भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन क्षाराभों का मलेरिया के लिये कोई लाभदायक परिणाम नहीं पाया गया है। क्षीर में केउटचौक (Caoutchouc) तथा राल होती है तथा इसका स्वाद कडुवा होता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल उष्ण, तिक्त, तिक्तपौष्टिक, कषाय, स्तंभन, कृमिघ्न, स्तन्यजनन, दीपन एवं कुष्ठघ्न है। इसका उपयोग ज्वर, विषमज्वर, अतिसार, प्रवाहिका, चर्मरोग एवं कृमि में किया जाता है। (१) इससे ज्वर कम होता है। आधुनिक परीक्षणों से देखा गया है कि मलेरिया में कोई विशेष लाभ नहीं होता, केवल ज्वर का वेग कम होता है तथा बाद में तिक्त पौष्टिक रूप में इससे लाभ होता है जिससे पाचन सुधरता है तथा मन्दज्वर भी चला आता है। (२) अतिसार एवं प्रवाहिका की जीर्णावस्था में समग्र त्वचा का क्वाथ लाभदायक होता है। (३) प्रसूति के पश्चात् इसके साथ सुगंधित द्रव्य देने से दुग्ध की मात्रा बढ़ती है तथा ज्वर, नहीं आता तथा पाचन ठीक रहता है। (४) पुराने व्रणों पर इसका लेप करते हैं। चर्मरोगों में क्षीर का लेप भी लाभदायक है। मात्रा-त्वक् चूर्ण ४-८ माशा; क्वाथ के लिये २-४ तोला; घनसत्व १/८-१/४ तोला। अथ तिनिशः (तिरिच्छ)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह तिनिशः स्यन्दनो नेमी रथद्रुर्वञ्जुलस्तथा। तिनिशः श्लेष्मपित्तास्रमेदःकुष्ठप्रमेहजित् ।। तुवरः श्वित्रदाहघ्नो व्रणपाण्डुकृमिप्रणुत् ।।७६।। तिरिच्छ के संस्कृत नाम-तिनिश, स्यन्दन, नेमी, रथद्रु तथा वञ्जुल ये सब हैं। तिरिच्छ-कषाय रस युक्त एवम् कफ, पित्त, रक्तविकार, मेद, कुष्ठ, प्रमेह, श्वेतकुष्ठ, दाह, व्रण, पाण्डु तथा कृमि का नाशक है। [७६] नोट-तिनिश के संस्कृत पर्यायों के आधार पर यह निःसंदेह यूजिनिया डल्बर्जियोडिस् (Ougeinia dalbergioides) वृक्ष है। किन्तु गलती से कहीं-कहीं इसका नाम लाजरस्ट्रोमिया फ्लोस रेजिनी (Lagerstroemia flos-reginae) लिखा मिलता है जिसे अर्जुन भी कहा गया है। यहाँ दोनों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। ४१. तिनिश, पानन हिं०-सानन, पानन, सन्दन। बं०-तिनिश। गु०-तणछ। म०-तिमस। ता०-नारिवेगई। ते०-लेल्ल मोटुकु। ले०-Ougeinia dalbergioldes Benth. (युजिनिया डल्बर्जिओडिस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह हिमालय में ५००० हजार फीट तक पञ्जाब से भूटान तक एवं अवध, बुंदेलखण्ड, छोटा नागपुर, मध्य भारत, उड़ीसा, सरकार, मध्य प्रदेश, बंबई तथा मारवाड़ में होता है। इसके वृक्ष-छोटे तथा टेढ़े-मेढ़े होते हैं। शाखा-पतली तथा श्वेताभ होती है। पत्ते-त्रिपत्रक तथा प्रायः नीचे से कुछ रजावृत होते हैं। अग्र्य पत्रक ३-६ इञ्च लम्बे, अण्डाकार, वृत्ताकार या अभिअण्डाकार, कुण्ठिताग्र एवं अखण्ड या गोल-दन्तुर होते हैं। पार्श्व पत्रक छोटे, विपरीत तथा तिर्यक् होते हैं। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं प्रायः पुराने काण्ड से बहुत बड़ी संख्या में निकलते हैं। फली-२-४ × १/३ इञ्च लम्बी होती है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होने के कारण प्रायः गाड़ी के धुरों के लिए काम में लाई जाती है। इसके स्थानिक नाम तिनसा तथा सानन संस्कृत पर्याय तिनिश एवं स्यन्दन के अपभ्रंश मालूम पड़ते हैं। इसी तरह रथद्रु नाम इसका रथ में उपयोग की ओर संकेत करता है। ४८ भाव.I