भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवटादिवर्गः ७०७ रासायनिक संगठन-इसके काष्ठ में क्विनीन सदृश पदार्थ टेक्टोक्विनीन, राल २.९३% जो चर्म के लिये प्रक्षोभक होती है, कुछ उड़नशील तेल तथा अन्य स्नेह पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल या काष्ठ पित्तशामक कुछ स्तम्भन एवं कृमिघ्न है। शोथ एवं शिरःशूल में इसका लेप किया जाता है। कुपचन, पित्त प्रकोप तथा पेट की जलन में इसका चूर्ण ३-१२ माशे की मात्रा में देते हैं। इसके पुष्प तथा बीज मूत्रजनन हैं। मूत्रावरोध में फूलों से पेडू पर सेंकते हैं तथा फाँट पिलाते हैं। बीजों का तेल केशवर्धक है तथा खुजली (पामा) में लगाया जाता है। इसके पत्तों का रस खपड़े में गरम करके विसर्प पर लगाते हैं। पत्तों को पीस कर विसारी (Whitlow) पर बाँधते हैं। सर्प (फुरसा) दंश से रक्तस्राव होता हो तो इसके कोमल अंकुरों के रस से बन्द होता है। मात्रा-त्वक् चूर्ण ३-१२ माशा। इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे वटादिवर्गः समाप्तः।