भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
वटादिवर्गः ६९१ गुण और प्रयोग-इसका गोंद स्नेह्न तथा संग्राहक है। छाल संग्राहक एवं व्रणरोपण है। (१) छाल का क्वाथ पिलाने से प्यास दूर होती है। इससे कुल्ला करने से गले की शिथिलता, खाँसी तथा दंतपीड़ा दूर होती है। इसको अतिसार में देते हैं। (२) छाल के क्वाथ से सिद्ध तेल पुरानें व्रण पर लगाते हैं। (३) पत्तों को उबालकर शोथ पर बाँधते हैं। (४) छाल का स्वरस हथियार से कटे व्रण पर डालने से शीघ्र रोपण होता है। (५) इसका गोंद अतिसार में देते हैं। मोच आदि में इसको नारियल के पानी में पीसकर लेप करते हैं। अथ तमालः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तमाल उक्तस्तापिच्छः कालस्कन्धोऽमितद्रुमः । लोकस्कन्धो नीलध्वजो नीलतालश्च स स्मृतः ।। तमालः शालवद्वेद्यो दाहविस्फोटहृत् पुनः ।।४३।। तमाल के संस्कृत नाम-तमाल, तापिच्छ, कालस्कन्ध, अमितद्रुम, लोकस्कन्ध, नीलध्वज और नीलताल ये सब हैं। तमाल-गुणों में साखू की भाँति समझना चाहिये, किन्तु विशेषतः यह दाह तथा विस्फोट का नाशक है। [४४] नोट-कर्पूरादिवर्ग में तमालपत्र का वर्णन किया जा चुका है किन्तु यह उससे भिन्न वृक्ष है। जिस वृक्ष का नीचे वर्णन किया जा रहा है उसे दक्षिण में तमाल कहते हैं। वास्तव में यही तमाल है कि नहीं इस सम्बन्ध में अभी अनुसंधान की आवश्यकता है। २४. तमाल हिं०-तमाल। बं०-तमाल गाछ। ते०-पसुपुवर्णे। म०-तमाल वृक्ष, गु०-तमाल। ता०-पुमक्की। क०-जारिगेहुल। अं०-Indian Gamboge Tree (इण्डियन गॅम्बोज ट्री)। ले०-Garcinia morella Desr. (गार्सिनिया मोरेला)। Fam. Guttiferae (गट्टिफेरी)। तमाल-पूरब बंगाल के जंगलों में, खासिया पहाड़ एवं प० घाट में उत्तर किनारा से दक्षिण में ट्रावनकोर तक, ३००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका वृक्ष-छोटा तथा सदाहरित होता है और शाखाएँ फैली हुई होती हैं। पत्ते-३ से ५ × १ १/२ से २ १/२ इञ्च, अंडाकार, भालाकार एवं दोनों तरफ क्रमशः संकुचित होते हैं। फूल-एकलिंगी जिनमें पुंपुष्प की अपेक्षा स्त्री पुष्प बड़े होते हैं। फल-गोल, ३/४ इञ्च व्यास में, चारखण्ड युक्त एवं बीज-४, गहरे भूरे, अण्डाकार या वृक्काकार होते हैं। गॅम्बोज (Gamboge)-तमाल वृक्ष की छाल में घाव करने से एक पीले रंग का तरल राल जैसा पदार्थ प्राप्त होता है जिसे सूखने पर गॅम्बोज (Gamboge) कहते हैं। यह भूरे पीले रंग के टुकड़ों में प्राप्त होता है तथा इसका स्वाद कुछ कटु होता है। जल के साथ इसका पीला घोल (इमल्शन) बनता है जो अमोनिया मिलाने से स्वच्छ एवं गहरे नारंग रक्त वर्ण का हो जाता है। इसे गोटगनबा भी कहा जाता है। इसकी अन्य जातियों से भी प्राप्त होता है किन्तु वह निकृष्ट श्रेणी का होता है। भारत में अपने यहाँ के वृक्षों से इसका संग्रह कम किया जाता है और अधिकतर बजार में बिकने वाला गॅम्बोज स्याम, कम्बोडिया आदि से आता है। यह गा० हॅनबुरी (G. hanburyi) नामक जाति जो स्याम में होती है उससे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
६९२ भावप्रकाशनिघण्टुः निकाला जाता है। दस वर्ष पुराने वृक्ष की छाल में, वर्षा ऋतु में, कुन्तल (Spiral) चीरा लगाते हैं तथा नीचे बाँस के टुकड़े लगा देते हैं जिसमें इसे संग्रह कर फिर पतले बाँसों में १ महीना रखते हैं, जिससे यह जम जाता है। बाद में इन्हें आग पर गरम करते हैं जिससे बाँस चटक कर यह अलग हो जाता है। यह २-५ से० मी० व्यास के लम्बे, बेलनाकार, रक्ताभ पीत या भुरापन लिये नारंग वर्ण के टुकड़ों में होता है जिसकी सतह पर बाँस के अन्दर की धारियों के निशान दिखलाई देते हैं। कभी-कभी यह अंदर से पोला होता है। इसे बाजार में उसारे रेवन्द कहा जाता है किन्तु यह रेवन्द चीनी (हीअम् एमोडी-Rheum emodi नामक गुल्म की मूल) का उसारा (सत्व) नहीं हैं। इसे कुछ विद्वान् कंकुष्ठ भी मानते हैं। औषध के अतिरिक्त इसका रंग के लिये उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में ३०% गाढ़ा स्नेह होता है। यह भूरापन लिये पीला होता है तथा खाद्य के रूप में काम में आता है। इसके बीजावरण, काण्डत्वक्, पत्र तथा फलों में एक पीला रंजक द्रव्य मोरेलीन (Morellin, C₃₃, H₃₈ O₇) पाया जाता है जो पूयोत्पादक दण्डाणु, माइक्रोकोकस् पायोजेनीज हेराइट्टी ऑरियस् (Micrococcus pyogenes var. aureus) का नाशक है। गैम्बोज में मुख्यतया राल तथा गोंद जैसे पदार्थ होते हैं। गुण और प्रयोग-गैम्बोज तीक्ष्ण विरेचन है। इससे पानी जैसे पतले दस्त होते हैं। इसकी क्रिया इन्द्रायण के फल की तरह होती है। इसे कृमिघ्न भी मानते हैं। रक्तभाराधिक्य में शीघ्र विरेचन कराने की आवश्यकता होने पर इसे देते हैं। जलोदर, अनार्तव तथा कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। अधिक मात्रा से पाचन संस्थान के अंगों पर तीव्र प्रक्षोभक क्रिया होकर मरोड़, वमन आदि होकर मृत्यु भी हो सकती है। १ ड्राम मात्रा से मृत्यु हुई है। मात्रा-१/४-१/२ गुंजा सुगन्धि द्रव्य के साथ। अथ तूणी। तस्या नामगुणानाह तूणी तुन्नक आपीनस्तुणिकः कच्छकस्तथा। कुठेरकः कान्तलको नन्दीवृक्षश्च नन्दकः ।।४५।। तूणी रक्तः कटुः पाके कषायो मधुरो लघुः । तिक्तो ग्राही हिमो वृष्यो व्रणकुष्ठास्रपित्तजित् ।।४६।। तून के संस्कृत नाम-तूणी, तुन्नक, आपीन, तुणिक, कच्छक, कुठेरक, कान्तलक, नन्दीवृक्ष और नन्दक ये सब हैं। तून-कषाय, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, रक्तवर्ण, लघु, ग्राही, शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम् व्रण, कुष्ठ, रक्तविकार, पित्त या रक्तपित्त का नाशक है। [४५-४६] २५. तून हिं०-तुन, तून, तूनी, महानिम। बं०-तूनगाछ। म०-तूणी, कूरक। गु०-तूणी। ता०-तूनमरम्। ते०- नन्दि वृक्षमु। क०-बिलिगंधगिरि। अं०-The Toon (दि तून)। ले०-Cedrela toona Roxb. (सेड्रेला तून)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में ४००० फीट तक, आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, पश्चिमी घाट एवं दक्षिण प्रायद्वीप में होता है। इसका वृक्ष-ऊँचा या मध्यम ऊँचाई का, ७०-१०० फीट तक होता है। पत्ते-सदल पर्ण, १-२ १/२ फीट लम्बे; पत्रक ५-१२ जोड़े, भालाकार या आयताकार-भालाकार, ३-७ इन्च लम्बे, अखण्ड, सवृन्त तथा तिरछे फलक मूल वाले होते हैं। पुष्प-छोटे, सुगंधित तथा नवीन टहनियों पर निकलते हैं। फली-१ इन्च तक लम्बी आयताकार होती है।
वटादिवर्गः ६९३ बीज-दोनों सिरों पर सपक्ष होते हैं। इसकी लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम आती है। छाल तथा पुष्प का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन-फूलों में लाल रंजक द्रव्य निकटॅन्थिन् (Nyctanthin, C₁₅ H₁₈ O₃) होता है जो पारिजाता के रंजक द्रव्य के समान होता है। छाल में टेनिक एसिड, कडुवी राल, साइट्रिक एसिड, स्टार्च तथा अन्य द्रव्य होते हैं। इसमें कोई क्षाराभ नहीं पाया जाता है। राख में चूना (Calcium) काफी होता है। काष्ठ में ०.४४% स्वर्ण पीत रंग का उड़नशील तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल ग्राही, बल्य, पौष्टिक एवं अल्प प्रमाण में ज्वर प्रतिबंधक है। पुष्प गर्भाशय संकोचक है। (१) बच्चों के जीर्ण अतिसार आदि में छाल का प्रयोग करते हैं। विषम ज्वर में दस्त होते हों तो इसको दिया जाता है। (१) गर्भाशय की शिथिलता के कारण यदि अत्यार्तव हो तो पुष्प या छाल का फांट देते हैं। (३) छाल का लेप या चूर्ण व्रण पर लगाने से व्रण का संकोचन अच्छा होता है। मात्रा-छाल २ १/२ तोला फांट बनाकर काली मिर्च के साथ। अथ भूर्जपत्रः (भोजपत्र) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह भूर्जपत्रः स्मृतो भूर्जश्चर्मी बहुलवल्कलः । भूर्जो भूतग्रहश्लेष्मकर्णरुक्पित्तरक्तजित् ।।४७।। कषायो राक्षसघ्नश्च मेदोविषहरः परः ।।४८।। भोजपत्र के संस्कृत नाम-भूर्जपत्र, भूर्ज, चर्मी तथा बहुलवल्कल ये सब हैं। भोजपत्र-कषाय रसयुक्त एवम् भूतग्रहबाधा, कफ तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, पित्त, रक्तविकार तथा राक्षसबाधा का नाशक है और विशेषतः यह मेद तथा विष को दूर करने वाला है। [४७-४८] २६. भोजपत्र हिं०-भोजपत्र, भूजपत्र, भोजपत्तर। बं०-भूजिपत्र। म०-भूर्जपत्र। ते०-भोजपत्रमु। अं०-Himalayan Silver Birch (हिमालयन् सिल्वर बर्च)। ले०-Betula utilis D. Don. (बेटुला यूटिलिस्)। Fam. Betulaceae (बेटुलेसी)। यह गरम हिमालय में काश्मीर में ७ से १२ हजार फीट तक और सिक्कम में ९ से १४ हजार फीट तक और भूटान में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-४०-६५ फीट तक ऊँचा होता है। छाल-चिकनी, चमकीली, सफेद या किञ्चित् लाली युक्त सफेद, आड़े धब्बेदार (Lenticel) पर्त के पर्त, कागज के समान एक साथ सटी रहती है और वह आसानी से पृथक्-पृथक् हो जाती है। पत्ते-२-३ इञ्च तक लम्बे, १ १/२ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, लम्बाग्र, दन्तुर एवं नये पत्ते पीत रालीय बिन्दुओं से युक्त होने के कारण चिपचिपे होते हैं। फूल-बारीक मञ्जरियों में आते हैं और फल-काष्ठवत् गोल होते हैं। वृक्ष की छाल को ही भोजपत्र कहते हैं। प्राचीन काल में इनका लिखने के काम में प्रयोग किया जाता था। इसकी एक अन्य जाति बे. अल्नाइडीस (B. alnoides Buch.) होती है जिसके पेड़ १०० फीट तक ऊँचे होते हैं। छाल मोटे परतों में छूटती है तथा धब्बे छोटे होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें बेटुलिन (Betulin) तथा उड़नशील तैल पाया जाता है।
६९४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग—इसकी छाल का क्वाथ वातानुलोमक एवं प्रतिदूषक होता है। इसे कामला, पैत्तिक ज्वर एवं योषापस्मार में दिया जाता है। कर्णस्राव तथा विषाक्त व्रण प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। इसके पत्र उत्तेजक एवं स्तम्भन माने जाते हैं। भूतबाधा एवं ग्रह दोष में इसका धूप दिया जाता है। मात्रा—क्वाथ ५ से १० तोला; चूर्ण १-३ माशा। अथ पलाशः (ढाक) । तस्य नामानि गुणांश्चाह पलाशः किंशुकः पर्णी यज्ञियो रक्तपुष्पकः। क्षारश्रेष्ठो वातपोथो ब्रह्मवृक्षः समिद्वरः ॥४९॥ पलाशो दीपनो वृष्यः सरोष्णो व्रणगुल्मजित् । भग्नसंधानकृद् दोषग्रहण्यर्शः क्रिमीन् हरेत् ।। कषायः कटुकस्तिक्तः स्निग्धो गुदजरोगजित् ॥५०॥ ढाक के संस्कृत नाम—पलाश, किंशुक, पर्ण, यज्ञिय, रक्तपुष्पक, क्षारश्रेष्ठ, वातपोथ, ब्रह्मवृक्ष तथा समिद्वर ये सब हैं। ढाक—कषाय, कटु तथा तिक्त रस युक्त, अग्निदीपक, वृष्य (वीर्यवर्धक), सारक, उष्ण, टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला, स्निग्ध एवम्-व्रण, गुल्म, वातादिक दोष, ग्रहणी, अर्श (बबासीर), क्रिमि तथा गुदा में उत्पन्न होने वाले रोगों को दूर करता है। [४८-५०] अथ तत्पुष्पफलयोर्गुणानाह तत्पुष्पं स्वादु पाके तु कटु तिक्तं कषायकम् ॥५१॥ वातलं कफपित्तास्रकृच्छ्रजिद ग्राहि शीतलम्। तृड्दाहशमकं वातरक्तकुष्ठहरं परम् ॥५२॥ फलं लघूष्णं मेहार्शःकृमिवातकफापहम्। विपाके कटुकं रूक्षं कुष्ठं गुल्मोदरप्रणुत् ॥५३॥ ढाक के फूल—स्वादिष्ट, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त, वातजनक, कफ-पित्त, रक्तविकार तथा मूत्रकृच्छ्रनाशक, ग्राही, शीतल, तृषा और दाह को शमन करने वाले एवम् वातरक्त तथा कुष्ठ को अत्यन्त दूर करने वाले होते हैं। ढाक के फल—लघु, उष्ण, विपाक में कटु रस युक्त, रूक्ष एवम्-प्रमेह, अर्श, कृमि, वात, कफ, कुष्ठ, गुल्म तथा उदररोग के नाशक हैं। [५१-५३] २७. ढाक हिं०—ढाक, पलाश, परास, टेसू। बं०—पलाश गाछ। म०—पलस। गु०—खाखरो। मु०—खाकरो। क०— मुत्तग। ते०—मोदुगु । ता०—पलासु । अं०—The Forest flame (दि फॉरेस्ट फ्लेम) । ले०—Butea frondosa Koen. ex Roxb. (ब्यूटिया फ्रॉण्डोसा) । Fam. Leguminosae (लेग्यूमूनोसी) । यह अत्यन्त शुष्क भागों को छोड़कर प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है और इसको वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं। इसके वृक्ष—छोटे या मध्यम ऊँचाई के होते हैं तथा समूहों में रहते हैं। पत्ते—त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक—१० से २० से० मी० चौड़े, कर्कश, ऊपर से कुछ चिकने किन्तु नीचे मृदु रोमश तथा उभरी हुई शिराओं से युक्त होते हैं। अग्र पत्रक तिर्यगायताकार, वृन्त की तरफ कुछ पतला या अभि अंडाकार, कुण्ठिताग्र या खण्डिताग्र एवं बगल के तिर्यक् अंडाकार होते हैं। पुष्प—बड़े, सुन्दर, नारंग रक्तवर्ण के होते हैं जो प्रायः पत्रहीन शाखाओं पर एकसाथ बहुत होते हैं। स्वरूप में ये दूर से सुग्गे की चोंच की तरह मालूम होने से इसे किंशुक कहा जाता है। फली—१२.५-२० × २.५-
वटादिवर्गः ६९५ ५ से० मी० बड़ी, अग्र की तरफ एक बीज युक्त होती है। बीज-चिपटे, वृक्काकांर, २५-३८ मि० मी० लम्बे, १६- २५ मि० मी० चौड़े, १.५-२.० मि० मी० मोटे, रक्ताभ भूरे, चमकीले सिकुड़नयुक्त, स्वाद में कुछ कटु एवं तिक्त तथा गंध हलकी होती है। इसका गोंद (Bengal Kino-बंगाल किनो)-रक्तवर्ण, सूखने पर कृष्णाभरक्त, भंगुर और चमकदार होता है। इसके बीज, पुष्प तथा गोंद का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-बीजों में १८% स्वादहीन तेल, अलब्यूमिनाभ द्रव्य, शर्करा तथा पुष्पों में ग्लूकोसाइड १.५% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज कृमिघ्न, भेदन तथा कुष्ठघ्न हैं। पुष्प-मूत्रजनन हैं। गोंद उत्तम ग्राही है। (१) इसके ताजे, कीड़ों द्वारा न खाये हुये बीज, केचुवे (राउण्डे वर्म) के लिये सैण्टोनिन की तरह लाभप्रद होते हैं। इसका स्वाद अच्छा नहीं रहता तथा कभी-कभी इससे मिचली, पेट में दर्द या वमन हो सकता है। छिलका निकाल कर बीज देने से दस्त नहीं होता किन्तु छिलके के साथ देने से दस्त होता है। (२) बीजों को नींबू के रस के साथ घिसकर दाद आदि चर्म रोगों में लगाते हैं। (३) गोंद अतिसार, प्रवाहिका तथा भोजनोपरान्त गले में खट्टा पानी आता हो तब देते हैं। (४) फूलों का फांट शोरे के साथ मूत्रावरोध में पिलाया जाता है तथा फूलों से पेडू, कमर आदि सेंकते हैं। मात्रा-बीजपूर्ण ५-१० रत्ती, गोंद ५-१५ रत्ती। अथ शाल्मलिः (सेमर)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह शाल्मलिस्तु भवेन्मोचा पिच्छिला पूरणीति च। रक्तपुष्पा स्थिरायुश्च कण्टकाढ्या च तूलिनी ॥ ५४ ॥ शाल्मली शीतला स्वाद्धी रसे पाके रसायनी। श्लेष्मला पित्तवातास्रहारिणी रक्तपित्तजित् ॥ ५५ ॥ सेमर के संस्कृत नाम-शाल्मलि, मोचा, पिच्छिला, पूरणी, रक्तपुष्पा, स्थिरायु, कण्टकाढ्या तथा तूलिनी ये सब हैं। सेमर-रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, रसायन, कफजनक एवम्-पित्त, वात, रक्तविकार या वातरक्त तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। इसके पुष्पों के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुये हैं। २८. सेमर हिं०-सेमर, सेमल। बं०-शिमुल गाछ, रक्ती सिमुल। म०-कांते सांवर, लाल सांवर। गु०-शेमलो, सीमुलो। ते०-बुरूग चेट्टु। ता०-शालवधु। मा०-शेमल, सरमली। अं०-Silk Cotton Tree (सिल्क काटन ट्री)। ले०-Bombax malabaricum DC. (बॉम्बैक्स मालावारिकम्)। Fam. Bombacaceae (बाम्बेकेसी)। सेमर-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के वन, उपवन और वाटिकाओं में उत्पन्न होता है। इसके वृक्ष-बहुत विशाल और मोटे हुआ करते हैं। डालियों पर छोटे-छोटे नुकीले काँटे होते हैं। सतिवन के पत्तों के समान इसके पत्ते-एक-एक डण्डी के अन्त में ५-७ फैले हुये होते हैं। फूल-लाल। पुष्पदल-मोटा, लुआवदार एवं २-३ इञ्च तक लम्बा होता है। फल-५-६ इञ्च लम्बे, लम्ब गोलाकार, काष्ठवत् एवं हरे होते हैं और उनके भीतर रेशम जैसी रूई तथा काले बीज होते हैं। इसके १-१।। साल के छोटे वृक्ष के मूल निकालकर सुखा लेते हैं जिन्हें सेमल मूसली कहा जाता है। इसके पुष्प, गोंद तथा कंद का उपयोग किया जाता है। गोंद का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६९६ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—बीजों में स्नेह २२.३% होता है। गुण और प्रयोग—सेमल मूसली स्नेहन, संग्राहक, पौष्टिक, बृंहण तथा वयःस्थापन है। जननेन्द्रिय पर इसकी कुछ उत्तेजक क्रिया होती है। (१) इसका १ तोला चूर्ण १ तोला चीनी के साथ १० तोले जल में घोलकर वाजीकरण के लिये पिलाते हैं। (२) कोमल फल मूत्रजनन होते हैं तथा मूत्रकृच्छ्र में बहुत लाभ करते हैं। यह पाठा की तरह मूत्रेन्द्रिय के लिये शामक होते हैं। (३) इसके पुष्प, पोस्ते का बीज, चीनी एवं दूध उबालकर अर्श में दिन में ३ बार पिलाते हैं। (४) गाँठों की सूजन पर पत्तों को पीसकर लगाते हैं। (५) इसके कांटों को मुहाँसे आदि पर लगाने से लाभ होता है। मात्रा—सेमल मूसली चूर्ण ½-१ तोला; फल चूर्ण १ से ३ माशा; पुष्प १ से २ तोला। अथ मोचरसः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह निर्यासः शाल्मलेः पिच्छा शाल्मलीवेष्टकोऽपि च। मोचास्रावोमोचरसो मोचनिर्यास इत्यपि ॥५६॥ मोचास्रावो हिमो ग्राही स्निग्धो वृष्यः कषायकः । प्रवाहिकाऽतिसारामकफपित्तास्रदाहनुत् ॥५७॥ मोचरस के संस्कृत नाम—शाल्मलिनिर्यास, पिच्छा, शाल्मलीवेष्टक, मोचास्राव, मोचरस और मोचनिर्यास ये सब हैं। मोचरस—कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, स्निग्ध, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम्–प्रवाहिका अतिसार, आम, कफ, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [५६-५७] २९. मोचरस हिं०-मोचरस, सेमर का गोंद। बं०-मोचरस, शिमुलेर आटा। म०-सांवरी चा डीक। गु०-शेमलानो गुन्द। अं०-Gum of Silk Cotton Tree (गम् आफ् सिल्क काटन ट्री)। सेमर वृक्ष के गोंद को “मोचरस” कहते हैं। यह सेमर वृक्ष के स्तम्भ से जहाँ कीड़े आदि डंक से छिद्र कर देते हैं निकलता है। यह ताजेपन में भूरे रंग का, फिर लाल होता है तथा पुराना होने पर काला सीसम के रंग का हो जाता है। यह भंगुर, पोला तथा हलका होता है। जल में डालने पर यह फूलता है। इसका स्वाद कषाय होता है। रासायनिक संगठन—इसमें कँटेचूटैनिक एसिड (Catechutannic acid) रहता है। गुण और प्रयोग-यह कषाय, शोणितास्थापन, वेदनास्थापन, स्नेहन, जोरदार संग्राहक एवं बल्य होता है। इसका उपयोग जीर्ण अतिसार, संग्रहणी आँव तथा अत्यार्तव में किया जाता है। मात्रा-१ से ३ माशा। अथ कूटशाल्मलिः (कालासेमर) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुत्सितः शाल्मलिः प्रोक्तो रोचनः कूटशाल्मलिः। कूटशाल्मलिकस्तिक्तः कटुकः कफवातनुत् ॥५८॥ भेद्युष्णः प्लीहजठरयकृद्गुल्मविषापहः। भूतानाहविबन्धास्रमेदः शूलकफापहः ॥५९॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
वटादिवर्गः ६९७ काला सेमर के संस्कृत नाम—कुत्सितशाल्मलि, रोचन, कूटशाल्मलि और कूटशाल्मलिक ये सब हैं। काला सेमर—तिक्त तथा कटु रसयुक्त, कफ वातनाशक, मल का भेदन करने वाला, उष्ण एवम्—प्लीहा, उदररोग, यकृत, गुल्म, विष, भूतबाधा, आनाह, मलबन्ध, रक्तविकार, मेद, शूल तथा कफ का नाशक है। [५८-५९] ३०. कूटशाल्मली हिं०—सफेद सेमल, हतिआन, कटन। बं०—श्वेत सेमुल। म०—पांढरी सांवर। ते०—बुरूगु। ता०—हलवम्। क०—बिलिबूरग। अं०—White Silk Cotton Tree (व्हाइट सिल्क काटन ट्री); True Kapok Tree (ट्रू कँपोक ट्री)। ले०—Ceiba pentandra (Linn.) Gaertn.; Syn. Eriodendron anfractuosum DC. (सेवा पेण्ट्एण्ड्रा; एरिओडेण्ड्रोन ॲन्फ्रॅक्ट्यूओझम्)। Fam. Bombacaceae (बाम्बेकेसी)। यह पश्चिम तथा दक्षिण के उष्ण प्रदेशों के जंगलों में पाया जाता है। इसका वृक्ष—मध्यमाकार का ५०-१०० फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ—भूमि के समानान्तर एवं चारों तरफ फैली रहती हैं। केवल नवीन शाखाओं पर काँटे होते हैं। पत्ते—सेमर जैसे करतलाकार संयुक्त होते हैं। फूल—श्वेत रंग के आते हैं। फल—६ इञ्च लम्बे, २ इञ्च व्यास के, गोलाकार लम्बे होते हैं जिनके भीतर चमकीली सिल्क की तरह रूई से लिपटे काले बीज रहते हैं। इससे गहरे लाल रंग का अपारदर्शी गोंद प्राप्त होता है जिसे दक्षिण में हत्तिमानके गोंद कहते हैं। एक साल से कम आयु के वृक्षों की जड़ सफेद मुसली या सिमुल मुसला के नाम से बेची जाती है किन्तु वास्तविक सफेद मुसली इससे भिन्न है जिसका वर्णन पृष्ठ ३९१ पर किया गया है। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २०-२५% हलके पीले या भूरे रंग का तेल निकलता है। गुण और प्रयोग—इसकी मुसली मूत्रजनन, बल्य तथा वाजीकर होती है। गोंद संग्राहक होता है। कोमल पत्ते और फल स्नेहन और संग्राहक होते हैं। (१) मुसली की पेया अतिवीर्यपात से उत्पन्न थकावट में दी जाती है। उदर तथा शोथ में भी मूत्रजनन होने के कारण देते हैं जिससे सूजन कम होती है। (२) बच्चे रात में सोते समय पेशाब करते हैं उस अवस्था में इसका गोंद दिया जाता है। अतिसारादि में भी इसे देते हैं। (३) सोजाक में कोमल पत्ते पीसकर देते हैं। मात्रा—सेमर के समान। अथ धवः (धौरा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह धवो धटो नन्दितरुः स्थिरो गौरो धुरन्धरः । धवः शीतः प्रमेहार्शः पाण्डुपित्तकफापहाः ।। मधुरस्तुवरस्तस्य फलञ्च मधुरं मनाक् ।।६०।। धौरा के संस्कृत नाम—धव, घट, नन्दितरु, स्थिर, गौर तथा धुरन्धर ये सब हैं। धौरा—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, शीतल एवं—प्रमेह, अर्श, पाण्डु, पित तथा कफ का नाशक है। धौरा का फल—थोड़ा मधुर रसयुक्त होता है। [६०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६९८ भावप्रकाशनिघण्टुः ३१. धौरा हिं०-धौरा, धौ, धव, धों, धववृक्ष। बं०-धाउया गाछ। म०-धावड़ा, धामोड़ा, धवल। गु०-धावड़ो। क०-दिदुंग। ते०-येल्लमद्दि। अं०-Axle-wood (ॲक्सेल-वुड)। ले०-Anogeissus latifolia Wall. (एनोजिसस् लेटीफोलिया)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रेटेसी)। यह पूर्व बंगाल तथा आसाम को छोड़कर प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है। इसका वृक्ष-बड़ा या मध्यम ऊँचाई का होता है। छाल-१/४ इञ्च मोटा, चिकनी, श्वेताभ धूसर एवं पपड़ी छूटने के कारण कुछ गढ़ेदार होती है। पत्ते-चौड़े, आयताकार, अंडाकार, २-४ इञ्च लम्बे, कुण्ठित या गोलाग्र, सनाल एवं पृष्ठ पर बिन्दुकित होते हैं। फरवरी में गहरे लाल रंग के पत्र गिरते हैं तथा मार्च अप्रैल तक वृक्ष पर्णहीन रहता है। पुष्प-छोटे, हरिताभ, मुण्डक के रूप में सितम्बर से जनवरी तक आते हैं। फल-चिपटे, द्विपक्ष, चोंचदार एवं दिसम्बर से मार्च तक पकते हैं। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत और लचकदार होती है और गाड़ी के धूरे तथा औजारों की मुठियाँ आदि बनाने के काम आती हैं। इसका पर्याय धुरन्धर तथा व्यापारी नाम Axle-wood इसीलिये पड़ा है। इससे गोंद प्राप्त होता है जो बबूल के गोंद के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल तथा पत्तों में टैनिन (Tannin) बहुत होता है। अतिसार, प्रवाहिका, अर्श रक्तपित्त, प्रमेह एवं विष में किया जाता है। मात्रा-क्वाथ ५ से १० तोला; गोंद ५ से १० रत्ती। अथ धन्वङ्गः (धामिन) तस्य नामानि गुणाँश्चाह धन्वङ्गतु धनुर्वृक्षो गोत्रवृक्षः सुतेजनः ।।६१।। धन्वङ्गः कफपित्तास्रकासहत्तुवरो लघुः । बृंहणो बलकृद्रूक्षः सन्धिकृद् व्रणरोपणः ।।६२।। धामिन के संस्कृत नाम-धन्वङ्ग, धनुर्वृक्ष, गोत्रवृक्ष तथा सुतेजन ये सब हैं। धामिन-कषाय रस युक्त, लघु, बृंहण (रस-रक्तादि-वर्धक), बलकारक, रूक्ष, सन्धानकारक (अस्थियों को टूटने पर जोड़ने वाला), व्रण का रोपण करने वाला एवं-कफ-पित्त, रक्तविकार तथा खाँसी को दूर करने वाला है। [६१- ६२] ३२. धामिन हिं०-धामिन, धामन। म०-धामणीचा वृक्ष। गु०-धामण। बं०-धामना गाछ। ते०-चरचि। ता०-सहचि, थड़। क०-बुतले। ले०-Grewia tiliaefolia Vahl. (ग्रोविआ टिलीफोलिया)। Fam. Tiliaceae (टिलीएसी)। यह हिमालय पहाड़ के निचले भागों में जमुना से नेपाल तक, ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं मध्य भारत, मद्रास, बिहार एवं उड़ीसा में पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। पत्ते-२ से ५ इञ्च तक लम्बे तथा १ से ४ इञ्च तक चौड़े, अंडाकार, मध्यशिरा के दोनों ओर के भाग छोटे-बड़े, प्रायः कुण्ठिताग्र, गोल दन्तुर, आधार का भाग एक ओर अत्यधि बढ़ा हुआ एवं १ इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के छोटे-छोटे फूलों के गुच्छे लगते हैं जिनके भीतर पीलापन झलकता है। फल-२ से ४ खण्ड के, मटर के समान एवं पकने पर काले पड़ जाते हैं। इसके फल खाने लायक खट्टे होते हैं। इसकी छाल का उपयोग किया जाता है। यह बाहर से धूसर या गहरे भूरे रंग की तथा मोटी होती है। पत्तों को बाल धोने के लिये काम में लाया जाता है। लकड़ी का भी उपयोग फर्नीचर इत्यादि बनाने के लिये किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
वटादिवर्गः ६९९ गुण और प्रयोग—इसकी छाल कटु, मधुर, शीत, स्नेहन तथा रक्तसंग्राहिक होती है। (१) इसके अन्तर्छाल का रस १ से २ तोले की मात्रा में रक्त युक्त आँव में पिलाया जाता है। (२) केंवाच की फली शरीर में लगने से खुजली होने पर छाल को शरीर पर मलते हैं जिससे त्वरित आराम मिलता है। (३) अफीम के विष को उतारने के लिये इसकी लकड़ी का कोयला वमन कराने के लिये देते हैं। मात्रा—छाल स्वरस १ से तोला। अथ करीरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह करीरः क्रकरीपत्रो ग्रन्थिलो मरुभूरुहः । करीरः कटुकस्तिक्त स्वेद्यष्णो भेदनः स्मृतः ।। दुर्नामकफवातामगरशोथव्रणप्रणुत् ।।६३।। करील के संस्कृत नाम—करीर, क्रकरीपत्र, ग्रन्थिल तथा मरुभूरूह ये सब हैं। करील—कटु तथा तिक्त रस युक्त, स्वेदजनक, उष्ण, मल का भेदन करने वाला एवम्—अर्श, कफ, वात, आम, विष, शोथ तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [६३] ३३. करील हिं०—करीर, करील, करेल । बं०—करील । म०—नेवती, किरल, सोदद । गु०—केरडो, केर । क०—चिप्पुरी । ते०—करीरमु । फा०—सोदाव । ता०—सेंगम् । ले०—Capparis aphylla Roth. (कॅपेरिस् एफिला) । Fam. Capparidaceae (कॅपेरीडेसी) । यह पंजाब, सिंध, कच्छ, प० राजपुताना, गुजरात एवं दक्षिण के उत्तरी भाग में शुष्कं प्रदेशों में होता है। इसका वृक्ष—झाड़दार, काँटेदार, घना, वारीक शाखाओं से भरा हुआ एवं ६-७ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—केवल नवीन शाखाओं पर होते हैं तथा ये १/२ इञ्च लम्बे, रेखाकार, नोकीले, स्वाद में कटु तथा शीघ्र ही गिर जाते हैं। फूल—गुलाबी रंग के, ४/५ इञ्च व्यास के गुच्छों में वसन्त ऋतु में फूलते हैं। फल—गोल १/२-३/४ इञ्च व्यास के, लाल या गुलाबी एवं छोटे से वृन्त पर आते हैं। इसकी कली एवं फलों का अचार बनाते हैं। औषध में कली, फल तथा छाल का उपयोग करते हैं। गुण और प्रयोग—इसकी छाल तिक्त एवं संसन, स्वेदजनन, अर्शोघ्न एवं शोथहर है। कोमल पत्ते तथा शाखा स्फोटनजनन होते हैं। फल संग्राहक होते हैं। (१) दंतशूल में पत्ते तथा नवीन शाखाएँ चबाने को देते हैं। सूजन, फोड़े आदि पर इसे लगाने से लाभ होता है। (२) अतिसार तथा पुरानी आँव में फलों का अचार देते हैं। (३) मूल तथा मूल की छाल आमवात तथा विषमज्वर में दी जाती है। मात्रा—त्वक् चूर्ण १ से २ माशा। अथ शाखोटः (सहोरा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शाखोटः पीतफल
७०० भावप्रकाशनिघण्टुः ३४. सिहोरा हिं०-सहोरा, सिहोड़ (ड़ा), सिहोर। बं०-शेओडा। म०-सहोड़, करवती। गु०-साहोड़ा। ते०-भारिणिके चेट्टु। ता०-पिरे। क०-आखोड्। ले०-Streblus asper Lour. (स्ट्रेब्लस् अस्पेर्)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। सहोरे के वृक्ष जांगल देशों के अधिक शुष्कभागों में रुहेलखंड से पूर्व और दक्षिण की ओर त्रावनकोर तक तथा बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश आदि प्रान्तों में अधिक होते हैं। ये क्षीरी वृक्ष-अत्यन्त गठीले, झाड़दार और मध्यमाकार तथा २० फीट तक ऊँचे होते हैं। इसके पत्ते कुछ गोल, छोटे-छोटे, दोनों ओर से खुरदरे और २-४ इञ्च लम्बे होते हैं। उन पर छोटी-छोटी उठी हुई बूंदें होती हैं। फूल-सफेद रंग के, पुरुष और स्त्रीजाति के अलग-अलग लगते हैं। फल-पीले रंग के और उनमें एक-एक बीज निकलते हैं। पौष से फाल्गुन महीने तक इसके फूल लगते हैं और वैशाख से आषाढ़ तक फल पक जाते हैं। बकरी के दूध में इसके क्षीर को डालने से दूध जम जाता है। (रा० नि०)। इसकी छाल एवं क्षीर का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में तिक्त द्रव्य पाया जाता है। गुण और प्रयोग-(१) इसकी छाल का क्वाथ ज्वर, अतिसार तथा प्रवाहिका में दिया जाता है। गोमूत्र के साथ क्वाथ को श्लीपद में देते हैं। (२) इसके मूल को पुराने व्रण तथा नाड़ी व्रण में लगाते हैं। हाथ पैर फटने पर इसका दूध लगाते हैं। अथ वरुणः (बरना)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह वरुणो वरणः सेतुस्तिक्तशाकः कुमारकः। वरुणः पित्तलो भेदीश्लेष्मकृच्छ्राश्ममारुतान् ॥६५॥ निहन्ति गुल्मवातास्रकृमींश्चोष्णोऽग्निदीपनः। कषायो मधुरस्तिक्तः कटुकोरूक्षको लघुः ॥६६॥ बरना के संस्कृत नाम-वरुण, वरण, सेतु, तिक्तशाक और कुमारक ये सब हैं। बरना-कषाय, मधुर, तिक्त तथा कटु रस युक्त, रूक्ष, लघु, पित्तजनक, मल का भेदन करने वाला, उष्ण, अग्निदीपक एवं-कफ, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वायु, गुल्म, वातरक्त तथा कृमि को दूर करने वाला होता है। [६५-६६] ३५. बरना हिं०-बरुन, बरना। बं०-बरुन गाछ, बरुण गाछ। म०-वायवर्णा। गु०-बरणो, कागडाकेरी। क०- नारूवे। ते०-मर्गलिंगम्। ता०-मरलिंगम्। ले०-Crataeva nurvala Buch.-Ham. (क्रे० नुर्वाला)। Fam. Capparidaceae (कैपेरीडेसी)। यह मालाबार और कनारा में नदियों के आसपास पाया जाता है तथा सभी स्थानों पर लगाया हुआ भी होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और शाखाएँ-फैली हुई रहती हैं। छाल-आध इञ्च मोटी सफेद रंग की होती है। टहनियों पर सफेद दाग होते हैं। पत्ते-तीन-तीन पत्रकों के पाणिवत् सदल पर्ण होते हैं जो बेल की तरह किन्तु लम्बे वृन्त से युक्त दिखलाई देते हैं। पत्रक-लट्वाकार या भालाकार एवं लम्बाग्र होते हैं। पुष्प-श्वेत, पीत या गुलाबी, भिन्न-भिन्न रंग के होते हैं। फल-नीबू के आकार के तथा पकने पर लाल हो जाते हैं। पत्तों का स्वाद कड़वा तथा उन्हें मसलने से उग्र गंध आती है। इसकी छाल, पत्ते तथा पुष्पों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में सैपोनिन तथा टैनिन पाया जाता है।
वटादिवर्गः ७०१ गुण और प्रयोग—यह तिक्त, उष्ण, वातनाशक, दीपन, संसन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न एवं शोथघ्न है। ताजे पत्तों का लेप करने से त्वचा लाल हो जाती है तथा फोड़े निकल आते हैं। (१) अश्मरी, शर्करा, बस्तिशूल, मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्रविकारों में इसकी छाल का प्रयोग अपामार्ग, पुनर्नवा, यवक्षार, गोखुरू, मुलेठी इत्यादि के साथ किया जाता है। (२) मूल का क्वाथ मिलाकर गण्डमाला तथा अपक्व विद्रधि में दिया जाता है। (च० द०)। गण्डमाला में लेप भी किया जाता है। क्वाथ में सोंठ एवं कचनार की छाल भी मिलाई जा सकती है। (३) पेट फूलना तथा कुपचन में पत्तों का फाट बनाकर देते हैं। इससे वमन बन्द होता है। (४) पत्तों का साग मेद कम करने के लिये खिलाते हैं। (५) पुष्प ग्राही तथा पित्तविरेचक माने जाते हैं। मात्रा—क्वाथ ५ से १० तोला; मूल या त्वक् चूर्ण ३-६ माशा। अथ कटभी। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह कटभी स्वादुपुष्पश्च मधुरेणुः कटम्भरः। कटभी तु प्रमेहार्शोनाडीव्रणविषक्रिमीन् ।।६७।। हन्त्युष्णा कफकुष्ठघ्नी कटू रूक्षा च कीर्तिता। तत्फलं तुवरं ज्ञेयं विशेषात्कफशुक्रहत् ।।६८।। कटभी के संस्कृत नाम—कटभी, स्वादुपुष्प, मधुरेणु तथा कटम्भर ये सब हैं। कटभी—कटुरसयुक्त, रूक्ष, उष्ण एवम्-प्रमेह, अर्श, नाडीव्रण (नासूर), विष, क्रिमि, कफ तथा कुष्ठ को नाश करने वाली होती है। कटभी का फल—कषाय रस युक्त तथा विशेषतः कफ और शुक्र का नाशक होता है। [६७-६८] ३६. कटभी ? कुम्भी, कुम्भीर नोट—कटभी के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। ज्योतिष्मती का नाम भी कटभी दिया हुआ है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी श्वेत शिरीष, आलबीजिया प्रोसेरा (Albizzia procera) को कटभी मानते हैं। श्री बापालाल शाह वैद्य कॅरेया आबोरिया (Careya arborea) को कटभी कुम्भी दोनों मानते हैं जिसे अन्य विद्वानों ने केवल कुम्भी माना है। शिरीष के अन्तर्गत श्वेत शिरीष का वर्णन किया जा चुका है जिसके कटभी होने की अधिक संभावना है। यहाँ संक्षेप में कुम्भी का भी वर्णन किया जा रहा है। हिं०, बं०—कुम्भी। म०—कुम्भा। ले०—Careya arborea Roxb. (कॅरेया आबोरिया)। Fam. Lecythidaceae (लेसीथीडेसी) । यह हिमालय के निचले भागों में काँगड़ा से लेकर पूर्व में बंगाल तथा मध्य, पश्चिम एवं दक्षिण भारत में ५००० फीट तक होता है। इसके वृक्ष—छोटे या मध्यम ऊँचाई के होते हैं। पत्ते—बहुत बड़े, ६-१५ इञ्च लम्बे, अभि लट्वाकार (ऊपर की ओर चौड़े तथा नीचे की ओर संकुचित), चिकने, गोल दन्तुर एवं टहनियों के अग्रपर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पुष्प— श्वेत या गुलाबी, गुच्छे में रहते हैं। फल—गोलाई लिये हुये, हरे, २ ½-३ व्यास के एवं शीर्ष पर बाह्यनाल से युक्त रहते हैं। इसकी छाल का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसकी छाल उत्तम स्तम्भन है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७०२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) सूखी खाँसी में छाल के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं तथा इसकी गोली चूसने को देते हैं। खाँसी में ताजी छाल का रस या पुष्प मधु के साथ देते हैं। (२) प्रदर में छाल को ६ से १२ रत्ती की मात्रा से घृत एवं मधु के साथ देते हैं। विस्फोटक ज्वर जैसे मसूरिका में ज्वर तथा कण्डू दूर करने के लिये छाल का प्रयोग करते हैं। (३) पीड़ा युक्त शोथ तथा व्रण पर छाल को पीस कर बाँधते हैं तथा व्रण प्रक्षालन के लिये इसका क्वाथ प्रयोग करते हैं। (४) सर्प विष में छाल का रस पिलाते हैं तथा पीसकर दंश स्थान पर बाँधते हैं। मात्रा-छाल १ से ३ माशा। अथ मोक्षः (मोखावृक्ष) पलाशवत्पर्वतवृक्षः । तस्य नामानि गुणांश्चाह मोक्षस्तु मोक्षकोऽपि स्याद् गोलीढोगोलिहस्तथा । क्षारश्रेष्ठः क्षारवृक्षो द्विविधः श्वेतकृष्णकः ॥६९॥ मोक्षकः कटुकस्तिक्तो ग्राह्युष्णः कफवातहृत् । विषमे दोगुल्मकण्डूबस्तिरुक्कृमिशुक्रनुत् ॥७०॥ मोखा के संस्कृत नाम-मोक्ष, मोक्षक, गोलीढ, गोलिह, क्षारश्रेष्ठ तथा क्षारवृक्ष ये सब हैं। यह सफेद तथा काले के भेद से दो प्रकार का होता है। मोखा-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, ग्राही, उष्ण एवम्-कफ, वात, विष, मेद, गुल्म, खुजली, बस्तिसम्बन्धी रोग, कृमि तथा शुक्र का नाशक है। [६९-७०] नोट-गुडूच्यादिवर्ग में पाटला के भेद में मोक्षक को बतलाया गया है किन्तु मोक्षक यह उससे भिन्न है। इसी प्रकार इसमें भी दो भेद श्वेत एवं कृष्ण, भावप्रकाशकार ने माने हैं। यहाँ दोनों का वर्णन किया गया है। मोक्षक अधिकतर श्वेत को कहा गया है। ३७. मोखा सं०-मोक्षक, श्वेत मोक्षक। हिं०-मोखा, एकसिरा। बं०-घण्टा पारुल। म०-मोखाडा। ता०-मगलिंगम्। ते०-मगलिंग। ले०-Schrebera swietenioides Roxb. (श्रेबेरा स्वीटेनियोइडिस्)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह कुमाऊँ से पूर्व, मध्यभारत तथा राजपूताना में पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यम ऊँचाई का होता है। पत्ते-पक्षवत् सदल होते हैं। पत्रक-संख्या में ३-७, लट्वाकार, आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत्, ३-७ इञ्च लम्बे, फलक क्रमशः संकुचित होकर सूक्ष्म वृन्त से युक्त और अग्र किंचित् लम्बाग्र होता है। पुष्प-श्वेताभ, बाह्यकोश घंटिकाकार और आभ्यंतर कोश व्यस्त छात्राकार होते हैं। फल-नीचे की ओर लटका हुआ, नाशपाती के आकार का, २.५ इञ्च लम्बा तथा १ इञ्च चौड़ा होता है। बीज-प्रत्येक कोष्ठ में २-४ कोनदार सपक्षक बीज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके जड़ से सिद्ध घृत कुष्ठ में लाभदायक है। (सु० चि० अ० ९)। इसका क्षार अच्छा माना गया है तथा मुखरोग तथा ग्रहणी आदि में लाभदायक बताया गया है। बिहार में आदिवासियों में बच्चों के अंडकोश बढ़ने पर इसके फल को कमर में बाँधने की प्रथा है।
वटादिवर्गः ७०३ ३७. (क) कालामोखा सं०-कृष्णमोक्षक ? । हिं०-कालामूका, रतनगरुर । बं०-भूतपत्र, भूतकेशी । ले०-Elaeodendron glaucum Pers. (एलिओडेण्ड्रोन् ग्लॉकम्) । Fam. Celastraceae (सिलेस्ट्रेसी) । यह अनेक स्थानों में पाया जाता है तथा बगीचों में लगाया हुआ भी मिलता है । इसके छोटे वृक्ष होते हैं । पत्ते-गहरे हरे रंग के, चिकने, २-६ × १-३ इञ्च बड़े, लट्वाकार, नोकीले, सवृन्त (वृन्त १ इञ्च तक) एवं गोल या नोकीले दाँतों वाले होते हैं । पुष्प-हरित-श्वेत या भूरे; फल-अष्ठिल तथा १/२ इञ्च लम्बे होते हैं । गुण और प्रयोग-इसकी छाल ग्राही एवं शोथघ्न होती है । भूतोन्माद में पत्तियों का धूआँ दिया जाता है जिससे चेतना आती है तथा शिरःशूल में नस्य दिया जाता है । अथ जलशिरीषिका (जलसिरिस-टिण्टिनी-ढाढोन इति च) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शिरीषिका टिण्टिनिका१ दुर्बलाऽम्बुशिरीषिका । त्रिदोषविषकुष्ठार्शोहरी वारिशिरीषिका ।।७१।। ढाढोन के संस्कृत नाम-शिरीषिका, टिण्टिनिका, दुर्बला, अम्बुशिरीषिका तथा वारिशिरीषिका ये सब हैं । ढाढोन-त्रिदोष, विष, कुष्ठ तथा बवासीर को दूर करने वाला होता है । [७१] ३८. जलसिरिस जल शिरीष क्या है इसका निर्णय अभी नहीं किया जा सका है । संभव है शिरीष की तरह का कोई वृक्ष हो जो जल के समीप होता हो । मराठी नाम 'जल शिरसी' यह ट्राइकोडेस्मा झेलेनिकम् (Trichodesma zeylanicum R. BR.) के लिये लिखा हुआ मिलता है । अभी इसके विषय में अधिक अन्वेषण की आवश्यकता है । अथ शमी (छोंकरा) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह शमी शक्तुफला तुङ्गा केशहन्त्री शिवाफला । मंगल्या च तथा लक्ष्मीः शमीरः साऽल्पिका स्मृता ।।७२।। शमी तिक्ता कटुः शीता कषाया रेचनी लघुः । कफकासभ्रमश्वासकुष्ठार्शः कृमिजित् स्मृता ।।७३।। शमी के संस्कृत नाम-शमी, शक्तुफला, तुङ्गा, केशहन्त्री, शिवाफला, मङ्गल्या तथा लक्ष्मी ये सब हैं । छोटे शमीवृक्ष का नाम 'शमीर' है । शमी-तिक्त, कटु तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, रेचक, लघु एवम्-कफ, कास (खाँसी), भ्रमरोग श्वास, कुष्ठ, अर्श तथा कृमि का नाशक है । [७२-७३] ३९. छोंकर (शमी) हिं०-छोंकर, शमी छिकुर । बं०-शांई । म०-शमी । गु०-खीजड़ो, खमड़ी । ता०-कलिसम्, वण्णि । ते०-जम्मि । पं०-जंड, जंडी । ले०-Prosopis spicigera Linn. (प्रोसोपिस् स्पिसिजेरा) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह पञ्जाब, सिन्ध, राजपुताना, गुजरात और बुन्देलखण्ड में अधिक होती है और इसको वाटिकाओं में भी लगाते हैं । इसका काँटेदार वृक्ष-छोटा होता है और शाखायें पतली होती हैं । काँटे शंक्वाकार, सीधे तथा कुछ चिपटे होते हैं । पत्ते-द्वि-पक्षवत्, उपपक्ष प्रायः दो जोड़े, विपरीत, १-२ इञ्च लम्बे और उपपक्षों के प्रत्येक जोड़े के बीच में एक- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७०४ भावप्रकाशनिघण्टुः एक ग्रंथि होती है। पत्रक ८-१२ जोड़े, अवृन्त, तिर्यगायताकार, चिकने, चमड़े जैसे कड़े एवं उनका अग्र कड़ा और तीक्ष्ण होता है। पुष्प-पीता, छोटे, २-३ इञ्च लम्बी मंजरी में आते हैं। फली-लटकी हुई, बीच-बीच में संकुचित तथा ५-१० इञ्च लम्बी होती है जिनमें १०-१५ बीज मधुर फलमज्जा के भीतर रहते हैं। कच्ची फलियों का साग बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाते हैं। दशहरा को लोग इस वृक्ष का पूजन करते हैं। इसकी छाल, पुष्प तथा फली का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल संग्राहक एवं रक्तपित्तशामक होती है। इसकी फली केश को हानि पहुँचाने वाली होती है। (च० सू० अ० २७, सु० सू० अ० ४६)। बालों को हटाने के लिये इसकी राख को मलते हैं। गर्भपात न हो इसलिये इसके फूलों को कूट कर मिश्री मिलाकर गर्भिणी को खिलाया जाता है। अथ सप्तपर्णः (छतिवन-सतौना) । तस्य नामानि गुणांश्चाह सप्तपर्णो विशालत्वक् शारदो विषमच्छदः ।।७४।। सप्तपर्णो व्रणश्लेष्मवातकुष्ठास्रजन्तुजित् । दीपनः श्वासगुल्मघ्नः स्निग्धोष्णास्तुवरः सरः ।।७५।। छतिवन के संस्कृत नाम-सप्तपर्ण, विशालत्वक, शारद तथा विषमच्छद ये सब हैं। छतिवन-कषायरसयुक्त, अग्निदीपक, स्निग्ध, उष्ण, सारक एवम्-व्रण, कफ, वात, कुष्ठ रक्तविकार, जन्तु, श्वास तथा गुल्म का नाशक है। [७४-७५] ४०. सतौना हिं०-सतौना, सतवन, छतिवन, सतिवन । बं०-छातिम । म०-सातवीण । गु०-सातवण । क०-हाले । ते०-एडाकुलरि । ता०-एलिलैप्पालतै । ले०-Alstonia scholaris R. Br. (एल्स्टोनिया स्कोलेरिस्) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । सतिवन का वृक्ष प्रायः सब आर्द्र प्रान्तों में पाया जाता है। किन्तु विशेष रूप से प० समुद्र के किनारे के जंगलों में अधिक पाया जाता है। इसका वृक्ष-सुन्दर, विशाल, सीधा, सदाहरित एवं क्षीरयुक्त होता है। शाखाएँ तथा पत्ते चक्रिक क्रम में निकले रहते हैं। पत्ते-प्रति चक्र में ३-७, प्रायः ६, चिकने, आयताकार-भालाकार या अभिअंडाकार ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से श्वेताभ, ४-८ इञ्च लम्बे तथा ६-१३ मि० मी० लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-हरिताभ श्वेत तथा गुच्छों में आते हैं। फली-दो-दो एक साथ, नीचे लटकी हुई, १-२ फीट लम्बी तथा ३ मि० मी० व्यास की होती है। बीज- ६ मि० मी० लम्बे, चिपटे तथा रोमश होते हैं। छाल-टहनियों की ३-४ मि० मी० मोटी, मुड़ी हुई एवं काण्ड की ७ मि० मी० मोटी होती है। बाहर से नवीन छाल गहरे धूसर या भूरे रंग की तथा पुरानी बहुत खुरदरी, असमान, फटी हुई होती है तथा उन पर अनेक गोल या आड़े धूसर या सफेद धब्बे रहते हैं। अन्दर से यह भूरे-पीताभ या गहरे धूसराभ भूरे रंग की, कुछ धारीदार तथा गद्देदार रहती है। यह गंधहीन एवं स्वाद में तिक्त रहती है। इसकी छाल, पत्र, पुष्प तथा दुग्ध का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में क्षाराभ की मात्रा ०.१६-०.२७% रहती है जिसमें प्रधानता एचिटेमाइन (Echitamine, C₂₃ H₂₈ O₄ N₂ H₂ O) की तथा अल्प मात्रा में एचिटामिडीन (Echitamidine, C₂₀ H₂₆ O₃ N₂) रहता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
इन क्षाराभों का मलेरिया के लिये कोई लाभदायक परिणाम नहीं पाया गया है। क्षीर में केउटचौक (Caoutchouc) तथा राल होती है तथा इसका स्वाद कडुवा होता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल उष्ण, तिक्त, तिक्तपौष्टिक, कषाय, स्तंभन, कृमिघ्न, स्तन्यजनन, दीपन एवं कुष्ठघ्न है। इसका उपयोग ज्वर, विषमज्वर, अतिसार, प्रवाहिका, चर्मरोग एवं कृमि में किया जाता है। (१) इससे ज्वर कम होता है। आधुनिक परीक्षणों से देखा गया है कि मलेरिया में कोई विशेष लाभ नहीं होता, केवल ज्वर का वेग कम होता है तथा बाद में तिक्त पौष्टिक रूप में इससे लाभ होता है जिससे पाचन सुधरता है तथा मन्दज्वर भी चला आता है। (२) अतिसार एवं प्रवाहिका की जीर्णावस्था में समग्र त्वचा का क्वाथ लाभदायक होता है। (३) प्रसूति के पश्चात् इसके साथ सुगंधित द्रव्य देने से दुग्ध की मात्रा बढ़ती है तथा ज्वर, नहीं आता तथा पाचन ठीक रहता है। (४) पुराने व्रणों पर इसका लेप करते हैं। चर्मरोगों में क्षीर का लेप भी लाभदायक है। मात्रा-त्वक् चूर्ण ४-८ माशा; क्वाथ के लिये २-४ तोला; घनसत्व १/८-१/४ तोला। अथ तिनिशः (तिरिच्छ)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह तिनिशः स्यन्दनो नेमी रथद्रुर्वञ्जुलस्तथा। तिनिशः श्लेष्मपित्तास्रमेदःकुष्ठप्रमेहजित् ।। तुवरः श्वित्रदाहघ्नो व्रणपाण्डुकृमिप्रणुत् ।।७६।। तिरिच्छ के संस्कृत नाम-तिनिश, स्यन्दन, नेमी, रथद्रु तथा वञ्जुल ये सब हैं। तिरिच्छ-कषाय रस युक्त एवम् कफ, पित्त, रक्तविकार, मेद, कुष्ठ, प्रमेह, श्वेतकुष्ठ, दाह, व्रण, पाण्डु तथा कृमि का नाशक है। [७६] नोट-तिनिश के संस्कृत पर्यायों के आधार पर यह निःसंदेह यूजिनिया डल्बर्जियोडिस् (Ougeinia dalbergioides) वृक्ष है। किन्तु गलती से कहीं-कहीं इसका नाम लाजरस्ट्रोमिया फ्लोस रेजिनी (Lagerstroemia flos-reginae) लिखा मिलता है जिसे अर्जुन भी कहा गया है। यहाँ दोनों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। ४१. तिनिश, पानन हिं०-सानन, पानन, सन्दन। बं०-तिनिश। गु०-तणछ। म०-तिमस। ता०-नारिवेगई। ते०-लेल्ल मोटुकु। ले०-Ougeinia dalbergioldes Benth. (युजिनिया डल्बर्जिओडिस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह हिमालय में ५००० हजार फीट तक पञ्जाब से भूटान तक एवं अवध, बुंदेलखण्ड, छोटा नागपुर, मध्य भारत, उड़ीसा, सरकार, मध्य प्रदेश, बंबई तथा मारवाड़ में होता है। इसके वृक्ष-छोटे तथा टेढ़े-मेढ़े होते हैं। शाखा-पतली तथा श्वेताभ होती है। पत्ते-त्रिपत्रक तथा प्रायः नीचे से कुछ रजावृत होते हैं। अग्र्य पत्रक ३-६ इञ्च लम्बे, अण्डाकार, वृत्ताकार या अभिअण्डाकार, कुण्ठिताग्र एवं अखण्ड या गोल-दन्तुर होते हैं। पार्श्व पत्रक छोटे, विपरीत तथा तिर्यक् होते हैं। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं प्रायः पुराने काण्ड से बहुत बड़ी संख्या में निकलते हैं। फली-२-४ × १/३ इञ्च लम्बी होती है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होने के कारण प्रायः गाड़ी के धुरों के लिए काम में लाई जाती है। इसके स्थानिक नाम तिनसा तथा सानन संस्कृत पर्याय तिनिश एवं स्यन्दन के अपभ्रंश मालूम पड़ते हैं। इसी तरह रथद्रु नाम इसका रथ में उपयोग की ओर संकेत करता है। ४८ भाव.I
७०६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी लकड़ी में घाव करने से एक प्रकार का गोंद भी प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग—यह कषाय, ग्राही, कफपित्त शामक, रसायन एवं वयस्थापन (सु० चि० अ० १) है। इसका उपयोग कुष्ठ (च० चि० अ० ७), रक्तातिसार (सु० उ० अ० ४०), प्रमेह, रक्तदोष एवं ज्वर में किया जाता है। (१) इसके छाल का क्वाथ ज्वरहर माना जाता है तथा जब पेशाब का रंग गहरा होता है तब इसे पिलाते हैं। (२) इसका गोंद अतिसार तथा प्रवाहिका में देते हैं। ४२. जारूल हिं०—जरुल, जारुल, अर्जुन ? बं०—जरूल। म०—तामण। ता०—कीदली। ते०—वारगोगु। ले०— Lagerstroemia flos-reginae Retz. (लाजरस्ट्रोमिया फ्लोस रेजिनी)। Fam. Lythraceae (लिथरेसी)। यह पूरब बङ्गाल, आसाम और रत्नागिरी आदि प्रान्तों में उत्पन्न होता है । यह प्रायः नदियों के किनारे तथा पहाड़ियों से निर्गम स्थान पर होता है। इसको शोभा के लिये बागों में लगाते भी हैं। इसका वृक्ष—बड़ा, ३०-६० फीट तक ऊँचा होता हैं। पत्ते—४ से ८ इञ्च तक लम्बे कुछ चौड़े, किञ्चित् अंडाकार, आयताकार-भालाकार और नुकीले होते हैं। फूल—सुन्दर, २-३ इञ्च के घेरे में बैंगनी युक्त लाल होते हैं। बाह्यदल श्वेत रज से आवृत्त होते हैं। फल—१ १/४-१ इञ्च बड़े कुछ गोल होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके प्रत्येक भाग में विशेष करके पुराने पत्तों एवं पके फलों में इन्सुलिन (Insulin) के समान, रक्तगत शर्करा की मात्रा को कम करने वाला पदार्थ पाया गया है । गुण और प्रयोग—इसकी छाल तथा पत्ते—रेचक होते हैं। बीज मादक माने जाते हैं। मूल ग्राही तथा ज्वरनाशक है। छाल का क्वाथ ज्वर में दिया जाता है। मुख के व्रणों में फल का स्थानिक उपयोग किया जाता है। अथ भूमीसहः (सागोन) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह भूमीसहो द्वारदारुवरदारुः खरच्छदः। भूमीसहस्तु शिशिरो रक्तपित्तप्रसादनः ।।७७।। सागोन के संस्कृत नाम—भूमीसह, द्वारदारु, वरदारु तथा खरच्छद ये सब हैं। सागोन—शीतल एवं रक्तपित्त को शुद्ध करने वाला है। [७७] ४३. सागोन सं०—शाक, साग। हिं०—सागोन, सागवन, सागु (ग) वान। बं०—सेगुन गाछ। म०-गु०—सागवान। क०—तेगिन। ते०—तेकु। ता०—टेक्कु। अं०—Indian Teak Tree (इण्डियन टीक ट्री)। ले०—Tectona grandis Linn. (टेक्टोना ग्रैण्डिस)। Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। इसके वृक्ष—दक्षिण तथा मध्य भारत में अधिक होते हैं। यह वृक्ष—बहुत ऊँचा, सीधा और विशाल होता है। ५०-६० फीट की ऊँचाई पर शाखाएँ होती हैं। इसके पत्ते—बहुत लम्बे चौड़े, ऊपर से खुरदरे और नीचे से सफेद रोवेंदार होते हैं। इनको हाथ से मलने से हाथ लाल हो जाता है। फूल—सफेद रंग के गुच्छों में आते हैं। फल—छोटे, २/३ इञ्च व्यास के, गोलाकार रोमश होते हैं। सागोन एक प्रयोजनीय और प्रसिद्ध काष्ठ है। इसकी लकड़ी से तख्ते, बक्स, आलमारी इत्यादि बहुत सी चीजें बनाते हैं। यह हलकी, चिक्कन और टिकाऊ होती है तथा इसमें दीमक नहीं लगती। इसके सभी भागों का उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
वटादिवर्गः ७०७ रासायनिक संगठन-इसके काष्ठ में क्विनीन सदृश पदार्थ टेक्टोक्विनीन, राल २.९३% जो चर्म के लिये प्रक्षोभक होती है, कुछ उड़नशील तेल तथा अन्य स्नेह पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल या काष्ठ पित्तशामक कुछ स्तम्भन एवं कृमिघ्न है। शोथ एवं शिरःशूल में इसका लेप किया जाता है। कुपचन, पित्त प्रकोप तथा पेट की जलन में इसका चूर्ण ३-१२ माशे की मात्रा में देते हैं। इसके पुष्प तथा बीज मूत्रजनन हैं। मूत्रावरोध में फूलों से पेडू पर सेंकते हैं तथा फाँट पिलाते हैं। बीजों का तेल केशवर्धक है तथा खुजली (पामा) में लगाया जाता है। इसके पत्तों का रस खपड़े में गरम करके विसर्प पर लगाते हैं। पत्तों को पीस कर विसारी (Whitlow) पर बाँधते हैं। सर्प (फुरसा) दंश से रक्तस्राव होता हो तो इसके कोमल अंकुरों के रस से बन्द होता है। मात्रा-त्वक् चूर्ण ३-१२ माशा। इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे वटादिवर्गः समाप्तः।
अथ आम्रादिफलवर्गः तत्रादावाम्रः (आम) । तस्य नामान्याह आम्रश्चूतो रसालश्च सहकारोऽतिसौरभः । कामाङ्गो मधुदूतश्च माकन्दः पिकवल्लभः ।। १ ।। आम के संस्कृत नाम—आम्र, चूत, रसाल, सहकार, अतिसौरभ, कामाङ्ग, मधुदूत, माकन्द और पिकवल्लभ ये सब हैं । [१] अथाम्रपुष्पगुणानाह आम्रपुष्पमतीसारकफपित्तप्रमेहनुत् । असृग्दुष्टिहरं शीतं रुचिकृद् ग्राहि वातलम् ।। २ ।। आम का फूल—शीतल, रुचिकारक, ग्राही, वातजनक, एवम्-अतिसार, कफ, पित्त, प्रमेह तथा रक्तदोष को दूर करने वाला होता है । [२] अथामाम्रफलम् (अमिया) । तस्या गुणानाह आमं बालं कषायाम्लं रुच्यं मारुतपित्तकृत् । तरुणं तु तदत्यम्लं रूक्षं दोषत्रयास्त्रकृत् ।। ३ ।। अमिया (आम के कच्चे फल) कषाय तथा आम्लरसयुक्त, रुचिकारक एवं वात और पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है । प्रौढ़ आम का कच्चा फल—तो अत्यन्त अम्ल रस युक्त तथा रूक्ष होता है एवम् त्रिदोष तथा रक्त विकार को उत्पन्न करने वाला होता है । [३] अथ शुष्कामाम्रफलम् (अमचूर) । तस्य लक्षणगुणानाह आम्राममं त्वचाहीनमातपेऽतिविशोषितम् । अम्लं स्वादु कषायं स्याद्भेदनं कफवातजित् ।। ४ ।। अमचूर के लक्षण—कच्चे आम के ऊपर का छिल्का उतार कर यदि उसे धूप में डाल दिया जाय तो अत्यन्त सूख जाने पर उसे अमचूर कहते हैं । अमचूर—अम्ल तथा कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, मल का भेदन करने वाला एवं कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है । [४] अथ पक्वाम्रफलम् (पका आम) । तस्य गुणानाह पक्वं तु मधुरं वृष्यं स्निग्धं बलसुखप्रदम् । गुरु वातहरं हृद्यं वर्ण्यं शीतमपित्तलम् ।। कषायानुरसं वह्निश्लेष्मशुक्रविवर्द्धनम् ।। ५ ।। पका आम का फल—आरम्भ में मधुर तथा अन्त में कषाय रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, बल तथा सुख को देने वाला, गुरु, वात नाशक, हृदय को हितकर, वर्ण को उत्तम करने वाला, शीतल, थोड़ा पित्तजनक एवम् जठराग्नि, कफ तथा शुक्र का बढ़ाने वाला होता है । [५] अथ वृक्षपक्वाम्रफलगुणानाह तदेव वृक्षसम्पक्वं गुरु वातहरं परम् । मधुराम्लरसं किञ्चिद्भवेत्पित्तप्रकोपणम् ।। ६ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
आम्रादिफलवर्गः ७०९ वृक्ष ही में पका हुआ आम का फल—वृक्ष में यदि आम पका हो तो वह मधुर तथा अम्ल रस युक्त, गुरु, अत्यन्त वातनाशक तथा किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाला होता है। [६] अथ कृत्रिमपक्वचूषिताम्रफलगुणानाह आम्रं कृत्रिमपक्वञ्च तद्भवेत्पित्तनाशनम्। रसस्याम्लस्य हीनस्तु माधुर्याच्च विशेषतः ।।७।। चूषितं तत्परं रुच्यं बलवीर्यकरं लघु। शीतलं शीघ्रपाकि स्याद्वातपित्तहरं सरम् ।।८।। कृत्रिम रीति से पकाये हुए (पाल के) आम के फल—यदि आम का फल कृत्रिम रीति से पकाया गया हो तो वह पित्तनाशक होता है क्योंकि उसमें का अम्ल रस निकल जाता है तथा मधुर रस की विशेषता हो जाती है। वह यदि चूसा जाय तो अत्यन्त रुचिजनक, बल वीर्य-कारक, लघु, शीतल, शीघ्र हजम होने वाला, सारक एवम् वात-पित्त नाशक है। [७-८] अथ गलिताम्ररसगुणानाह तद्रसो गालितो बल्यो गुरुर्वातहरः सरः। अहृद्यस्तर्पणोऽतीव बृंहणः कफवर्धनः ।।९।। निचोड़े आम का रस—बलकारक, गुरु, वातनाशक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, अत्यन्त सन्तर्पण करने वाला, बृंहण रस रक्तादि वर्धक एवं कफ की वृद्धि करने वाला होता है। [९] अथाम्रखण्डगुणानाह तस्य खण्डं गुरु परं रोचनं चिरपाकि च। मधुरं बृंहणं बल्यं शीतलं वातनाशनम् ।।१०।। पके आम के टुकड़े—गुरु, अत्यन्त रोचक, देर में हजम होने वाले, मधुर रस युक्त, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), बलकारक, शीतल एवम् वातनाशक होते हैं। [१०] अथ दुग्धयुक्ताम्रगुणानाह वातपित्तहरं रुच्यं बृंहणं बलवर्धनम्। वृष्यं वर्णकरं स्वादु दुग्धाम्र गुरु शीतलम् ।।११।। दुग्धाम्र (दूध के साथ खाने पर) पका आम का फल—स्वादिष्ट, वातपित्त नाशक, रोचक, बृंहण, बलवर्धक, वृष्य (वीर्यवर्धक), वर्ण को उत्तम करने वाला, गुरु तथा शीतल होता है। [११] अथाम्रातियोगः (आम बहुत खाना)। तस्य दोषानाह मन्दानलत्वं विषमज्वरं च रक्तामयं बद्धगुदोदरं च। आम्रातियोगो नयनामयं वा करोति तस्मादति तानि नाद्यात् ।।१२।। एतदम्लाम्रविषयं मधुराम्लपरं न तु। मधुरस्य परं नेत्रहितत्वाद्या गुणा यतः ।।१३।। आम्रातियोग (अधिक आम खाने) के दोष—जठराग्नि की मन्दता, विषमज्वर, रक्तसम्बन्धी रोग, अत्यन्त मल का अवरोध और नेत्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न करता है। इसलिये अधिक आम नहीं खाना चाहिये। यह निषेध अम्ल (खट्टे) आम के विषय में है न कि मधुर तथा अम्ल रस युक्त आम के विषय में है, क्योंकि मधुर रस में नेत्रों को हित पहुँचाना आदि गुण वर्तमान ही हैं। [१२-१३] अथाम्रातियोगदोषनिवृत्त्युपायमाह शुण्ठ्यम्भसोऽनुपानं स्यादाम्राणामतिभक्षणे। जीरकं वा प्रयोक्तव्यं सह सौवर्चलेन च ।।१४।। आम्रातियोग से उत्पन्न हुए दोषों की निवृत्ति का उपाय—आम अधिक खा लेने पर सोंठ के साथ जल पीना चाहिये अथवा सोंचल नोन के साथ जीरा खाना चाहिये। [१४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
७१० भावप्रकाशनिघण्टुः अथाम्रावर्त्तः (अमावट) । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह पक्वस्य सहकारस्य पटे विस्तारितो रसः । घर्मशुष्को मुहुर्दत्त आम्रावर्त्त इति स्मृतः ।।१५।। आम्रावर्त्तस्तृषाच्छर्द्दिवातपित्तहरः सरः । रुच्यः सूर्यांशुभिः पाकाल्लघुश्च सं हि कीर्त्तितः ।।१६।। अमावट के लक्षण—पके आम के रस को निकाल, कपड़े पर पसार कर धूप में सुखावे, जब सूख जाय तब उसी पर पुनः रस डाले और सुखावे इसी भाँति सुखाकर जो मोटी पर्त्त तैयार होती है उसी को ‘अमावट’ कहते हैं। अमावट—प्यास, वमन, वात तथा पित्त का नाशक, सारक तथा रोचक होता है। एवं सूर्य के किरणों से सूख कर परिपक्व होने से लघु होता है। [१५-१६] अथाम्रबीजम् (कोइलिया) । तस्य गुणानाह आम्रबीजं कषायं स्याच्छर्द्यतीसारनाशनम् । ईषदम्लञ्च मधुरं तथा हृदयदाहनुत् ।।१७।। आम्रबीज (आम की गुठली की मींगी)—कषाय, मधुर एवं किंचित् अम्ल रस युक्त तथा वमन, अतिसार एवम् हृदय के दाह को दूर करने वाला होता है। [१७] अथाम्रनवपल्लवः । तस्य गुणानाह आम्रस्य पल्लवो रुच्यः कफपित्तविनाशनः ।।१८।। आम के नवीन पल्लव—रुचिकारक तथा कफ और पित्त के नाशक होते हैं। [१८] १. आम हिं०, बं०-आम। म०-आम्बा। गु०-आम्बो। ते०-मामिडिचेट्टु। ता०-मांगाय, मामरं। क०-अंब, अंभ। फा०-अम्बः। अ०-अम्बज। अं०-Mango Tree (मङ्गो ट्री)। ले०-Mangifera indica Linn. (मङ्गीफेरा इण्डिका)। Fam. Anacardiaceae (अॅनेकार्डिएसी)। आम सर्वप्रिय और सर्वप्रसिद्ध फल है। इस देश में कोई ऐसा मनुष्य न होगा जो आम को न जानता हो। इसका वृक्ष-बड़ा होता है और छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में पत्ते सघन लगते हैं। माघ-फागुन में आम का बौर होता है और ग्रीष्म ऋतु में फल पकते हैं। फल-किंचित् लम्बाई लिये गोल होता है और उसके भीतर गुद्दी होती है जो गुठली से लिपटी हुई रहती है। आम का वृक्ष इस देश में प्रायः सर्वत्र लगाया हुआ पाया जाता है। संभवतः वन्य अवस्था में यह सिक्किम, आसाम के नंबर जंगल, खासीया पहाड़, सतपुरा पर्वतश्रेणी के नदियों के उद्गम स्थान तथा पश्चिम घाट में पाया जाता है। इसकी दो जाति होती है-बीजू और कलमी। बीजू-बीज से उत्पन्न होता है और कलमी-डालियों में जोड़ कलम कर के उत्पन्न किया जाता है। बीजू-वृक्ष-बड़े-बड़े होते हैं और कलमी के वृक्ष अधिक ऊँचे नहीं होते। ये दोनों ही स्वाद के भेद से अनेक प्रकार के होते हैं। किसी का स्वाद खट्टा, किसी का खट्टा-मीठा और किसी का मीठा होता है। कलमी आम प्रायः सुस्वादु होते हैं और इसी को लोग पसन्द करते हैं। इसके फल भी छोटे और बड़े के भेद से कई प्रकार के होते हैं तथा इनके रंग भी मिश्रित हरे, पीले, गुलाबी अनेक प्रकार के होते हैं। संसार के सब फलों में उत्तम और अधिक गुणकारी आम का ही फल है इसलिये इसको फलों का राजा कहते हैं। कवियों की कल्पना है कि जिस प्रकार स्वर्ग में अमृत है उसी प्रकार पृथ्वी में आम का फल है। इसके फल, मज्जा, पत्ते एवं छाल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फल में विटामिन ए, बी, डी एवं अधिक मात्रा में सी पाया जाता है। इसके अतिरिक्त साइट्रिक एसिड एवं अल्प मात्रा में गॅलिक एसिड होता है।