भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 743, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें६९२ भावप्रकाशनिघण्टुः निकाला जाता है। दस वर्ष पुराने वृक्ष की छाल में, वर्षा ऋतु में, कुन्तल (Spiral) चीरा लगाते हैं तथा नीचे बाँस के टुकड़े लगा देते हैं जिसमें इसे संग्रह कर फिर पतले बाँसों में १ महीना रखते हैं, जिससे यह जम जाता है। बाद में इन्हें आग पर गरम करते हैं जिससे बाँस चटक कर यह अलग हो जाता है। यह २-५ से० मी० व्यास के लम्बे, बेलनाकार, रक्ताभ पीत या भुरापन लिये नारंग वर्ण के टुकड़ों में होता है जिसकी सतह पर बाँस के अन्दर की धारियों के निशान दिखलाई देते हैं। कभी-कभी यह अंदर से पोला होता है। इसे बाजार में उसारे रेवन्द कहा जाता है किन्तु यह रेवन्द चीनी (हीअम् एमोडी-Rheum emodi नामक गुल्म की मूल) का उसारा (सत्व) नहीं हैं। इसे कुछ विद्वान् कंकुष्ठ भी मानते हैं। औषध के अतिरिक्त इसका रंग के लिये उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में ३०% गाढ़ा स्नेह होता है। यह भूरापन लिये पीला होता है तथा खाद्य के रूप में काम में आता है। इसके बीजावरण, काण्डत्वक्, पत्र तथा फलों में एक पीला रंजक द्रव्य मोरेलीन (Morellin, C₃₃, H₃₈ O₇) पाया जाता है जो पूयोत्पादक दण्डाणु, माइक्रोकोकस् पायोजेनीज हेराइट्टी ऑरियस् (Micrococcus pyogenes var. aureus) का नाशक है। गैम्बोज में मुख्यतया राल तथा गोंद जैसे पदार्थ होते हैं। गुण और प्रयोग-गैम्बोज तीक्ष्ण विरेचन है। इससे पानी जैसे पतले दस्त होते हैं। इसकी क्रिया इन्द्रायण के फल की तरह होती है। इसे कृमिघ्न भी मानते हैं। रक्तभाराधिक्य में शीघ्र विरेचन कराने की आवश्यकता होने पर इसे देते हैं। जलोदर, अनार्तव तथा कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। अधिक मात्रा से पाचन संस्थान के अंगों पर तीव्र प्रक्षोभक क्रिया होकर मरोड़, वमन आदि होकर मृत्यु भी हो सकती है। १ ड्राम मात्रा से मृत्यु हुई है। मात्रा-१/४-१/२ गुंजा सुगन्धि द्रव्य के साथ। अथ तूणी। तस्या नामगुणानाह तूणी तुन्नक आपीनस्तुणिकः कच्छकस्तथा। कुठेरकः कान्तलको नन्दीवृक्षश्च नन्दकः ।।४५।। तूणी रक्तः कटुः पाके कषायो मधुरो लघुः । तिक्तो ग्राही हिमो वृष्यो व्रणकुष्ठास्रपित्तजित् ।।४६।। तून के संस्कृत नाम-तूणी, तुन्नक, आपीन, तुणिक, कच्छक, कुठेरक, कान्तलक, नन्दीवृक्ष और नन्दक ये सब हैं। तून-कषाय, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, रक्तवर्ण, लघु, ग्राही, शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम् व्रण, कुष्ठ, रक्तविकार, पित्त या रक्तपित्त का नाशक है। [४५-४६] २५. तून हिं०-तुन, तून, तूनी, महानिम। बं०-तूनगाछ। म०-तूणी, कूरक। गु०-तूणी। ता०-तूनमरम्। ते०- नन्दि वृक्षमु। क०-बिलिगंधगिरि। अं०-The Toon (दि तून)। ले०-Cedrela toona Roxb. (सेड्रेला तून)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में ४००० फीट तक, आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, पश्चिमी घाट एवं दक्षिण प्रायद्वीप में होता है। इसका वृक्ष-ऊँचा या मध्यम ऊँचाई का, ७०-१०० फीट तक होता है। पत्ते-सदल पर्ण, १-२ १/२ फीट लम्बे; पत्रक ५-१२ जोड़े, भालाकार या आयताकार-भालाकार, ३-७ इन्च लम्बे, अखण्ड, सवृन्त तथा तिरछे फलक मूल वाले होते हैं। पुष्प-छोटे, सुगंधित तथा नवीन टहनियों पर निकलते हैं। फली-१ इन्च तक लम्बी आयताकार होती है।