ४ माशे आम्रातक फल, पत्ते ४ से ९ माशे इनारुन फल, जड़ १ से ३ माशे इन्द्रयव बीज ५ रत्ती से ३ माशे इमली फल १ से ३ तोले इलायची छोटी बीज २-४ माशे इलायची बड़ी बीज ३-५ माशे एकांगी जड़ ३-६ माशे जड़ ६ माशे से २ तोले एरंड बीज २ से ७ दाने तेल ६ माशे १।। तोले ओंगा पंचांग १-२ तोले बीज ३-६ माशे औषर लवण नमक ३-९ माशे कंटकारी जड़ पंचांग २-६ माशे ककड़ी बीज ३-९ माशे ककही जड़, जड़ का छाल, बीज ५-१० माशे कचनार छाल ६ माशे से २ तोले कचूर जड़ २-३ माशे कटसरैया पञ्चाङ्ग-पत्ते ३-८ माशे कठूमर फल-छाल ३- माशे से १ तोले कद्दू बीज ६-९ माशे कनेर जड़, विषैला ६ रत्ती से २ माशे कपास जड़ १-२ तोले बीज २-६ माशे कपूर गोंद, सत्त्व १/८-१/४ रत्ती कबीला लालरज १-२ माशे कमल बीज, फूल, जल ३-४ माशे करञ्ज छाल, बीज १-६ माशे कलम्बी पत्ते-स्वरस ३-९ माशे कलिहारी जड़ (विष) १-४ रत्ती कुसुम फूल, बीज ३-१० माशे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट २ ११०३ कसेरू जड़ ६ माशे से १ तोले कसोंदी जड़, बीज ३-६ माशे कस्तूरी मृगमद १/२ से २ रत्ती काकजंघा पञ्चाङ्ग-पत्ते ८-९ माशे काकड़ाशिङ्गी फल १-३ माशे कायफर छाल ३-७ माशे काला जीरा बीज ६-७ माशे कालादाना बीज २-६ माशे कालीजीरी बीज २-३ माशे कास जड़ १-२ तोले किवाछ जड़, बीज ६-९ माशे कुकरवदा पत्ते जड़ ६-९ माशे कुचला बीज (विष) शुद्ध १-२ रत्ती कुटकी जड़ १ ॥-३ माशे कुन्दरु गोंद २-४ माशे कुमुद फूल ६ से १० माशे बीज ५ से ६ माशे कुलञ्जन जड़ ३-९ माशे कुशा जड़ १-२ तोला कूठ जड़ ३-९ मा. कूड़ा छाल ६ माशे से १ तोला केला स्तम्भरस १-२ तोला केसर फूल २-६ रत्ती कोलकन्द कन्द (सविष) १/२ से १ ॥ रत्ती खजूर फल १-२ तोला खपरिया शुद्ध भस्म १-४ रत्ती खरबूजा बीज ६-९ माशे खस जड़ ३-६ माशे खीरा बीज ६-९ माशे खुरासानी अजवायन शुरासाना बीज १-२ माशा अजमोद

११०४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे खेखसा जड़ आवश्यकतानुसार खैर छाल १-२ तोले कत्था १-३ माशे गंगेरेन जड़, छाल ६ मा. से १ तोले नागबली गंधकआंव शुद्ध १-७ माशे लासार गम्भारी छाल ६ माशे से २ तोले गजपीपल फल १-३ माशे गंधपलासी जड़ १-३ माशे कपूरकचरी गंधप्रसारणी पञ्चांग १-२ तोले (प्रसारणी) गाजर बीज ३-७ माशे गिलोय डण्डी ४-९ माशे सत्व १-२ माशे गुञ्ज बीज (विषयुक्त) ४ रत्ती से १ माशे गुलाब फूल ६ माशे से १॥ तोले गूगल गोंद १-३ माशे गूमा (द्रोणपुष्पी) पंचांग ३ माशे से १ तोले गूलर फल, छाल, पत्ते १-२ तो

परिशिष्ट २ ११०५ चौहाड़कोड़ा नमक १-३ माशे (सोंचरनमक) छुहारा फल १-२ तोले जटामांसी जड़ १-४ माशे जमालगोटा बीज (शुद्ध) १/२ से १ ॥ रत्ती जलकुम्भी पञ्चाङ्ग ६ माशे से १ तोले जलनीम पञ्चाङ्ग २-६ माशे जलब्राह्मी जवाखार नमक १-३ माशे जवासा पञ्चाङ्ग १-४ माशे जस्ता शुद्ध भस्म १-३ रत्ती जामुन छाल १-२ तोशे जायफल बीज २ से ६ माशे जावित्री फूल १ से ३ माशे जीरा सफेद बीज ३ से ७ माशे जीवन्ती पंचांग ३ से ६ माशे झरबेर फल १०-२० माशे ढाक (पलाश) फूल ६ माशे से १ तोले बीज १-३ माशे गोंद १ से ३ माशे तगर जड़ २ से ५ माशे तज छाल ३- से ६ माशे तरबूज बीज ६ मा. से १ तोले तामा शुद्ध भस्म १ चावल से १ रत्ती तालमखाना बीज ३ से ७ माशे तालीसपत्र पत्ते १ से ३ माशे तिनिश छाल, गोंद १ से ४ माशे तिल बीज ५ मा. से १ तोले तीसी बीज ५ से १० माशे तुम्बुल छाल बीज ३ से ६ माशे तुलसी स्वरस, पत्ते, बीज ३ माशे से १ तोले तूतिया शुद्ध भस्म १/२ से १ रत्ती तून छाल १ से २ तोला तेंदू फल का रस ३ से ६ माशे तेजपात पत्ते १ से ४ माशे

११०६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तेजबल छाल ३ से ६ माशे त्रायमाण पञ्चांग २ से ६ माशे त्रिफला फल के चिलके ३ माशे से १ तोले थूहर दूध २ से ६ रत्ती दंती जड़ १ से ३ माशे दवना पञ्चाङ्ग ३ से ७ माशे दशमूल छाल, जड़, पञ्चांग २-२ ।। तोले दारुहल्दी जड़, जड़ की १-३ माशे छाल, लकड़ी दालचीनी छाल १-६ माशे दुद्धी पञ्चाङ्ग ३ माशे-१ तोला दूब पञ्चाङ्ग २ से ६ माशे देवदारु लकड़ी १-४ माशे देवदाली (बन्दाल) फल १-३ मा. धतूरा शुद्ध बीज १/२ से २ रत्ती धनियाँ बीज ६ माशे-१ तोला धातकी फूल २-३ माशे नकछिकनी पञ्चाङ्ग १-३ रत्ती नकुलकन्द जड़ १-३ माशे नवसादर पिंड चूर्ण ४-६ रत्ती नागकेसर फूल की केसर १-२ माशे नागदवन पञ्चाङ्ग २-६ माशे नागरमोथा जड़ २-६ माशे नारियल गिरी १-१ ।। तोले निर्गुण्डी पत्ते, बीज ३-६ माशे (सम्भालु) निर्मली बीज ३-६ माशे निसोत (त्रिवृत्) जड़ ३-५ माशे नीम छाल, पत्ते, ३ माशे-१ तोला फूल, फल नील पञ्चाङ्ग २-४ माशे पाठानीलोध छाल १-३ माशे पतंग लकड़ी १-४ माशे पद्माक ककड़ी १-३ माशे पाङ्गा नमक नमक १-३ माशे

परिशिष्ट २ ११०७ पाकर छाल ९ माशे-१॥ तोला पाठा जड़ ६-९ माशे पाढ़र छाल १/२-१॥ तोले पातालगरुड़ी जड़ ६-९ माशे पान पत्ते-स्वरस ३-६ माशे पारा शुद्ध भस्म १/२ रत्ती से २ रत्ती पाषाणभेद जड़ १-३ माशे पिठवन जड़, पंचांग ६ माशे १॥ तोले पित्तपापड़ा पञ्चाङ्ग ६-९ माशे पीतचन्दन लकड़ी २-३ माशे पीतल शुद्ध भस्म १-२ रत्ती पीपल फली १-३ माशे पीपलामूल जड़ ३-४ माशे पुनर्नवा जड़ ६ माशे-१॥ तोले पुष्करमूल जड़ २-४ माशे पेठा फल १-२ तोले बीज १/२ से १ तोला पोस्त डोड-छिलका ३-६ माशे पोस्तदाना बीज ६ माशे-१ तोले प्रियङ्गु पञ्चाङ्ग-फल ३-६ माशे फिटकरी पिंड-शुद्ध १/२-१ माशा फिरोजा पत्थर-भस्म १-३ रत्ती वंशलोचन श्वेतपिंड चूर्ण ३-६ माशे वकायन छाल ६ माशे-१ तोले बच जड़ १-३ माशे बड़ छाल, दूध ६-९ माशे बथुआ बीज ३-५ माशे बनभंटा पञ्चाङ्ग, जड़ ३-६ माशे (बृहती) बनमूँग पञ्चाङ्ग ६ माशे से १ तोला बबूर छाल-पत्ते, फली ३-९ माशे बरियार जड़-बीज ४-१० माशे बरुन छाल पत्ते ४-माशे से १ तोला बर्बरी पञ्चाङ्ग, बीज ३-६ माशे

११०८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बहेड़ा फल का छिलका ५-१० माशे बाकुची बीज १-२ माशे बादाम तेल ३-६ माशे बायविडंग बीज ५-१० माशे बाराहीकन्द कन्द ३-६ माशे बिजैसार छाल-लकड़ी ३-४ माशे बिदारीकंद कंद ६ माशे-१ तोला विधारा जड़ ६ माशे-१ तोला विषांविल फल-गूदी ३-४ माशे (वृक्षाम्ल) बेल सूखी-गूदी १-२ तोले ब्रह्मदण्डी पञ्चाङ्ग ३-७ माशे ब्राह्मी पञ्चांग, पत्ते ६ माशे-१ तोला भांग पत्ते-बीज १-१० रत्ती भांगरा पञ्चाङ्ग ६ माशे से १ तोला भारंगी जड़ की छाल ३-६ माशे भिलावा फल (विषयुक्त) १-२ ।। माशे तेल ४ रत्ती से १ माशा भुइँ आँवला पञ्चाङ्ग ३-५ माशे भूतृण जड़ १-२ माशे मङ्गरेला बीज २-५ माशे मण्डूकपर्णी पञ्चाङ्ग-पत्ते ६ माशे से १ तोला मण्डूक शुद्धभस्म १-३ रत्ती मकोय फल ६-९ माशे मखाना भुने ६ माशे से १ तोला मछेछी पञ्चाङ्ग १-१ ।। तोला मजीठ लकड़ी १-३ माशे मधु आर्द्र १/२-३ तोले मयनसिल शुद्ध (विषयुक्त) १-४ रत्ती मरिच (काली) बीज १-४ माशे मरुआ पचाङ्ग ३-७ माशे मषवन पञ्चाङ्ग ६-१० माशे (माषपर्णी) मांसरोहिणी छाल ६-१०. माशे (रोहिणी) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट २ ११०९ मानकन्द कन्द ६ माशे से १ तोला मानफल फल १-४ माशे मालकांगुनी बीज १-२ माशे मुण्डी फल-पञ्चाङ्ग २ माशे-१ तोला मुचकुन्द फूल ६-९ माशे मुनक्का फल १०-१५ दाने मुरदाशंख खनिजशुद्ध ४ रत्ती से १ माशे मुलेठी लकड़ी ६-९ माशे मुसब्बर पिण्ड १-३ माशे मूँगा समुद्री लाल २-६ रत्ती पत्थर शुद्ध भस्म मूँज जड़ २-६ माशे मूर्वा पञ्चाङ्ग ६-७ माशे मूली कन्द-स्वरस १-५ तोला मूसली जड़ ३ माशे मूसाकानी सर्वाङ्ग २-३ माशे मेढ़ाशिंगी पञ्चाङ्ग ३-६ माशे मेथी बीज २-५ माशे मैनफल फल २-३ माशे मोचरस गोंद २-४ माशे मोथा जड़ ३-४ माशे मोम पिण्ड ३ रत्ती-१ ॥ माशे मौलसिरी छाल, फूल, फल ३ माशे से १ तोला रक्तचन्दन लकड़ी २-४ माशे रसकपूर पिण्ड (विष) शुद्ध १/२ से १ रत्ती रसोत घनसत्त्व १-३ माशे रांगा शुद्ध भस्म १-२ रत्ती राई बीज ३-६ माशे रासना मूल २-५ माशे रीठा फल-छाल १-३ माशे रुद्रवंती पञ्चाङ्ग १-३ माशे रेणुक बीज १-३ माशे रेवतचीनी जड़ २-५ माशे रोहिड़ा छाल ६ माशे से १ तोला (रोहितक) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

१११० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रोहिस घास पञ्चाङ्ग, जड़ १-३ माशे लज्जालु जड़, पत्ते ६ माशे से १ तोला लताकरञ्ज बीज-मींगी २-७ रत्ती लताकस्तूरी बीज १-२ माशे लहसुन कन्द १-३ माशे लक्ष्मणा पञ्चाङ्ग, कन्द १-२ माशे लाख (लाक्षा) २-४ माशे लालमरिच फल १-२ माशे लिसोरां फल १५-२० दाने लोध छाल १-३ माशे लोहबान गोंद २-६ माशे लोहा शुद्ध-भस्म १-२ रत्ती लौंग फूल १-४ माशे वत्सनाभ विष-शुद्ध १/३२ से १/४ रत्ती शंख भस्म ३ रत्ती से १ माशे शाल छाल १-३ माशे शिलाजीत शुद्ध १ रत्ती से १ माशे शिवलिङ्गी पञ्चाङ्ग-बीज ३-९ दाने शीतलचीनी फल २-४ माशे शीशा धातु, शुद्धभस्म १-२ रत्ती संखाहुली पञ्चाङ्ग ६ माशे से १ ।। तोले (शंखपुष्पी) संखिया महाविषभस्म १/३२ रत्ती से १/२ रत्ती संगजराहत पत्थर शुद्धभस्म ३-८ रत्ती सज्जीखार क्षार २-८ रत्ती सतावर जड़ ६ माशे से १ तोला सतिवन (सप्तपर्ण) छाल १-२ माशे सत्यानाशी जड़-बीज २-४ माशे (स्वर्णक्षीर) सनाय पत्ते ३ माशे से १ तोशे समुद्रफल फल १/४ से १/२ फल समुद्रफेन शुष्कफल १-२ रत्ती समुद्रशोष बीज १-२ माशे सम्भालु बीज १-३ माशे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट २ ११११ सरफोंका जड़, पञ्चाङ्ग, पत्ते ३-६ माशे सरसों बीज ३-६ माशे सरिवन जड़, पञ्चाङ्ग ३-९ माशे सहदेई पञ्चाङ्ग ३-६ माशे सहिजना छाल, बीज ३-६ माशे सांभरनोन लवण ३-९ माशे सिंगरफ भस्म १/२ से २ रत्ती सिरस छाल, बीज ३ माशे से १ तोशे सुपारी फल १-४ माशे सुहागा श्वेतपिण्ड-शुद्ध १-३ माशे सेमर मूसला, छाल, फूल ३-९ माशे सेंधानोन लवण ३-८ माशे सोंठ कन्द ३-७ माशे सोआ बीज २-३ माशे सोना धातु शुद्धभस्म १/२ से १ रत्ती सोनापाठा छाल ४-१० माशे सोनामक्खी धातु शुद्धभस्म १-३ रत्ती सोमलता पञ्चाङ्ग ३-६ माशे सोरा क्षार १-२ माशे सौंफ बीज ६ माशे १ तोशे हंसपदि पञ्चाङ्ग ३ माशे से १ तोला हड़जोरी पञ्चाङ्ग १-२ माशे हड़ फल-छिलका ४ माशे से १ ॥ तोला हरताल शुद्ध भस्म १/२-२ रत्ती हलदी जड़ २-६ माशे हाऊबेर फल ३-६ माशे हाथीशुंडी पञ्चाङ्ग २-१० माशे हारसिंगार पत्ते, फूल १-३ माशे हिंगोट पञ्चाङ्ग, बीजगिरी १-१५ रत्ती हींग गोंद २ रत्ती से १. माशे हुरहुर पत्ते, बीज २-४ माशे

(-) वि(v) मुक्(-) त(v) प(v) द(v) भा(-) जि(v) शु(v) भे(—) ऽधि(-) का(-) शि(v)) -> Vasantatilakā! And line 25: श्रीरामसंयुतचरित्रमणेरुदार-चूडामणेर्निजपितृस्वसुरीश्वरस्य ।।१२।। Scan: श्री(-) राम(-) सं(v... no, श्री(-) रा(-) म(v) सं(-) यु(v) त(v) च(v) रि(-) त्र(v) म(v) णे(-) रु(-) दा(-) र(-) -> Vasantatilakā! चू(-) डा(-) म(v) णेर्(-) नि(v) ज(v) पि(v) तृस्(-) व(v) सु(-) री(-) श्व(-) रस(-) य? -> Vasantatilakā!

*   Line 26-27 (Verse 13):
    `पक्वेष्टकाऽऽदिरचितेऽभिनवेऽतिभव्ये-गेहे वसंस्तदुपदेशविशेषवश्यः ।`
    Wait, look at `पक्वेष्टकाऽऽदि`:
    `पक्वेष्टकाऽऽदिरचितेऽभिनवेऽतिभव्ये-गेहे वसंस्तदुपदेशविशेषवश्यः ।`
    Line 27:
    `सानन्दमे

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[प्रथम पुस्तक आवरण / First Book Cover] आयुर्वेदोपजीवक सिद्धान्त [SECONDARY PRINCIPLES OF AYURVEDA] प्रो० ओम् प्रकाश उपाध्याय [द्वितीय पुस्तक आवरण / Second Book Cover] (पृष्ठवंश / Spine): चौ.सं.प्र. ११८ सचित्र भैषज्य कल्पना विज्ञान डा. लाल बहादुर सिंह (मुखपृष्ठ / Front Cover): सचित्र भैषज्य कल्पना विज्ञान डा. लाल बहादुर सिंह [पादटिप्पणी / Footer] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ : रोग परिचय एवं चिकित्सा। (आयुर्वेद) डॉ. सत्य प्रकाश वर्मा (आयुर्वेद, यूनानी तिब्बी चिकित्सा परिषद, लखनऊ के पाठ्यक्रमानुसार फार्मासिस्ट द्वितीय वर्ष के छात्रों हेतु) (चौ.सं.भ. 201) अथर्ववेदीय कर्मज व्याधि भैषज्य विज्ञान । (आयुर्वेद) सम्पादक एवं संकलयिता- डॉ. सुधाकर मालवीय (चौ.सं.भ. 202) द्रव्यगुण संहिता (आयुर्वेद)। प्रस्तुत ग्रन्थ का सम्बन्ध त्रिसूत्र के औषध (उपाय) सूत्र से है जो चिकित्सा व्यवस्था की ओर ध्यान इंगित करता है। लेखक- डॉ. निष्ठेश्वर (चौ.सं.भ. 192) आयुर्वेदीय औषधियोग-प्रयोग विज्ञान (द्रव्यगुण शास्त्र)। (आयुर्वेद) मानव-कल्याण में रत वैद्यों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होने के साथ ही छात्रों को भी योग एवं प्रयोग के वैज्ञानिक पक्ष का विवेचनात्मक ज्ञान प्रदान किया गया है। लेखक- प्रो. (डॉ.) जे.के. ओझा (चौ.सं.भ. 189) संदिग्ध द्रव्यों का वैज्ञानिक अध्ययन। सचित्र (आयुर्वेद) पाषाण भेद केविशेष सन्दर्भ में । लेखक- डॉ. झारखण्डे ओझा (चौ.सं.भ. 186) आयुर्वेदीय औषधयोगप्रकाश (सचित्र)। (आयुर्वेद) सामान्यतः पाये जाने वाले सभी रोगों की चिकित्सा हेतु वनौषधियों से युक्त लेखक- डॉ. के. निष्ठेश्वर (चौ.सं.भ. 179) वृन्दमाधव अथवा सिद्धयोग । (आयुर्वेद) श्रीवृन्द प्रणीतं (आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का अद्वितीय ग्रन्थ) श्रीदयारामावस्थी विरचितं सरस्वती सग्विनाशिनी व्याख्या सहित। सम्पा.-महर्षि वैद्य दयाराम अवस्थी शास्त्री एवं भूमिका लेखक- अचार्य वैद्य ताराचन्द्र शर्मा (चौ.सं.भ. 156) आयुर्वेदीय षोडशांङ्ग चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद)। (केन्द्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद् के पाठ्यक्रमानुसार) बी. ए. एम. एस. पाठ्यक्रमानुसार। लेखक-आचार्य वैद्य ताराचन्द्र शर्मा। सम्पूर्ण 1-3 भाग (चौ.सं.भ. 143) प्रथम व्यावसायिक परीक्षा - 1. आयुर्वेद का इतिहास, 2. पदार्थ विज्ञान 3. रचना शारीर (शारीर रचना विज्ञान) एवं 4. क्रिया शारीर (शारीर क्रिया विज्ञान) सहित। प्रथम भाग द्वितीय व्यावसायिक परीक्षा - 1. द्रव्यगुण विज्ञान, 2. रसशास्त्र एवं भैषज्यकल्पना, 3. अगदतन्त्र व्यवहारायुर्वेद तथा विधि वैद्यक सहित। द्वितीय भाग तृतीय व्यावसायिक परीक्षा- 1. प्रसूतितन्त्र एवं स्त्रीरोग, 2. कौमारभृत्य, 3. रोग एवं विकृति विज्ञान, 4. स्वस्थवृत्त सहित। तृतीय भाग चतुर्थ व्यावसायिक परीक्षा- 1. काय चिकित्सा, 2. पंचकर्म विज्ञान, 3. शल्य तन्त्र, 4. शालाक्य तन्त्र सहित। चतुर्थ भाग मधुमेह (ओजोमह) एवं मधुमेह हर द्रव्य (आयुर्वेद)। प्राच्य एवं पाश्चात्य। लेखक- डा. जे. के. ओझा। (चौ.सं.भ. 132) अनुभूत योग (आयुर्वेद)। रसायन शास्त्री पं. श्याम सुन्दराचार्य वैश्य। (1-5 भाग एकजिल्द में) सम्पूर्ण (चौ.सं.भ. 133) प्रकाशक : चौखम्भा संस्कृत भवन संस्कृत, आयुर्वेद एवं इण्डोलोजिकल पुस्तकों के प्रकाशक एवं वितरक चौक, चित्रा सिनेमा के सामने (बैंक ऑफ बड़ौदा बिल्डिंग) वाराणसी - २२१००१ (भारत) फोन : +९१-५४२-२४२०४१४ E-mail : csb.brajendra@gmail.com ISBN : 81-86937-43-9 (Set) ISBN : 81-86937-44-7 (Vol. I) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA