भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी लकड़ी में घाव करने से एक प्रकार का गोंद भी प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग—यह कषाय, ग्राही, कफपित्त शामक, रसायन एवं वयस्थापन (सु० चि० अ० १) है। इसका उपयोग कुष्ठ (च० चि० अ० ७), रक्तातिसार (सु० उ० अ० ४०), प्रमेह, रक्तदोष एवं ज्वर में किया जाता है। (१) इसके छाल का क्वाथ ज्वरहर माना जाता है तथा जब पेशाब का रंग गहरा होता है तब इसे पिलाते हैं। (२) इसका गोंद अतिसार तथा प्रवाहिका में देते हैं। ४२. जारूल हिं०—जरुल, जारुल, अर्जुन ? बं०—जरूल। म०—तामण। ता०—कीदली। ते०—वारगोगु। ले०— Lagerstroemia flos-reginae Retz. (लाजरस्ट्रोमिया फ्लोस रेजिनी)। Fam. Lythraceae (लिथरेसी)। यह पूरब बङ्गाल, आसाम और रत्नागिरी आदि प्रान्तों में उत्पन्न होता है । यह प्रायः नदियों के किनारे तथा पहाड़ियों से निर्गम स्थान पर होता है। इसको शोभा के लिये बागों में लगाते भी हैं। इसका वृक्ष—बड़ा, ३०-६० फीट तक ऊँचा होता हैं। पत्ते—४ से ८ इञ्च तक लम्बे कुछ चौड़े, किञ्चित् अंडाकार, आयताकार-भालाकार और नुकीले होते हैं। फूल—सुन्दर, २-३ इञ्च के घेरे में बैंगनी युक्त लाल होते हैं। बाह्यदल श्वेत रज से आवृत्त होते हैं। फल—१ १/४-१ इञ्च बड़े कुछ गोल होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके प्रत्येक भाग में विशेष करके पुराने पत्तों एवं पके फलों में इन्सुलिन (Insulin) के समान, रक्तगत शर्करा की मात्रा को कम करने वाला पदार्थ पाया गया है । गुण और प्रयोग—इसकी छाल तथा पत्ते—रेचक होते हैं। बीज मादक माने जाते हैं। मूल ग्राही तथा ज्वरनाशक है। छाल का क्वाथ ज्वर में दिया जाता है। मुख के व्रणों में फल का स्थानिक उपयोग किया जाता है। अथ भूमीसहः (सागोन) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह भूमीसहो द्वारदारुवरदारुः खरच्छदः। भूमीसहस्तु शिशिरो रक्तपित्तप्रसादनः ।।७७।। सागोन के संस्कृत नाम—भूमीसह, द्वारदारु, वरदारु तथा खरच्छद ये सब हैं। सागोन—शीतल एवं रक्तपित्त को शुद्ध करने वाला है। [७७] ४३. सागोन सं०—शाक, साग। हिं०—सागोन, सागवन, सागु (ग) वान। बं०—सेगुन गाछ। म०-गु०—सागवान। क०—तेगिन। ते०—तेकु। ता०—टेक्कु। अं०—Indian Teak Tree (इण्डियन टीक ट्री)। ले०—Tectona grandis Linn. (टेक्टोना ग्रैण्डिस)। Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। इसके वृक्ष—दक्षिण तथा मध्य भारत में अधिक होते हैं। यह वृक्ष—बहुत ऊँचा, सीधा और विशाल होता है। ५०-६० फीट की ऊँचाई पर शाखाएँ होती हैं। इसके पत्ते—बहुत लम्बे चौड़े, ऊपर से खुरदरे और नीचे से सफेद रोवेंदार होते हैं। इनको हाथ से मलने से हाथ लाल हो जाता है। फूल—सफेद रंग के गुच्छों में आते हैं। फल—छोटे, २/३ इञ्च व्यास के, गोलाकार रोमश होते हैं। सागोन एक प्रयोजनीय और प्रसिद्ध काष्ठ है। इसकी लकड़ी से तख्ते, बक्स, आलमारी इत्यादि बहुत सी चीजें बनाते हैं। यह हलकी, चिक्कन और टिकाऊ होती है तथा इसमें दीमक नहीं लगती। इसके सभी भागों का उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA