भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 1167 में से

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वटादिवर्गः ६९१ गुण और प्रयोग-इसका गोंद स्नेह्न तथा संग्राहक है। छाल संग्राहक एवं व्रणरोपण है। (१) छाल का क्वाथ पिलाने से प्यास दूर होती है। इससे कुल्ला करने से गले की शिथिलता, खाँसी तथा दंतपीड़ा दूर होती है। इसको अतिसार में देते हैं। (२) छाल के क्वाथ से सिद्ध तेल पुरानें व्रण पर लगाते हैं। (३) पत्तों को उबालकर शोथ पर बाँधते हैं। (४) छाल का स्वरस हथियार से कटे व्रण पर डालने से शीघ्र रोपण होता है। (५) इसका गोंद अतिसार में देते हैं। मोच आदि में इसको नारियल के पानी में पीसकर लेप करते हैं। अथ तमालः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तमाल उक्तस्तापिच्छः कालस्कन्धोऽमितद्रुमः । लोकस्कन्धो नीलध्वजो नीलतालश्च स स्मृतः ।। तमालः शालवद्वेद्यो दाहविस्फोटहृत् पुनः ।।४३।। तमाल के संस्कृत नाम-तमाल, तापिच्छ, कालस्कन्ध, अमितद्रुम, लोकस्कन्ध, नीलध्वज और नीलताल ये सब हैं। तमाल-गुणों में साखू की भाँति समझना चाहिये, किन्तु विशेषतः यह दाह तथा विस्फोट का नाशक है। [४४] नोट-कर्पूरादिवर्ग में तमालपत्र का वर्णन किया जा चुका है किन्तु यह उससे भिन्न वृक्ष है। जिस वृक्ष का नीचे वर्णन किया जा रहा है उसे दक्षिण में तमाल कहते हैं। वास्तव में यही तमाल है कि नहीं इस सम्बन्ध में अभी अनुसंधान की आवश्यकता है। २४. तमाल हिं०-तमाल। बं०-तमाल गाछ। ते०-पसुपुवर्णे। म०-तमाल वृक्ष, गु०-तमाल। ता०-पुमक्की। क०-जारिगेहुल। अं०-Indian Gamboge Tree (इण्डियन गॅम्बोज ट्री)। ले०-Garcinia morella Desr. (गार्सिनिया मोरेला)। Fam. Guttiferae (गट्टिफेरी)। तमाल-पूरब बंगाल के जंगलों में, खासिया पहाड़ एवं प० घाट में उत्तर किनारा से दक्षिण में ट्रावनकोर तक, ३००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका वृक्ष-छोटा तथा सदाहरित होता है और शाखाएँ फैली हुई होती हैं। पत्ते-३ से ५ × १ १/२ से २ १/२ इञ्च, अंडाकार, भालाकार एवं दोनों तरफ क्रमशः संकुचित होते हैं। फूल-एकलिंगी जिनमें पुंपुष्प की अपेक्षा स्त्री पुष्प बड़े होते हैं। फल-गोल, ३/४ इञ्च व्यास में, चारखण्ड युक्त एवं बीज-४, गहरे भूरे, अण्डाकार या वृक्काकार होते हैं। गॅम्बोज (Gamboge)-तमाल वृक्ष की छाल में घाव करने से एक पीले रंग का तरल राल जैसा पदार्थ प्राप्त होता है जिसे सूखने पर गॅम्बोज (Gamboge) कहते हैं। यह भूरे पीले रंग के टुकड़ों में प्राप्त होता है तथा इसका स्वाद कुछ कटु होता है। जल के साथ इसका पीला घोल (इमल्शन) बनता है जो अमोनिया मिलाने से स्वच्छ एवं गहरे नारंग रक्त वर्ण का हो जाता है। इसे गोटगनबा भी कहा जाता है। इसकी अन्य जातियों से भी प्राप्त होता है किन्तु वह निकृष्ट श्रेणी का होता है। भारत में अपने यहाँ के वृक्षों से इसका संग्रह कम किया जाता है और अधिकतर बजार में बिकने वाला गॅम्बोज स्याम, कम्बोडिया आदि से आता है। यह गा० हॅनबुरी (G. hanburyi) नामक जाति जो स्याम में होती है उससे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

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