भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवटादिवर्गः ६८९ (१) श्वास, कास आदि में कफ निकालने के लिये इसको वामक रूप में देते हैं। (२) अर्धावभेदक तथा श्वास में इसका नस्य लाभदायक है। (३) अफीम की विषाक्तता में वमन कराने के लिये इसका पानी देते हैं। (४) इसका लेप कुष्ठ, कण्डू, संधिशोथ, विस्फोट, गण्डमाला एवं बिच्छू, गोजर तथा मधुमक्खी काटने पर किया जाता है। मात्रा-कफघ्न ५ से १० रत्ती; वामक १ से २ ड्राम। अथ पुत्रजीवः (पितौजिया) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पुत्रजीवो गर्भकरो यष्टीपुष्पोऽर्थसाधकः ॥३९॥ पुत्रजीवो गुरुर्वृष्यो गर्भदः श्लेष्मवातहृत् । सृष्टमूत्रमलो रूक्षो हिमः स्वादुः पटुः कटुः ॥४०॥ पितौजिया के संस्कृत नाम-पुत्रजीव, गर्भकर, यष्टीपुष्प और अर्थसाधक ये सब हैं। पितौजिया-स्वादिष्ट, कटु तथा लवण रस युक्त, गुरु, वृष्य (वीर्यवर्धक), गर्भदायक, मूत्र तथा मल की प्रवृत्ति कराने वाला, रूक्ष तथा शीतल है। एवम् कफ तथा वात को नष्ट करने वाला है। [३९-४०] २१. पितौजिया हिं०-जियापोता, पितौजिया। बं०-जिया पुन्ता। म०-पुत्र जीव। गु०-पुत्र जीवक। क०-पुत्र जीव। ते०- कुहुरु जीवि। ले०-Putranjiva roxburghli Wall. (पुत्रञ्जीव रॉक्सबरघाई)। Fam. Euphorbiaceae (यूफर्बिएसी)। पितौजिया-इस देश के गरम प्रान्तों में पाया जाता है। यह जंगली और बागों में भी लगाया हुआ पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और बारहो मास हरा-भरा सुहावना दीखाई पड़ता है। शाखायें प्रायः लटकी हुई रहती हैं। छाल-कालापन युक्त खाकी रंग की होती है। पत्ते-द्विपंक्ति, चमकदार, प्रासवत् या आयताकार एवं पत्रतट प्रायः लहरदार होता है। पुष्प-पुंपुष्प पीताभ तथा स्त्री पुष्प हरिताभ होते हैं। फल-झर बेर के आकार के, श्वेताभ तथा स्थायी कुक्षिवृन्त से युक्त होने के कारण नोकीले होते हैं। जिनके लड़के पैदा होते हो मर जाया करते हैं वे लोग इसके गुठलियों की माला पहनते हैं। गुण और प्रयोग-ज्वर तथा प्रतिश्याय में पत्र तथा फलों का क्वाथ पिलाते हैं। गुठलियों को घिसकर शिरःशूल में लगाया जाता है। फोड़े आदि पर लेप करने से वेदना कम होती है। सभी प्रकार के विषों में इसकी मज्जा को शीत जल में पीसकर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं। अथेङ्गुदः (हिङ्गोद) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह इङ्गुदोऽङ्गारवृक्षश्च तिक्तकस्तापसद्रुमः। इङ्गुदः कुष्ठभूतादिग्रहव्रणविषक्रिमीन् ।। हन्त्युष्णः श्वित्रशूलघ्नस्तिक्तकः कटुपाकवान् ॥४१॥ हिङ्गोद के संस्कृत नाम-इङ्गुद, अङ्गारवृक्ष, तिक्तक और तापसद्रुम ये सब हैं। हिङ्गोद-तिक्तरसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, उष्ण एवं कुष्ठ, भूतादि-ग्रहबाधा, व्रण, विष, क्रिमि, श्वेतकुष्ठ तथा शूल का नाशक है। [४१] ४७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA