भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९० भावप्रकाशनिघण्टुः २२. हिंगोट हिं०-हिंगोट हिंगन, इंगुजा। बं०-हिंगोन। म०-हिंगण। गु०-इङ्गोरीओ। क०-इङ्गलंगिद। ते०-गरा, गारि। ता०-नन्जुन्द। ले०-Balanites roxburghii Planch. (बेलेनाईटीस् रॉक्सबरघाई)। Fam. Simarubaceae (सिमेरूबेसी)। यह भारत के शुष्क भागों में दक्षिण-पूर्व पंजाब एवं दिल्ली से सिक्किम, बंगाल, मध्य भारत बम्बई तथा दक्षिण में होता है। इसका वृक्ष-या गुल्म करीब २० फीट तक होता है। शाखाओं पर मजबूत, सीधे, पर्णयुक्त, पत्रकोणीय या पत्रों के पार्श्व में कांटे होते हैं। पत्ते-द्विपत्रक एवं अवृन्त; पत्रक-अंडाकार, अभिलट्वाकार या अभि-प्रासवत्, ३/८-१ १/४ इञ्च बड़े होते हैं। पुष्प-हरिताभ पीत एवं सुगन्धित होते हैं। फल-अष्ठिल, अंडाकार, १ ३/८-२ ३/८ इञ्च लम्बे, हलकी ५ धारियों वाले एवं पकने पर हलके पीले होते हैं। गूदा मधुर, १/४ इञ्च मोटा एवं उग्रगन्धि होता है। गुठली में एक बीज तैल युक्त होता है। बीज में ४३% पीले रंग का स्वादहीन तेल होता है। इसके गूदे को खाया जाता है तथा सिल्क को साफ करने के काम आता है। रासायनिक संगठन-फल के गूदे में ७.२% सॅपोनिन पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल तथा फल का गूदा कफघ्न, कृमिघ्न, कुष्ठघ्न एवं विरेचक होता है। अपक्व फल तीव्र विरेचक होता है। पुराने कफ विकारों में गूदे को खिलाते हैं। व्रण तथा अग्निदग्ध व्रण पर इसका तेल लगाते हैं। मात्रा-गूदा १-५ रत्ती कफघ्न; १०-३० रत्ती विरेचक। अथ झिङ्गिनी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह जिङ्गिनी झिङ्गिनी झिङ्गी सुनिर्यासा प्रमोदिनी ॥४२॥ जिङ्गिनी मधुरा सोष्णा कषाया योनिशोधिनी। कटुका व्रणहृद्रोगवातातीसारहृत् पटुः ॥४३॥ जिङ्गिनी के संस्कृत नाम-जिङ्गिनि, झिङ्गनी, झिङ्गी, सुनिर्यासा तथा प्रमोदिनी ये सब हैं। जिङ्गिनी-मधुर, कटु, कषाय तथा लवण रसयुक्त, उष्ण, योनि शोधक एवम्-व्रण, हृद्रोग, वात तथा अतीसार को दूर करने वाली है। [४२-४३] २३. जिंगिनी हिं०-जिंगना, जिंगन। म०-मोयी, मुयी। गु०-मवेडी, शिंपटी। क०-उडी मरम। बं०-जिओल। ते०- गमपेना। ले०-Odina woodier Roxb. (ओडिना वुडियर)। Fam. Anacardiaceae (अॅनाकार्डिएसी)। यह इस देश में प्रायः गरम प्रान्तों में अधिक पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और वह अधिक दिन तक नहीं ठहरता। इसके स्तम्भ से एक प्रकार का गोंद निकलता है। पत्ते-पक्षवत्, मोटे एवं टहनियों के अग्र पर दलबद्ध रहते हैं। पत्रक-५-९, विपरीत, लम्बाग्र, लट्वाकार और तिरछे फलक मूल वाले होते हैं। पुष्प-छोटे, पीताभहरित तथा एकलिंग होते हैं एवं दोनों प्रकार के पुष्पों की मंजरियाँ पृथक्-पृथक् रहती हैं। फल-१/२ इञ्च लम्बे, टेढ़े, आयताकार, चिपटे एवं गुठलीदार होते हैं। काण्ड में स्टार्च बहुत होता है इससे इसे हाथी बड़े चाव से खाते हैं। इसकी डालियों को गाड़ देने से लग जाती है। औषध में गोंद तथा छाल का उपयोग करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA