भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०४ भावप्रकाशनिघण्टुः एक ग्रंथि होती है। पत्रक ८-१२ जोड़े, अवृन्त, तिर्यगायताकार, चिकने, चमड़े जैसे कड़े एवं उनका अग्र कड़ा और तीक्ष्ण होता है। पुष्प-पीता, छोटे, २-३ इञ्च लम्बी मंजरी में आते हैं। फली-लटकी हुई, बीच-बीच में संकुचित तथा ५-१० इञ्च लम्बी होती है जिनमें १०-१५ बीज मधुर फलमज्जा के भीतर रहते हैं। कच्ची फलियों का साग बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाते हैं। दशहरा को लोग इस वृक्ष का पूजन करते हैं। इसकी छाल, पुष्प तथा फली का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल संग्राहक एवं रक्तपित्तशामक होती है। इसकी फली केश को हानि पहुँचाने वाली होती है। (च० सू० अ० २७, सु० सू० अ० ४६)। बालों को हटाने के लिये इसकी राख को मलते हैं। गर्भपात न हो इसलिये इसके फूलों को कूट कर मिश्री मिलाकर गर्भिणी को खिलाया जाता है। अथ सप्तपर्णः (छतिवन-सतौना) । तस्य नामानि गुणांश्चाह सप्तपर्णो विशालत्वक् शारदो विषमच्छदः ।।७४।। सप्तपर्णो व्रणश्लेष्मवातकुष्ठास्रजन्तुजित् । दीपनः श्वासगुल्मघ्नः स्निग्धोष्णास्तुवरः सरः ।।७५।। छतिवन के संस्कृत नाम-सप्तपर्ण, विशालत्वक, शारद तथा विषमच्छद ये सब हैं। छतिवन-कषायरसयुक्त, अग्निदीपक, स्निग्ध, उष्ण, सारक एवम्-व्रण, कफ, वात, कुष्ठ रक्तविकार, जन्तु, श्वास तथा गुल्म का नाशक है। [७४-७५] ४०. सतौना हिं०-सतौना, सतवन, छतिवन, सतिवन । बं०-छातिम । म०-सातवीण । गु०-सातवण । क०-हाले । ते०-एडाकुलरि । ता०-एलिलैप्पालतै । ले०-Alstonia scholaris R. Br. (एल्स्टोनिया स्कोलेरिस्) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । सतिवन का वृक्ष प्रायः सब आर्द्र प्रान्तों में पाया जाता है। किन्तु विशेष रूप से प० समुद्र के किनारे के जंगलों में अधिक पाया जाता है। इसका वृक्ष-सुन्दर, विशाल, सीधा, सदाहरित एवं क्षीरयुक्त होता है। शाखाएँ तथा पत्ते चक्रिक क्रम में निकले रहते हैं। पत्ते-प्रति चक्र में ३-७, प्रायः ६, चिकने, आयताकार-भालाकार या अभिअंडाकार ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से श्वेताभ, ४-८ इञ्च लम्बे तथा ६-१३ मि० मी० लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-हरिताभ श्वेत तथा गुच्छों में आते हैं। फली-दो-दो एक साथ, नीचे लटकी हुई, १-२ फीट लम्बी तथा ३ मि० मी० व्यास की होती है। बीज- ६ मि० मी० लम्बे, चिपटे तथा रोमश होते हैं। छाल-टहनियों की ३-४ मि० मी० मोटी, मुड़ी हुई एवं काण्ड की ७ मि० मी० मोटी होती है। बाहर से नवीन छाल गहरे धूसर या भूरे रंग की तथा पुरानी बहुत खुरदरी, असमान, फटी हुई होती है तथा उन पर अनेक गोल या आड़े धूसर या सफेद धब्बे रहते हैं। अन्दर से यह भूरे-पीताभ या गहरे धूसराभ भूरे रंग की, कुछ धारीदार तथा गद्देदार रहती है। यह गंधहीन एवं स्वाद में तिक्त रहती है। इसकी छाल, पत्र, पुष्प तथा दुग्ध का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में क्षाराभ की मात्रा ०.१६-०.२७% रहती है जिसमें प्रधानता एचिटेमाइन (Echitamine, C₂₃ H₂₈ O₄ N₂ H₂ O) की तथा अल्प मात्रा में एचिटामिडीन (Echitamidine, C₂₀ H₂₆ O₃ N₂) रहता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA