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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

वटादिवर्गः ७०७ रासायनिक संगठन-इसके काष्ठ में क्विनीन सदृश पदार्थ टेक्टोक्विनीन, राल २.९३% जो चर्म के लिये प्रक्षोभक होती है, कुछ उड़नशील तेल तथा अन्य स्नेह पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल या काष्ठ पित्तशामक कुछ स्तम्भन एवं कृमिघ्न है। शोथ एवं शिरःशूल में इसका लेप किया जाता है। कुपचन, पित्त प्रकोप तथा पेट की जलन में इसका चूर्ण ३-१२ माशे की मात्रा में देते हैं। इसके पुष्प तथा बीज मूत्रजनन हैं। मूत्रावरोध में फूलों से पेडू पर सेंकते हैं तथा फाँट पिलाते हैं। बीजों का तेल केशवर्धक है तथा खुजली (पामा) में लगाया जाता है। इसके पत्तों का रस खपड़े में गरम करके विसर्प पर लगाते हैं। पत्तों को पीस कर विसारी (Whitlow) पर बाँधते हैं। सर्प (फुरसा) दंश से रक्तस्राव होता हो तो इसके कोमल अंकुरों के रस से बन्द होता है। मात्रा-त्वक् चूर्ण ३-१२ माशा। इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे वटादिवर्गः समाप्तः।

अथ आम्रादिफलवर्गः तत्रादावाम्रः (आम) । तस्य नामान्याह आम्रश्चूतो रसालश्च सहकारोऽतिसौरभः । कामाङ्गो मधुदूतश्च माकन्दः पिकवल्लभः ।। १ ।। आम के संस्कृत नाम—आम्र, चूत, रसाल, सहकार, अतिसौरभ, कामाङ्ग, मधुदूत, माकन्द और पिकवल्लभ ये सब हैं । [१] अथाम्रपुष्पगुणानाह आम्रपुष्पमतीसारकफपित्तप्रमेहनुत् । असृग्दुष्टिहरं शीतं रुचिकृद् ग्राहि वातलम् ।। २ ।। आम का फूल—शीतल, रुचिकारक, ग्राही, वातजनक, एवम्-अतिसार, कफ, पित्त, प्रमेह तथा रक्तदोष को दूर करने वाला होता है । [२] अथामाम्रफलम् (अमिया) । तस्या गुणानाह आमं बालं कषायाम्लं रुच्यं मारुतपित्तकृत् । तरुणं तु तदत्यम्लं रूक्षं दोषत्रयास्त्रकृत् ।। ३ ।। अमिया (आम के कच्चे फल) कषाय तथा आम्लरसयुक्त, रुचिकारक एवं वात और पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है । प्रौढ़ आम का कच्चा फल—तो अत्यन्त अम्ल रस युक्त तथा रूक्ष होता है एवम् त्रिदोष तथा रक्त विकार को उत्पन्न करने वाला होता है । [३] अथ शुष्कामाम्रफलम् (अमचूर) । तस्य लक्षणगुणानाह आम्राममं त्वचाहीनमातपेऽतिविशोषितम् । अम्लं स्वादु कषायं स्याद्भेदनं कफवातजित् ।। ४ ।। अमचूर के लक्षण—कच्चे आम के ऊपर का छिल्का उतार कर यदि उसे धूप में डाल दिया जाय तो अत्यन्त सूख जाने पर उसे अमचूर कहते हैं । अमचूर—अम्ल तथा कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, मल का भेदन करने वाला एवं कफ तथा वात को दूर करने वाला होता है । [४] अथ पक्वाम्रफलम् (पका आम) । तस्य गुणानाह पक्वं तु मधुरं वृष्यं स्निग्धं बलसुखप्रदम् । गुरु वातहरं हृद्यं वर्ण्यं शीतमपित्तलम् ।। कषायानुरसं वह्निश्लेष्मशुक्रविवर्द्धनम् ।। ५ ।। पका आम का फल—आरम्भ में मधुर तथा अन्त में कषाय रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, बल तथा सुख को देने वाला, गुरु, वात नाशक, हृदय को हितकर, वर्ण को उत्तम करने वाला, शीतल, थोड़ा पित्तजनक एवम् जठराग्नि, कफ तथा शुक्र का बढ़ाने वाला होता है । [५] अथ वृक्षपक्वाम्रफलगुणानाह तदेव वृक्षसम्पक्वं गुरु वातहरं परम् । मधुराम्लरसं किञ्चिद्भवेत्पित्तप्रकोपणम् ।। ६ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

आम्रादिफलवर्गः ७०९ वृक्ष ही में पका हुआ आम का फल—वृक्ष में यदि आम पका हो तो वह मधुर तथा अम्ल रस युक्त, गुरु, अत्यन्त वातनाशक तथा किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाला होता है। [६] अथ कृत्रिमपक्वचूषिताम्रफलगुणानाह आम्रं कृत्रिमपक्वञ्च तद्भवेत्पित्तनाशनम्। रसस्याम्लस्य हीनस्तु माधुर्याच्च विशेषतः ।।७।। चूषितं तत्परं रुच्यं बलवीर्यकरं लघु। शीतलं शीघ्रपाकि स्याद्वातपित्तहरं सरम् ।।८।। कृत्रिम रीति से पकाये हुए (पाल के) आम के फल—यदि आम का फल कृत्रिम रीति से पकाया गया हो तो वह पित्तनाशक होता है क्योंकि उसमें का अम्ल रस निकल जाता है तथा मधुर रस की विशेषता हो जाती है। वह यदि चूसा जाय तो अत्यन्त रुचिजनक, बल वीर्य-कारक, लघु, शीतल, शीघ्र हजम होने वाला, सारक एवम् वात-पित्त नाशक है। [७-८] अथ गलिताम्ररसगुणानाह तद्रसो गालितो बल्यो गुरुर्वातहरः सरः। अहृद्यस्तर्पणोऽतीव बृंहणः कफवर्धनः ।।९।। निचोड़े आम का रस—बलकारक, गुरु, वातनाशक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, अत्यन्त सन्तर्पण करने वाला, बृंहण रस रक्तादि वर्धक एवं कफ की वृद्धि करने वाला होता है। [९] अथाम्रखण्डगुणानाह तस्य खण्डं गुरु परं रोचनं चिरपाकि च। मधुरं बृंहणं बल्यं शीतलं वातनाशनम् ।।१०।। पके आम के टुकड़े—गुरु, अत्यन्त रोचक, देर में हजम होने वाले, मधुर रस युक्त, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), बलकारक, शीतल एवम् वातनाशक होते हैं। [१०] अथ दुग्धयुक्ताम्रगुणानाह वातपित्तहरं रुच्यं बृंहणं बलवर्धनम्। वृष्यं वर्णकरं स्वादु दुग्धाम्र गुरु शीतलम् ।।११।। दुग्धाम्र (दूध के साथ खाने पर) पका आम का फल—स्वादिष्ट, वातपित्त नाशक, रोचक, बृंहण, बलवर्धक, वृष्य (वीर्यवर्धक), वर्ण को उत्तम करने वाला, गुरु तथा शीतल होता है। [११] अथाम्रातियोगः (आम बहुत खाना)। तस्य दोषानाह मन्दानलत्वं विषमज्वरं च रक्तामयं बद्धगुदोदरं च। आम्रातियोगो नयनामयं वा करोति तस्मादति तानि नाद्यात् ।।१२।। एतदम्लाम्रविषयं मधुराम्लपरं न तु। मधुरस्य परं नेत्रहितत्वाद्या गुणा यतः ।।१३।। आम्रातियोग (अधिक आम खाने) के दोष—जठराग्नि की मन्दता, विषमज्वर, रक्तसम्बन्धी रोग, अत्यन्त मल का अवरोध और नेत्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न करता है। इसलिये अधिक आम नहीं खाना चाहिये। यह निषेध अम्ल (खट्टे) आम के विषय में है न कि मधुर तथा अम्ल रस युक्त आम के विषय में है, क्योंकि मधुर रस में नेत्रों को हित पहुँचाना आदि गुण वर्तमान ही हैं। [१२-१३] अथाम्रातियोगदोषनिवृत्त्युपायमाह शुण्ठ्यम्भसोऽनुपानं स्यादाम्राणामतिभक्षणे। जीरकं वा प्रयोक्तव्यं सह सौवर्चलेन च ।।१४।। आम्रातियोग से उत्पन्न हुए दोषों की निवृत्ति का उपाय—आम अधिक खा लेने पर सोंठ के साथ जल पीना चाहिये अथवा सोंचल नोन के साथ जीरा खाना चाहिये। [१४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

७१० भावप्रकाशनिघण्टुः अथाम्रावर्त्तः (अमावट) । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह पक्वस्य सहकारस्य पटे विस्तारितो रसः । घर्मशुष्को मुहुर्दत्त आम्रावर्त्त इति स्मृतः ।।१५।। आम्रावर्त्तस्तृषाच्छर्द्दिवातपित्तहरः सरः । रुच्यः सूर्यांशुभिः पाकाल्लघुश्च सं हि कीर्त्तितः ।।१६।। अमावट के लक्षण—पके आम के रस को निकाल, कपड़े पर पसार कर धूप में सुखावे, जब सूख जाय तब उसी पर पुनः रस डाले और सुखावे इसी भाँति सुखाकर जो मोटी पर्त्त तैयार होती है उसी को ‘अमावट’ कहते हैं। अमावट—प्यास, वमन, वात तथा पित्त का नाशक, सारक तथा रोचक होता है। एवं सूर्य के किरणों से सूख कर परिपक्व होने से लघु होता है। [१५-१६] अथाम्रबीजम् (कोइलिया) । तस्य गुणानाह आम्रबीजं कषायं स्याच्छर्द्यतीसारनाशनम् । ईषदम्लञ्च मधुरं तथा हृदयदाहनुत् ।।१७।। आम्रबीज (आम की गुठली की मींगी)—कषाय, मधुर एवं किंचित् अम्ल रस युक्त तथा वमन, अतिसार एवम् हृदय के दाह को दूर करने वाला होता है। [१७] अथाम्रनवपल्लवः । तस्य गुणानाह आम्रस्य पल्लवो रुच्यः कफपित्तविनाशनः ।।१८।। आम के नवीन पल्लव—रुचिकारक तथा कफ और पित्त के नाशक होते हैं। [१८] १. आम हिं०, बं०-आम। म०-आम्बा। गु०-आम्बो। ते०-मामिडिचेट्टु। ता०-मांगाय, मामरं। क०-अंब, अंभ। फा०-अम्बः। अ०-अम्बज। अं०-Mango Tree (मङ्गो ट्री)। ले०-Mangifera indica Linn. (मङ्गीफेरा इण्डिका)। Fam. Anacardiaceae (अॅनेकार्डिएसी)। आम सर्वप्रिय और सर्वप्रसिद्ध फल है। इस देश में कोई ऐसा मनुष्य न होगा जो आम को न जानता हो। इसका वृक्ष-बड़ा होता है और छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में पत्ते सघन लगते हैं। माघ-फागुन में आम का बौर होता है और ग्रीष्म ऋतु में फल पकते हैं। फल-किंचित् लम्बाई लिये गोल होता है और उसके भीतर गुद्दी होती है जो गुठली से लिपटी हुई रहती है। आम का वृक्ष इस देश में प्रायः सर्वत्र लगाया हुआ पाया जाता है। संभवतः वन्य अवस्था में यह सिक्किम, आसाम के नंबर जंगल, खासीया पहाड़, सतपुरा पर्वतश्रेणी के नदियों के उद्गम स्थान तथा पश्चिम घाट में पाया जाता है। इसकी दो जाति होती है-बीजू और कलमी। बीजू-बीज से उत्पन्न होता है और कलमी-डालियों में जोड़ कलम कर के उत्पन्न किया जाता है। बीजू-वृक्ष-बड़े-बड़े होते हैं और कलमी के वृक्ष अधिक ऊँचे नहीं होते। ये दोनों ही स्वाद के भेद से अनेक प्रकार के होते हैं। किसी का स्वाद खट्टा, किसी का खट्टा-मीठा और किसी का मीठा होता है। कलमी आम प्रायः सुस्वादु होते हैं और इसी को लोग पसन्द करते हैं। इसके फल भी छोटे और बड़े के भेद से कई प्रकार के होते हैं तथा इनके रंग भी मिश्रित हरे, पीले, गुलाबी अनेक प्रकार के होते हैं। संसार के सब फलों में उत्तम और अधिक गुणकारी आम का ही फल है इसलिये इसको फलों का राजा कहते हैं। कवियों की कल्पना है कि जिस प्रकार स्वर्ग में अमृत है उसी प्रकार पृथ्वी में आम का फल है। इसके फल, मज्जा, पत्ते एवं छाल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फल में विटामिन ए, बी, डी एवं अधिक मात्रा में सी पाया जाता है। इसके अतिरिक्त साइट्रिक एसिड एवं अल्प मात्रा में गॅलिक एसिड होता है।

आम्रादिफलवर्गः ७११ गुण और प्रयोग-इसकी छाल उत्तम रक्तसंग्राहक है तथा इसका क्वाथ फुप्फुस, आंत्र एवं गर्भाशय से रक्तस्राव होने पर दिया जाता है। रक्तार्श तथा अत्यार्तव में मज्जा १० से १५ रत्ती की मात्रा में देते हैं। छिलके के साथ कच्चा फल पीस कर आमाशय एवं गले की शिथिलता तथा गले के अर्बुद में देते हैं। कच्चे फल का शरबत (पन्ना) लू लगने पर पिलाते हैं। गुठली के अन्दर की मज्जा अतिसार तथा प्रवाहिका में दी जाती है। मात्रा-मज्जा १० से १५ रत्ती; छाल ३-६ माशा। अथाम्रातकः (अम्बाडा)। तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह आम्रातकः पीतनश्च मर्कटाम्रः कपीतनः। आम्रातमम्लं वातघ्नं गुरूष्णं रुचिकृत्सरम् ।।१९।। पक्वन्तु तुवरं स्वादु रसे पाके हिमं स्मृतम्। तर्पणं श्लेष्मलं स्निग्धं वृष्यं विष्टम्भि बृंहणम् ।। गुरु बल्यं मरुत्पित्तक्षतदाहक्षयास्रजित् ।।२०।। अम्बाडा के संस्कृत नाम-आम्रातक, पीतन, मर्कटाम्र, कपीतन और आम्रात ये सब हैं। अम्बाडा-अम्ल रस युक्त, वातनाशक, गुरु, उष्ण, रुचिकारक और सारक होता है। अम्बाडा का पकाफल-कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, विपाक में मधुर, शीतल, सन्तर्पण करने वाला, कफजनक, स्निग्ध, वृष्य, विष्टम्भक (वायु को स्तब्ध करने वाला), बृंहण, गुरु, बलकारक, एवम् वात, पित्त, क्षत, दाह, क्षय और रक्तविकार का नाशक है।।१९-२०] २. अम्बाडा हिं०-अम्बाडा अमड़ा, अमरा, आमड़ा। बं०-आमडा। म०-अंबाडा, ढोर आंबा। गु०-अंबेडा। क०- अंवर। ते०-अंबालमु। अं०-Indian Hog plum. (इण्डियन हॉग प्लम्)। ले०-Spondias mangifera Willd. (स्पॉण्डिएस् मॅङ्गीफेरा)। Fam. Anacardiaceae (अॅनेकार्डिएसी)। अम्बाडा का वृक्ष-बड़ा होता है। पत्ते-संयुक्त तथा १-१ १/२ फीट लम्बे होते हैं। पत्रक-३ से ६ इञ्च लम्बे, १ १/२-३ इञ्च चौड़े तथा चमकीले, दीर्घवृत्ताभ आयताकार, लम्बाग्र तथा किनारे के चारों ओर रहने वाली शिरा में अन्य शिराएँ मिलती हैं। पुष्प-हरिताभ, श्वेत वर्ण तथा छोटे होते हैं। वसन्त ऋतु में इसके सब पत्ते गिर जाते हैं और मञ्जरी लगती है। फल-गुच्छों में, हरिताभ एवं अंडाकार लगते हैं। इनका अचार बनाते हैं। यह देशी और विलायती भेद से दो प्रकार का होता है। विलायती को स्पौ० डलसिस् (S. dulcis) कहते हैं। देशी के फल कच्ची अवस्था में अम्ल किन्तु पकने पर बाहरी भाग में अम्ल तथा अंदर से मधुर होते हैं। विलायती के फल गहरे अंबर वर्ण के, अत्यन्त अम्ल एवं इसमें खराब आम के जैसी गंध आती है। सुखाये हुये अपक्व फलों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही तथा रक्तपित्त शामक होते हैं। छाल अतिसार में देते हैं। कर्णशूल में पत्तों का रस डालते हैं। फल का रस पित्तप्रकोप में देते हैं। अथ राजाम्रः (कलमी आम)। तन्नामानि तत्फलस्य गुणाँश्चाह राजाम्रष्टङ्क आम्रातः कामाङ्गो राजपुत्रकः ।।२१।। राजाम्रं तुवरं स्वादु विशदं शीतलं गुरु। ग्राहि रूक्षं विबन्धाध्मावातकृत्कफपित्तनुत् ।।२२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

७१२ भावप्रकाशनिघण्टुः **कलमी आम के संस्कृत नाम-**राजास्र, टङ्क, आम्रात, कामाह तथा राजपुत्रक ये सब हैं। **कलमी आम-**कषाय तथा मधुर रस युक्त, विशद गुण युक्त, शीतल, गुरु, ग्राही, रूक्ष एवम्-विबन्ध, आध्मान तथा वातकारक होता है और कफ तथा पित्त का नाशक होता है। [२१-२२] ३. कलमी आम सब प्रकार के कलमी आमों में लंगड़ा आम प्रसिद्ध है। हाजीपुर और बनारस का लंगड़ा आम सबसे अच्छा होता है, बम्बई का लंगड़ा मध्यम प्रकार का समझा जाता है। पूरब का गोला, लखनऊ का सफेदा, रामपुर का फजरी, मुरादाबाद का कलमी आदि आम अच्छे होते हैं। जिस आम में रेशा बहुत कम रहता है, गूदा अधिक रहता है तथा जो स्वाद में खूब मीठा सर्वप्रिय होता है उसी को उत्तम समझना चाहिये। यह जितना मीठा होता है उतने ही उसमें गुण भी अधिक होते हैं। आम में जो पुष्टिकारक, बलकारी, वीर्य को उत्पन्न करना इत्यादि गुण हैं वे सब भली प्रकार से पके हुए और मीठे ही आम में होते हैं। अन्य वर्णन आम के साथ लिखा गया है। अथ कोशाम्रः। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह कोशाम्र उक्तः क्षुद्राम्रः कृमिवृक्षः सुकोशकः। कोशाम्रः कुष्ठशोथास्रपित्तव्रणकफापहः ।।२३।। तत्फलं ग्राहि वातघ्नमम्लोष्णं गुरु पित्तलम्। पक्वन्तु दीपनं रुच्यं लघूष्णं कफवातनुत् ।।२४।। **कोशाम्रः आम के संस्कृत नाम-**कोशाम्र, क्षुद्राम्र, कृमिवृक्ष तथा सुकोशक ये सब हैं। **कोशाम्र-**कुष्ठ, शोथ, रक्तविकार, पित्त या रक्तपित्त, व्रण और कफ का नाशक है। कोशाम्र आम का फल-ग्राही, वातनाशक, अम्लरसयुक्त, उष्ण, गुरु तथा पित्तजनक होता है। यदि इसके फल पके हों तो अग्निदीपक, रुचिकारक, लघु, उष्ण एवं कफ तथा वात के नाशक होते हैं। [२३-२४] ४. कोशाम्र **हिं०-**कोशाम्भ, कुसुम, कोसम। **क०-**चकोट। **म०-**कोसिंब। **ता०-**पुमरम्। **मल-**पुपम्। **गु०-**कोसुंव। **अं०-**Ceylon Oak (सिलोन् ओक्)। ले०-Schleichera trijuga Willd. (श्लीकेरा ट्राइज्यूगा)। Fam. Sapindaceae (सेपिन्डेसी)। यह सतलज से नेपाल तक, दक्षिण तथा सिवालिक पहाड़ के ऊपर मध्य भारत में पाया जाता है। इसका **वृक्ष-**बड़ा छायादार तथा सुन्दर होता है। **पत्ते-**पक्षवत् तथा ८-१६ इञ्च लम्बे होते हैं। **पत्रक-**२ से ४ जोड़े, अखण्ड, ३-१० इञ्च लम्बे, आयताकार, अवृन्त तथा चिकने होते हैं। नीचे वाले पत्रक ऊपर के पत्रकों की अपेक्षा छोटे होते हैं। **फूल-**मञ्जरी में आते हैं और वे पीलापन युक्त हरे रंग के होते हैं। **फल-**१ १/२ इञ्च लम्बे गोल, दानेदार और किञ्चित् नोकीले होते हैं। **बीज-**१ से ३, चिकने तथा लंबगोल चिपटे होते हैं। इस पर लगी हुई लाख बहुत उत्तम मानी जाती है। बीज की गुद्दी तथा बाह्यवृद्धि (Aril) खाई जाती है। इसकी **छाल-**मोटी, मुलायम, बाहर से धूसर, खुरदरी तथा भीतर से फीके लाल रंग की होती है। तोड़ने से भग्न छोटा होता है। स्वाद कुछ कषाय तथा गंध हलकी। इसकी छाल तथा बीज तैल का उपयोग किया जाता है। कलकत्ते की तरफ बीजों को पक कहते हैं। **रासायनिक संगठन-**बीजों में साइनोजेनेटिक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। **गुण और प्रयोग-**इसकी छाल कषाय होती है तथा पानी में घिस कर खुजली आदि चर्मरोगों पर लगाई जाती है। बीजों का तेल, जिसे मकासर तेल कहते हैं, खुजली पर लगाया जाता है। इसको बालों में लगाने से बाल स्वच्छ होते हैं तथा बढ़ते हैं। बीजों का चूर्ण जानवरों के व्रणों पर डालते हैं जिससे कीड़े निकल जाते हैं।

आम्रादिफलवर्गः ७१३ अथ पनसः (कटहल) । तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह पनसः कण्टकिफलः पलसोऽतिबृहत्फलः । पनसं शीतलं पक्वं स्निग्धं पित्तानिलापहम् ।। २५ ।। तर्पणं बृंहणं स्वादु मांसलं श्लेष्मलंभृशम् । बल्यं शुक्रप्रदं हन्ति रक्तपित्तक्षतव्रणान् ।। २६ ।। आमं तदेव विष्टम्भि वातलं तुवरं गुरु । दाहकृन्मधुरं बल्यं कफमेदोविवर्द्धनम् ।। २७ ।। कटहर के संस्कृत नाम—पनश कण्टकिफल, पलस तथा अतिबृहत्फल ये सब हैं। कटहर के पके फल—शीतल, स्निग्ध, पित्त तथा वात के नाशक, सन्तर्पणकारक, बृंहण, स्वादिष्ट, मांस तथा कफ की अत्यन्त वृद्धि करने वाले, बलदायक, शुक्रजनक एवम् रक्तपित्त, क्षत तथा व्रण को दूर करनेवाले होते हैं। वे ही यदि कच्चे हों तो विष्टम्भकारक, वातजनक, कषाय तथा मधुररसयुक्त, गुरु, दाहकारक, बलदायक, कफ तथ मेद की वृद्धि करने वाले होते हैं। [२५-२७] अथ पनसबीजगुणानाह पनसोद्भूतबीजानि वृष्याणि मधुराणि च । गुरूणि बद्धविट्कानि सृष्टमूत्राणि संवदेत् ।। २८ ।। कटहर के बीज—वृष्य (वीर्यवर्धक), मधुर रस युक्त, गुरु, मल को बाँधने वाले एवम् मूत्र की प्रवृत्ति करानेवाले होते हैं। [२८] अथ पनसमज्जगुणानाह मज्जा पनसजो वृष्यो वातपित्तकफापहः । विशेषात्पनसो वर्ज्यो गुल्मिभिर्मन्दवह्निभिः ।। २९ ।। कटहल के बीज की मींगी—वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम् वात, पित्त तथा कफ की नाशक होती है। विशेष रूप से कटहल खाना गुल्म तथा मन्दाग्निरोगवाले रोगियों को छोड़ देना चाहिये। ५. कटहर हिं०—कटहर, कटहल, कठैल। बं०—कांटाल। म०—फणस। गु०—फनस। क०—हलसु। ते०—पनसकायि। ता०—पेलाकायि। अं०—Jack Tree (जैक ट्री)। ले०—Artocarpus integrifolia Linn f. (आर्टोकार्पस् इण्टेग्रिफोलिया)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। कटहर—विशेष कर गरम प्रान्तों में रोपण किया जाता है। पश्चिम घाट के जङ्गलों में यह आप ही आप उत्पन्न होता है और दक्षिण, बिहार तथा बंगाल में अधिक होता है। इसका वृक्ष—बड़ा होता है। छाल—खुरदरी रहती है जिससे दुधिया क्षीर निकलता है। पत्ते—४-८ इञ्च लम्बे, कुछ चौड़े, मोटे, किंचित् अण्डाकार और किंचित् कालापन युक्त हरे रंग के होते हैं। स्तम्भ और मोटी शाखाओं पर फूल फल लगते हैं। फूल—२ से ६ इञ्च तक लम्बे, १-२ इञ्च गोल अंडाकार और किंचित् पीले रंग के होते हैं। फल— बहुत बड़े-बड़े, १-२ फीट एवं लम्बाई युक्त गोल होते हैं। उसके ऊपर कोमल काँटे होते हैं। गूदा—बीज के चारों तरफ लिपटा हुआ मोटा होता है जो कच्ची अवस्था में सफेद तथा पकने पर पीला हो जाता है। कच्चे फलकी तरकारी बनाते हैं तथा पके फल को खाते हैं। बीजों में स्टार्च रहता है जिन्हें पकाकर खाते हैं। रासायनिक संगठन—फलों में विटामिन ‘ए’ तथा ‘सी’ तथा लौह, खटिक एवं फास्फोरस तथा प्रोटीन आदि द्रव्य होते हैं। बीजों में विटामिन बी<sub></sub> तथा बी<sub></sub> पाये जाते हैं। काष्ठ में पीत रंजक द्रव्य होता है। छाल में टैनिन होता है। सूखे क्षीर में रवेदार पदार्थ आर्टोस्टेनोन (Artostenone C<sub>30</sub>H<sub>56</sub>O) पाया जाता है जिसका परिवर्तन आर्टोस्टेरोन (Artosterone) में किया गया है जिसमें पुंस्त्वजनक (Androgenic–अँड्रोजेनिक) गुण पर्याप्त मात्रा में होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

७१४ भावप्रकाशनिघण्टुः **गुण और प्रयोग—**इसका पका फल गुरु, शीत, मृदु सारक, वृष्य, बृंहण, तर्पण तथा बल्य है किन्तु कच्चा विबन्धकारक होता है। पत्तों का चर्म विकारों में प्रयोग करते हैं। क्षीर का लेप फोड़े आदि पकाने के लिये करते हैं। अथ लकुचः (बडहर) । तन्नामानि तत्पक्वफलगुणाँश्चाह लकुचः क्षुद्रपनसो लिकुचो बहुरित्यपि। आमं लकुचमुष्णाञ्च गुरु विष्टम्भकृत्तथा ॥३०॥ मधुरञ्च तथाऽम्लञ्च दोषत्रितयरक्तकृत्। शुक्राग्निनाशनं वाऽपि नेत्रयोरहितं स्मृतम् ॥३१॥ सुपक्वं तत्तु मधुरमम्लं चानिलपित्तहृत्। कफवह्विकरं रुच्यं वृष्यं विष्टम्भकञ्च तत् ॥३२॥ बड़हर के संस्कृत नाम—लकुच, क्षुद्रपनस, लिकुच तथा डहु ये सब हैं। **बड़हर के कच्चे फल—**उष्ण, गुरु, विष्टम्भकारक, मधुर तथा अम्लरस युक्त, त्रिदोष एवं रक्त विकार को उत्पन्न करने वाले, शुक्र और जठराग्नि को नष्ट करने वाले तथा नेत्रों के लिये अहितकर होते हैं। **पके फल—**मधुर तथा अम्ल रसयुक्त, वात तथा पित्त के नाशक, कफ और जठराग्नि के वर्धक, रोचक, वृष्य (वीर्यवर्धक) तथा विष्टम्भक होते हैं। [३०-३२] ६. बड़हल हिं०—बड़हल (र, बरहर, बरहल)। बं०—डेओ, मादार, डेलो, डहुया। म०—वोटोंबा। गु०—लकूच। ता०— इलगुसम्। ते०—कम्मरेगु। अं०—Monkey Jack (मंकीजॅक्)। ले०—Artocarpus lakoocha Roxb. (आर्टोकार्पस् लकूच)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। यह गरम प्रान्त में कुमायूँ से पूरब की ओर और दक्षिण में त्रावनकोर तक तथा अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। बड़हर का **वृक्ष—**२० से ३० फीट ऊँचा होता है। इसके **पत्ते—**५ से १२ इञ्च लम्बे, २ से ६ इञ्च चौड़े, अण्डाकृति तथा रूक्ष होते हैं। **पुष्प—**एकलिङ्गी होते हैं। **फल—**गोल गाँठदार, २ से ४ इञ्च व्यास के होते हैं। कच्चे में हरे तथा स्वाद में खट्टे और पकने पर मटमैले पीले रंग के और स्वाद में खट्टेमीठे होते हैं। इनके भीतर कटहर के समान रेशा और बीज होते हैं पर कटहर से छोटे होते हैं। इसलिये इसको क्षुद्रपनस भी कहते हैं। वसन्त ऋतु में यह फूलता तथा वर्षा में फलता है। **रासायनिक संगठन—**छाल में ८.५% टैनिन होता है। इसके फल में रंजक द्रव्य इसकी अन्य जाति (Species) की अपेक्षा अधिक होता है। **गुण और प्रयोग—**इसके बीज विरेचक होते हैं। विरेचन के लिये एक दो बीज या थोड़ा सा क्षीर देते हैं। छाल का चूर्ण व्रण पर डालते हैं जिससे मवाद सूख जाता है तथा फांट से फुन्सियाँ तथा व्रण आदि धोते हैं। इसके फल को अहिततम (निकृष्टतम) बतलाया गया है। (अ० हृ० सू० अ० ६)। अथ कदली (केला) । तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह कदली वारणा मोचाऽम्बुसाराऽंशुमतीफला। मोचाफलं स्वादु शीतं विष्टम्भि कफकृद्गुरु¹ ॥३३॥ स्निग्धं पित्तास्रतृड्दाहक्षतक्षयसमीरजित्। पक्वं स्वादु हिमं पाके स्वादु वृष्यञ्च बृंहणम्॥ क्षुत्तृष्णानेत्रगद्दहन्मेघ्नं रुचिमांसकृत् ॥३४॥ **केला के संस्कृत नाम—**कदली, वारणा, मोचा, अम्बुसारा तथा अंशुमतीफला ये सब हैं। १. कफनुद इति पाठ०।

आम्रादिफलवर्गः ७१५ केला के कच्चे फल—स्वादिष्ट, शीतल, विष्टम्भक, कफकारक, गुरु, स्निग्ध एवं-पित्त, रक्तविकार, प्यास, दाह, क्षत, क्षय तथा वात को दूर करने वाले होते हैं। पके फल—स्वादिष्ट, शीतल, विपाक में मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), रुचि तथा मांस को बढ़ाने वाले एवं-भूख, प्यास, नेत्ररोग तथा प्रमेह के नाशक हैं। [३३-३४] अथ कदलीभेदान् गुणनिर्देशपूर्वकमाह माणिक्यमर्त्यामृतचम्पकाद्या भेदाः कदल्या बहवोऽपि सन्ति। उक्ता गुणास्तेष्वधिका भवन्ति निर्दोषता स्याल्लघुता च तेषाम् ।।३५।। केले के भेदों के नाम—माणिक्यकदली, मर्त्यकदली, अमृतकदली तथा चम्पकदली इत्यादि केले के बहुत से भेद हैं। उक्त भेदों के गुण—जो गुण सामारून रूप से पूर्व में केले के कह आये हैं वे सब इनमें विशेष रूप से रहते हैं तथा ये निर्दोष एवं लघु भी अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। केले के फूल एवं कन्द के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुये हैं। ७. केला हिं०-केला, कदली, केरा। बं०-केला, कला। म०-केल। गु०-केला। क०-बालि। ते०-अरटि। ता०-वालै। फा०-मोज, मोझ। अ०-तल्ह। अं०-Plantain (प्लॅन्टॆन)। ले०-Musa sapientum Linn. (म्यूसा सेपिएण्टम्)। Fam. Musaceae (म्यूसेसी)। केले का वृक्ष प्रायः सब प्रान्तों में होता है। फलने पर इसका पेड़ नष्ट हो जाता है। अन्तर्भूमि शायी कन्द से अंकुर निकल वृक्ष तैयार हो जाता है। इसके बड़े-बड़े लम्बे पत्ते मुलायम होते हैं। हवा के झोकों से जगह-जगह फट जाते हैं। इसके पत्तों पर भोजन करते हैं। भारतवर्ष में उत्पन्न होने वाले फलों में आम के बाद केला ही है। सब प्रकार के केलों में बम्बई का लाल केला, कलकत्ते का चाटिम केला, चम्पक केला (पीला केला) प्रशंसा के योग्य हैं। पर्वती केला, काला केला, राजभोग, मानभोग, चीनिया आदि केले भी बढ़ियाँ गिने जाते हैं। अच्छी किस्म के फलों में बीज नहीं होते। इसकी दो जातियाँ (Species) होती हैं। उपर्युक्त म्यू० सेपिएण्टम् में फल छोटे होते हैं तथा कच्चे खाये जा सकते हैं तथा दूसरी म्यू० पॅराडिसिका (Musa paradisica) जाति में फल बड़े होते हैं किन्तु केवल पकने पर ही खाये जा सकते हैं। इसके जंगली वृक्ष बिहार तथा पूर्वी हिमालय में ४००० फीट तक पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—केले के पञ्चाङ्ग की राख में पोटैशियम होता है। कच्ची अवस्था में इसमें टैनिन होते हैं। पक्व फल में शर्करा, विटामिन 'सी', कुछ 'बी', खनिज द्रव्य एवं अन्य द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके पके फल बल्य, रक्तपित्त शामक, संग्राहक तथा जीवनीय हैं। इससे रक्त की मात्रा बढ़ती है, आन्त्र की क्रिया सुधरती है तथा रक्त की अम्लता कम होती है। इसको अतिसारादि में पथ्य के रूप में देते हैं। कच्चे केले का प्रयोग अन्य द्रव्यों के साथ मधुमेह में किया जाता है। इसके फूलों का रस दही के साथ अत्यार्तव में देते हैं। फूलों की सब्जी रक्तपित्त में तथा मधुमेह में देते हैं। काण्ड का रस अपस्मार, अपतन्त्रक आदि वातिक विकारों में देते हैं तथा यह तृषा शामक होता है। इसका शरबत खाँसी में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७१६ भावप्रकाशनिघण्टुः

अथ चिर्भिटम् (कचरिया, फूट)। तन्नामानि

पक्वापक्वतत्फलगुणाँश्चाह

चिर्भिटं धेनुदुग्धं च तथा गोरक्षकर्कटी ॥ ३६॥ चिर्भिटं मधुरं रूक्षं गुरु पित्तकफापहम् । अनुष्णं ग्राहि विष्टम्भि पक्वं तूष्णञ्च पित्तलम् ॥ ३७॥ कचरिया के संस्कृत नाम-चिर्भिट, धेनुदुग्ध तथा गोरक्षकर्कटी ये सब हैं। कचरिया-मधुर रसयुक्त, रूक्ष, गुरु, पित्त-कफहर, किंचित् उष्ण, ग्राही, विष्टम्भी (दस्त साफ न लाने वाली) होती है एवं पका फल-उष्ण तथा पित्तजनक होता है। [३६-३७]

८. फूट

हिं०-फूट, फूंट। बं०-फुटि । म०-फूट । ले०-Cucumis momordica Roxb. (क्युक्कुमिस् मोमोर्डिका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । फूट-प्रायः सब प्रान्तों की रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है और खेतों में इसको रोपण करते हैं। इसकी लता-होती है। पत्ते-गोलाकार, गहरे कटे किनारे वाले या प्रायः पांच भाग वाले तथा बारीक दन्तुर होते हैं। फूल-छोटे-छोटे होते हैं। फल-१ से २ फीट लम्बे, बेलनाकार, ३ से ६ इञ्च व्यास के, चिकने, कच्ची अवस्था में गहरे रंग के तथा पकने पर नीबू जैसे पीतवर्ण के होते हैं। इसके दो भेद होते हैं। एक वर्षा में होता है तथा दूसरा ग्रीष्म में। इसको कच्चा या पकाकर लोग खाते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज दाहप्रशमन माने जाते हैं।

अथ नारिकेलः (नारियल)। तन्नामानि तत्फलसाधारणगुणाँश्चाह

नारिकेलो दृढफलो लाङ्गली कूर्चशीर्षकः । तुङ्गः स्कन्धफलश्चैव तृणराजः सदाफलः ।। ३८ ।। नारिकेलफलं शीतं दुर्जरं वस्तिशोधनम् । विष्टम्भि बृंहणं बल्यं वातपित्तास्रदाहनुत् ।। ३९ ।। नारियल के संस्कृत नाम-नारिकेल, दृढफल, लाङ्गली, कूर्चशीर्षक, तुङ्ग, स्कन्धफल, तृणराज तथा सदाफल ये सब हैं। नारियल का फल-शीतल, दुर्जर (देर में हजम होने वाला), वस्तिशोधक, विष्टम्भक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), बलकारक एवम्-वात, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [३८-३९]

अथ कोमलजीर्णतत्फलयोर्गुणानाह

विशेषतः कोमलनारिकेलं निहन्ति पित्तज्वरपित्तदोषान् । तदेव जीर्णं गुरु पित्तकारि विदाहि विष्टम्भि मतं भिषग्भिः ।। ४० ।। नारियल का कोमल फल-विशेषतः पित्तज्वर तथा पित्तदोष को दूर करने वाला होता है। पुराना फल-गुरु, पित्तकारक, विदाही तथा विष्टम्भक होता है ऐसा वैद्यों का मत है। [४०]

अथ नारिकेलजलगुणानाह

तस्याम्भः शीतलं हृद्यं दीपनं शुक्रलं लघु । पिपासापित्तजित्स्वादु वस्तिशुद्धिकरं परम् ।। ४१ ।। नारियल का जल-स्वादिष्ट, शीतल, हृदय को हितकर, अग्निदीपक, शुक्रजनक, लघु, अत्यन्त बस्तिशोधक एवम् प्यास तथा पित्त को शान्त करने वाला होता है। [४१] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

आम्रादिफलवर्गः ७१७ अथ नारिकेलादीनां शिरोगुणानाह नारिकेलस्य तालस्य खर्जूरस्य शिरांसि तु। कषायस्निग्धमधुरबृंहणानि गुरूणि च।।४२।। नारियल, ताड़ तथा खजूर के शिर (मस्तक पर होने वाला मीठा गूदा) - कषाय तथा मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, गुरु एवम् बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) होते हैं। [४२] ९. नारियल हिं० - नारियल, नरियल, गरी, गिरी। बं० - नारिकेल, डाब। म० - (फल) नारली, नारल. (वृक्ष) माड़। गु० - नारि(अ)यल। ते० - टकाई। ता० - तेंगाई, तेन्ना। फा० - जोज हिन्दी नारीयल, नारगील। अ० - नारजिल्। अं० - Coconut (कोकोनट्)। ले० - Cocos nucifera Linn. (कोकस् न्यूसीफेरा)। Fam. Palmea (पामी)। नारियल - यह भारत के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों, विशेषकर समुद्र, नदी आदि के किनारे लगाया हुआ पाया जाता है। इसका वृक्ष-सीधा या कुछ टेढ़ा, ८० फीट या अधिक ऊँचा आधार की तरफ कुछ मोटा जहाँ से मूल निकलते हैं एवं क्वचित् शाखायुक्त होता है। पत्ते - ६ से १८ फीट लम्बे, पक्षवत् संयुक्त; पत्रक २ से ३ फीट लम्बे, क्रमशः नोकदार एवं कम चौड़े होते हैं। पुष्प - प्रत्येक पत्र के कोण से ४ से ६ फीट लम्बा, नारंग या तृण वर्ण का कोशावृत पुष्प व्यूह निकलता है जिसमें स्त्रीपुष्प नीचे की तरफ संख्या में कम, १ इञ्च लम्बे तथा गोल होते हैं और पुंपुष्प, अधिक, छोटे मधुर गन्ध वाले एवं अग्रभाग पर होते हैं। फल - अंडाकार, त्रिकोण युक्त, ६ से १२ इञ्च लम्बा तथा एक बीज युक्त होता है। फलमिति का बाह्यस्तर मोटा तथा रेशेदार होता है जो कठोर अन्तस्तर को घेरे रहता है। अन्तस्तर के अन्दर बीज रहता है। अन्तस्तर के एक सिरे पर ३ छिद्र रहते हैं जिनमें से किसी एक से बीजोद्भेद के समय अंकुर निकलता है। गरी के अन्दर अपक्व अवस्था में बहुत पानी रहता है किन्तु पक्वावस्था में यह कम हो जाता है। नारियल के अनेक प्रकार (Varieties) होते हैं जिनमें से कुछ के पेड़ छोटे तथा कुछ के ऊँचे रहते हैं। फलों का रंग, आकार तथा संख्या के अनुसार भी अनेक प्रकार पाये जाते हैं। इसके सभी अंगों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन - ताजी १०० ग्राम गरी में आर्द्रता ३६.३, प्रोटीन ४.५, तेल ४१.६, कर्बोज १३, रेशा ३.६, चूना .०१ तथा फास्फोरस .२४ ग्राम और लोह १.७ मि० ग्रा०, विटामिन 'सी' १ मि० ग्रा० 'बी₁', १५ एकक, अत्यल्प 'ए' तथा 'ई' .२ मि० ग्रा० एवं कुछ ताम्र भी रहता है। सूखे गरी में तेल ५७-७५% रहता है जो अन्य तैलों की अपेक्षा अधिक सुपाच्य होता है। इसे आसानी से चर्म सोख लेता है तथा इसमें जल भी पर्याप्त मिल पाता है इसलिए मलहम आदि बनाने में इसका उपयोग करते हैं। डाब (हरा नारियल) के जल में सोडियम् १०५, पोटैशियम ३१२, कैल्शियम २९, मॅग्नेशियम् ३०, लोह .१०, ताम्र .०४, फॉस्फोरस ३७, गंधक २४, क्लोरीन १८३, विटामिन 'सी' २.२-३.७, मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम में एवं विटामिन 'बी' अल्प रहता है। एक डाब में करीब १ औंस तक शर्करा रहती है। इसकी ताजी मीठी ताड़ी में शर्करा बहुत रहती है तथा १०० सी० सी० में विटामिन 'सी' १६-३० मि० ग्रा० रहता है। गुण और प्रयोग - नारियल मधुर, वृष्य, बृंहण, बल्य शीत एवं बस्तिशोधक है। (१) डाब का पानी शीत, मूत्रजनन, तृष्णा निग्रहण एवं ज्वरघ्न है। इसे ज्वर, सोजाक तथा हैजे में देते हैं। (२) इसका तेल केश्य एवं व्रणरोपक

७१८ भावप्रकाशनिघण्टुः होता है। क्षय में इसका उपयोग काडलिवर आईल की तरह करते हैं। (३) इसकी ताड़ी या उससे बना मद्य दाहशामक, मूत्रल, बल्य, सौमनस्यजनन, निद्राजनन, वाजीकरण एवं बृंहण होता है। (४) इसके पुष्प ग्राही होते हैं। (५) चिपटे कृमि के लिये एक नारियल की गरी खिलाते हैं किन्तु साथ में विरेचन देना आवश्यक है। (६) इसका मूल मूत्रल एवं कषाय है तथा अश्मरी, प्रमेह एवं अत्यार्तव में इसका क्वाथ देते हैं। (७) इसके कवच को जलाकर निकाला तेल चर्मरोगों में बाहर से प्रयुक्त होता है। (८) नारियल का दूध क्षय, दुर्बलता आदि में तथा शस्त्रक्रिया के पूर्व एवं पश्चात् पिलाते हैं जिससे 'शाक' एवं रक्तस्राव का भय नहीं रहता।

अथ कालिन्दम् (तरबूज)। तन्नामानि पक्वापक्वतत्फलगुणाँश्चाह

कालिन्दं कृष्णबीजं स्यात्कालिङ्गञ्च सुवर्तुलम्। कालिन्दं ग्राहि दृक्पित्त शुक्र हृच्छीतलं गुरु।। पक्वन्तु सोष्णं सक्षारं पित्तलं कफवातजित् ।।४३।। तरबूज के संस्कृत नाम-कालिन्द, कृष्णबीज, कालिङ्ग तथा सुवर्तुल ये सब हैं। तरबूज के कच्चे फल- ग्राही, शीतल, गुरु एवम्-दृष्टि की शक्ति, पित्त तथा शुक्र नष्ट करने वाले होते हैं। पके फल-उष्ण, क्षारायुक्त, पित्तजनक, एवम्-कफ तथा बात को दूर करने वाले होते हैं। [४३]

१०. तरबूज

हिं०-तरबूज, तरबूजा। बं०-तरमुज। म०-कलिंगड। गु०-तड़बूज। ता०-कोंमाट्टि। ते०-पुच्चकाया, तरबूजं। फा०-हिन्दबाना, हिन्ददानह। अ०-वतिख हिन्दी, जकी। अं०-Watermelon (वाटर मेलन्)। ले०- Citrullus vugaris Schrad (सिट्र्युलस् बल्गौरिस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरविटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। नदियों के किनारे, दियारे पर एवं रेतीली भूमि में अच्छा फल लगता है। इसकी खुरदरी लता-खेतों में पसरी हुई रहती है। पत्ते-इन्द्रायन के पत्तों के समान गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-एक इञ्च के घेरे में गोलाकार होते हैं। फल-बड़े-बड़े पेठे और कोहड़े के आकार वाले होते हैं। गूदी- लाल या सफेद होती है। बीज-चिपटे, लाल, भूरे या काले होते हैं। [११] रासायनिक संगठन-बीजों में २० से ४०% पीले रंग का तेल होता है। फल में काफी मात्रा में पेक्टिन तथा रस में सिट्र्यूलिन ०.१७% होता है। गुण और प्रयोग-बीज शीतल, मूत्रजनन तथा बल्य होते हैं। बीजों का तेल बादाम के तेल के स्थान में उपयोग में आता है। फल मूत्रल तथा शीतल होता है।

अथ खर्बूजम् (खर्बूजा)। तन्नामानि तत्फलगुणाँश्चाह

दशाङ्गुलं तु खर्बूजं कथ्यन्ते तद्गुणा अथ।।४४।। खर्बूजं मूत्रलं बल्यं कोष्ठशुद्धिकरं गुरु। स्निग्धं स्वादुतरं शीतं वृष्यं पित्तानिलापहम् ।।४५।। खर्बूजा के संस्कृत नाम-दशाङ्गुल और खर्बूजा ये हैं। खर्बूजा के फल-अत्यन्त स्वादिष्ट, मूत्रजनक, बलकारक, कोष्ठशुद्धि करनेवाले, गुरु, स्निग्ध, शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम्-पित्त तथा वायु को दूर करने वाले होते हैं। इनमें जो अम्ल, मधुर एवम् क्षार रसयुक्त होते हैं वे रक्तपित्त तथा मूत्रकृच्छ्र को अत्यन्त करने वाले होते हैं। [४४-४५] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

आम्रादिफलवर्गः ७९९ ११. खरबूजा हिं०-खरबूज, खरबूजा, खर्बूजा, चिबुड। बं०-खरमुज। म०-खरबूज। गु०-तलिया शकर तेटी, तलियाभीमड़ा। ते०-खरबूज। क०-षड्भुजा। फा०-खरपुजह, खरपुजा। अ०-वितिख, खर्पुजह, खरपुजाह। अं०-Melon (मेलन)। ले०-Cucumis melo Linn. (क्युम्युमिस् मेलो)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह रोपण किया जाता है। उत्तर पश्चिमी उष्ण तथा शुष्क प्रदेशों में अधिक रोपण किया जाता है। नदियों के किनारे रेतीली भूमि में यह अधिक उत्पन्न होता है। इसकी लता-भूमि पर पसरी हुई रहती है। पत्ते-रोमश, गोलाकार एवं उनमें कहीं-कहीं नोकसा निकला रहता है। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-गोलाकार कुछ चिपटे रहते हैं। पकने पर वे किञ्चित् हरापन युक्त पीले रंग के या सफेदी मायल हो जाते हैं। उनके चारों ओर रेखायें रहती हैं जो नीले रंग की होती हैं। गूदी के भीतर बीजों के समूह का लसीला गोला रहता है। बीज-लम्बाई युक्त चिपटे होते हैं। बीजों का चिकित्सा में प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में तेल होता है। फल में खटिक, ताम्र, फॉस्फोरस, लोह तथा विटामिन 'ए', 'बी₁', 'बी₂' तथा 'सी' आदि द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग-बीज शीतल, मूत्रजनन एवं बल्य हैं; फल शीतल हैं तथा पुराने एक्जीमा के लिए लाभदायक माने जाते हैं। मूत्रकृच्छ्र में बीज देते हैं। अथ त्रपुसम् (खीरा, बालमखीरा)। तस्य नामानि पक्वापक्वतत्फलतद्बीजगुणांश्चाह त्रपुसं कण्टकिफलं सुधावासः सुशीतलम्। त्रपुसं लघु नीलञ्च नवं तृट्क्लमदाहजित् ।।४६।। स्वादु पित्तापहं शीतं रक्तपित्तहरं परम्। तत्पक्वमम्लमुष्णं स्यात्पित्तलं कफवातनुत्।। तद्बीजं मूत्रलं शीतं रूक्षं पित्तास्रकृच्छ्रजित् ।।४८।। खीरा के संस्कृत नाम-त्रपुस, कण्टकिफल, सुधावास तथा सुशीतल ये सब हैं। खीरे के छोटे, नीले तथा नवीन फल-स्वादिष्ट, शीतल एवम्-प्यास, क्लान्ति, दाह तथा पित्त को दूर करनेवाले होते हैं और रक्तपित्त को तो अत्यन्त नष्ट करनेवाले होते हैं। खीरे के पके फल-अम्लरसयुक्त, उष्ण, पित्तजनक एवम्-कफ तथा वात को नष्ट करनेवाले होते हैं। खीरे के बीज-मूत्रजनक, शीतल, रूक्ष एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करनेवाले होते हैं। [४७-४८] १२. खीरा हिं०-खीरा, बालमखीरा। बं०-क्षीरा, शशा। म०-तौसे। क०-तसेयकायि। गु०-तांसली। ते०- दोसकाई। ता०-मुल्लुवेल्लेरी। फा०-शियार खुर्द, खयार, बावरंग। अ०-कंशद। अं०-Cucumber (क्युकुम्बर)। ले०-Cucumis sativus Linn. (क्युम्युमिस सटाइवस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसकी बेल-खेतों में फैली हुई रहती है। पत्ते-५-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार और पाँच कोण वाले होते हैं। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-६ से १२ इञ्च तक लम्बे होते हैं और उनमें ककड़ी के समान बीज होते हैं। एक बड़ी जाति का खीरा होता है जिसको बालम खीरा कहते हैं। इसकी लम्बाई अधिक होती है। इसका एक प्रकार 'मुंडोसा' मद्रास की तरफ अधिक प्रचलित है जिसके फलों पर छोटे काँटे होते हैं।

७२० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसके फलों में खटिक, फास्फोरस, लौह, विटामिन सी तथा विटामिन बी₁ पाया जाता है। बीजों में तैल होता है। बीजों की राख में फॉस्फेट अधिक (P₂ O₅, 0.62%) रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह शोथहर है। शोथ पर, इसको काटकर उसमें नमक डालकर बांधने से सूजन कम होती है तथा पूय एक स्थान पर इकट्ठा हो जाता है। बीज का उपयोग बस्तिशूल में करते हैं। अथ गुवाकः (सुपारी) । तन्नामानि तत्फलनामगुणाँश्चाह घोरण्टः पूगी पूगश्च गुवाकः क्रमुकोऽस्य तु। फलं पूगीफलं प्रोक्तमुद्वेगं च तदीरितम् ।।४९।। पूगं गुरु हिमं रूक्षं कषायं कफपित्तजित्। मोहनं दीपनं रुच्यमास्यवैरस्यनाशनम् ।।५०।। सुपारी के संस्कृत नाम-घोरण्ट, पूगी, पूग, गुवाक तथा क्रमुक ये सब हैं। इसके फल के संस्कृत नाम-पूगीफल तथा उद्वेग हैं। सुपारी-कषाय रसयुक्त, गुरु, शीतल, रूक्ष, मोहजनक, अग्निदीपक, रोचक एवम्-कफ, पित्त तथा मुख की विरसता को दूर करने वाली होती है। [४९-५०] अथार्द्रस्विन्नतफलगुणानाह आर्द्रं तद् गुर्वभिष्यन्दि वह्निदृष्टिहरं स्मृतम्। स्विन्नं दोषत्रयच्छेदि दृढमध्यं तदुत्तमम् ।।५१।। कच्ची सुपारी-गुरु, अभिष्यन्दी, एवम्-जठराग्नि तथा दृष्टि को मन्द करनेवाली होती है। स्विन्न (चिकनी) सुपारी-त्रिदोषनाशक होती है तथा जिसका मध्यभाग दृढ़ हो, वह सुपारी उत्तम होती है। [५१] १३. सुपारी हिं०-सुपारी, सोपारी, सुपाड़ी, कसेली। बं०-शुपारी, सुपारी। म०-सुपारी, पोफल (फल)। गु०-सोपारी। ता०-कमुगु। क०-कडि, अडिके। ते०-पोका। फा०-पोपिल। अ०-फोफिल। अं०-Betel Nut Palm (बेटल् नट् पाम)। ले०-Areca catechu Linn. (ऐरेका कॅटेचू)। Fam. Palmae (पामी)। सुपारी एक बहुत प्रसिद्ध वस्तु है जो प्रतिदिन के व्यवहार में पान के साथ या अकेली खाने के काम आती है। इसके वृक्ष-बंगाल, आसाम, सिलहट, मैसूर, कनारा, मलावार तथा दक्षिण हिन्दुस्तान के कई प्रान्तों में तटीय प्रदेशों में लगाये हुये पाये जाते हैं। यह वृक्ष-ताड़ और नारियल के समान ऊँचा (४०-६० फीट) पर बाँस के समान पतला होता है। पत्ते-बड़े- बड़े, पक्षवत्, नारियल के पत्तों के समान ४ से ६ फीट लम्बे, जिनमें ऊपर के उपपक्ष (Pinnae) मिले हुये तथा वन्त का नीचे का भाग चौड़ा तथा फैला हुआ होता है। फूल-पत्रकोशावृत्त गुच्छ में, जिनमें पुंपुष्प छोटे, अधिक तथा स्त्रीपुष्प बड़े रहते हैं। फल-अंडाकार, १ १/२-२" चौड़ा तथा २-२ १/२" लम्बा एवं पकने पर चमकीले नारंगी रंग का होता है जिसके अन्दर सुपारी (बीज) रहती है। सुपारी आकार, नाप तथा स्वाद आदि के अनुसार अनेक प्रकार की होती है। परन्तु एक साधारण सुपारी (धूसर भूरे रंग की) और दूसरी (लाल सुपारी) दक्षिणी सुपारी ये ही दो प्रसिद्ध हैं। इनमें से दूसरी उबाल कर बनाते हैं। पकने से कुछ पूर्व सुपारी को निकाल कर जल तथा पूर्व वर्ष के तैयार 'घन' (छोगारू) में उबालते हैं। नया क्वाथ बनाना हो तो जामुन, लाल चंदन, पीपल इत्यादि की छाल से बनाते हैं। इससे स्वाद, टिकाऊपन तथा रंग अच्छा हो जाता है तथा इसके दोष दूर हो जाते हैं। बालू में भूनकर खाने से भी दोष दूर हो जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

आम्रादिफलवर्गः ७२१ रासायनिक संगठन-साधारण सुपारी में टैनिन २१ से ३०% किन्तु चिकनी सुपारी में ९ से १५% रहता है। इसमें खटिक फॉस्फोरस, लौह तथा अनेक क्षाराभ जिनमें से मुख्य ॲरेकोलिन (Arecoline, C₆ H₁₁ O₂ N, 0.1%) है, पाये जाते हैं। यह क्षाराभ वात नाड़ी संस्थान के लिये विषैला है जिससे आक्षेप तथा अंगघात होता है। इसकी क्रिया पाइलोकार्पिन (Pilocarpine) की तरह होती है। इसके लवण के इन्जेक्शन घोड़ों के पेट फूलकर पीड़ा होने में देते हैं जिससे विरेचन होता है। जानवरों के चिपटे कृमि में भी इसे देते हैं। मनुष्यों में इसका उपयोग नहीं करते हैं। इसमें एक लाल रंग पाया जाता है जो क्षारीय खौलते जल में घुलता है तथा अम्ल से प्रक्षेपित हो जाता है। छोगारू का कत्थे जैसा उपयोग भी किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीत रूक्ष, कषाय, मुखशुद्धिकर, वृष्य एवं कृमिघ्न होती है। ताजी मादक एवं कभी- कभी चक्कर लाने वाली होती है। इसे वातनाड़ियों के लिये बल्य तथा आर्तवप्रवर्तक भी मानते हैं। इसको चबाने से कुछ उत्तेजना आती है तथा मन प्रसन्न होता है। इसका उपयोग अतिसार, कृमि तथा मूत्रविकार आदि में करते हैं। इसको जलाकर मंजन भी बनाते हैं। (१) चिपटे कृमि के लिये एक कच्ची सुपारी दूध में पीस कर पिलाते हैं। (२) रक्तमिश्रित आँव में १/४-१/२ सुपारी का चूर्ण दिया जाता है। विष प्रभाव-अधिक मात्रा में यह विषैली होने के कारण केवल जानवरों के कृमि में ही इसका उपयोग अब किया जाता है। हमेशा चबाने से कैन्सर होने की सम्भावना व्यक्त की गई है। अथ तालः (ताड़)। तन्नामानि तत्पक्वफलमज्जगुणाँश्चाह तालस्तु लेख्यपत्रः स्यात्तृणराजो महोन्नतः ॥५२॥ पक्वं तालफलं पित्तरक्तश्लेष्मविवर्द्धनम्। दुर्जरं बहुमूत्रञ्च तन्द्राऽभिष्यन्दशुक्रदम् ॥५३॥ तालमज्जा तु तरुणः किञ्चिन्मदकरो लघुः। श्लेष्मलो वातपित्तघ्नः सस्नेहो मधुरः सरः ॥५४॥ ताड़ के संस्कृत नाम-ताल, लेख्यपत्र, तृणराज तथा महोन्नत ये सब हैं। पका ताड़ का फल-पित्त, रक्त तथा कफ की वृद्धि करनेवाला, देर में हजम होनेवाला, मूत्र की अत्यन्त प्रवृत्ति करने वाला एवम्-तन्द्रा, अभिष्यन्द तथा शुक्र को उत्पन्न करनेवाला होता है। ताड़ की मींगी जो कि खूब तैयार हो गई हो वह किञ्चित् मदकारक, लघु, कफजनक, स्नेहयुक्त, मधुर, सारक एवं-वात तथा पित्त का नाशक होती है। [५२-५४] अथ तालरसः (ताड़ी)। नवीनस्य प्राचीनस्य च नामानि गुणाँश्चाह तालजं तरुणं तोयमतीव मदकृन्मतम्। अम्लीभूतं तदा तु स्यात्पित्तकृद्वातदोषहृत् ॥५५॥ ताड़ का ताजाजल (ताड़ी)-अत्यन्त मदकारक होता है। यदि वही पुराना होने से खट्टा हो गया हो तो पित्तकारक एवं-वात दोष को दूर करने वाला होता है। [५५] ९४. ताड़ हिं०-ताड़, ताल, तार। बं०-ताल। म०-ताड़। ता०-पनै मरम। क०-तालिमारा। ते०-ताति। गु०- तड़। फा०-ताल। अ०-तार। अं०-The Palmyra Palm (दी पामीरा पाम्)। ले०-Borassus flabellifer Linn. (बोरेसस् फ्लेबेलिफेर)। Fam. Palmae (पामी)। यह प्रायः सभी स्थानों पर विशेषकर शुष्क प्रदेशों में, पेनिनसुला के तटीय प्रदेशों, बंगाल तथा बिहार में होता है। ४९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

७२२ भावप्रकाशनिघण्टुः ताड़ का वृक्ष- १०० फीट तक ऊँचा होता है और उसके स्तम्भ की गोलाई ३ १/२-७ फीट तक होती है। स्तम्भ के सिरे पर ३ से ५ फीट के घेरे में ३०-४० पत्ते एक साथ सटे हुये गोलाकार और कटे हुए किनारेदार होते हैं। पत्रदंड- ३ से ४ फीट का होता है। यह पुरुष और स्त्री जाति के भेद से दो प्रकार का होता है। स्त्री जाति पर नारियल के फल के समान फल लगते हैं और पुरुष जाति पर बाल आते हैं। पुंपुष्पव्यूह का गलती से गजपिप्पली के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। फल बड़े तथा रेशेदार होते हैं जिनके भीतर तीन खण्ड होते हैं जिनमें से प्रत्येक में बीज होता है इसके पुष्पित अक्ष को चीरा लगाने से रस प्राप्त होता है जिसे ताजे अवस्था में नीरा तथा बाद में ताड़ी कहते हैं इसको पकाकर गुड़ तथा मिश्री प्राप्त की जाती है। रासायनिक संगठन- नीरा में शर्करा तथा यीस्ट (Yeast) रहता है। यीस्ट से विटामिन बी प्राप्त होता है। पुंजाति से प्राप्त नीरा में शर्करा कुछ अधिक होती है। नीरा को रखने से स्वतः संधान प्रारम्भ हो जाता है तथा ६ से ८ घंटे के अन्दर इसमें ३% तक मद्यसार एवं ०.१% अम्ल तैयार हो जाता है। बाद में मद्यसार की मात्रा ५% तक बढ़ कर रुक जाती है। तत्पश्चात् अम्ल की वृद्धि होकर सिरका बन जाता है। गुण और प्रयोग-इसका फल मधुर, शीत, बल्य, बृंहण तथा पित्तहर है। बीज मूत्रल तथा वातपित्तशामक है। इसके नूतन पुष्पित भाग की राख अम्लतानाशक एवं विषमज्वरहर होती है। इसका उपयोग अम्लपित्त में तथा विषमज्वर में विशेषकर यकृत प्लीहावृद्धि होने पर करते हैं तथा चावल का मांड के साथ लेप भी करते हैं। इससे त्वचा लाल होकर फोड़े आते हैं। जीरा उत्तेजक, कफनाशक एवं मूत्रल होती है तथा इसे आल्हाद कारक पेय के रूप में पीते हैं। तालमिश्री कास, वक्ष के विकार तथा बालकों के लिये सारक रूप में प्रयोग में आती है। अथ बिल्वः (बेल) । तन्नामानि तद्बालफलनामगुणाँश्चाह बिल्वः शाण्डिल्यशैलूषौ मालूरश्रीफलावपि। बालं बिल्वफलं बिल्वकर्कटी बिल्वपेशिका ।। ग्राहिणी कफवातामशूलघ्नी बिल्वपेशिका ।।५६।। बेल के संस्कृत नाम-बिल्व, शाण्डिल्य, शैलूष, मालूर तथा ओफल ये सब हैं। बेल के कच्चे फल के संस्कृत नामा—बालबिल्वफल, बिल्वकर्कटी तथा बिल्वपेशिका ये सब हैं। बेल के कच्चे फल-ग्राही एवम् कफ, वात, आम तथा शूल को नष्ट करने वाले होते हैं। [५६] अन्यच्च बालं बिल्वफलं ग्राहि दीपनं पाचनं कटु । कषायोष्णं लघु स्निग्धं तिक्तं वातकफापहम् ।।५७।। ग्रन्थान्तर में कहे हुये कच्चे बेल के फल के गुण-यह ग्राही, अग्निदीपक, पाचक, कटु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण, लघु, स्निग्ध एवम् वात तथा कफ को दूर करने वाले होते हैं। [५७] अथ पक्वफलगुणानाह पक्वं गुरु त्रिदोषं स्याद् दुर्जरं पूतिमारुतम्। विदाहि विष्टम्भकरं मधुरं वह्निमान्द्यकृत् ।।५८।। बेल का पका फल-मधुर रसयुक्त, गुरु, त्रिदोषजनक, देर में हजम होने वाला, दुर्गन्धयुक्त अधोवायु को करने वाला, विदाही, विष्टम्भ तथा अग्निमान्द्यता को उत्पन्न करने वाला होता है। [५८] अथ पक्वापेक्षया बालस्य बिल्वफलस्य गुणाधिक्यमाह फलेषु परिपक्वं यद् गुणवत्तदुदाहृतम् ।।५९।। बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्धि गुणाधिकम्। द्राक्षाबिल्वशिवाऽऽदीनां फलं शुष्कं गुणाधिकम् ।।६०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

आम्रादिफलवर्गः ७२३ पके फल की अपेक्षा बेल के कच्चे फल के गुणाधिक्य का वर्णन—सामान्य रूप से फलों में पका फल ही अधिक गुणकारी कहा गया है किन्तु यह नियम बेल के फल के लिये नहीं है ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि बेल का कच्चा फल ही विशेष गुणकारी होता है । एवम्-द्राक्षा (दाख), बेल तथा हरड़ आदि के फल यदि सूखे हों तो अधिक गुणकारी होते हैं। [५९-६०] १५. बेल का फल नोट—बेल के सम्बन्ध में अन्य वर्णन गुडूच्यादिवर्ग में पृ० २७४-२७६ किया जा चुका है। अथ कपित्थः (कैथ) । तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह कपित्थस्तु दधित्थः स्यात्तथा पुष्पफलः स्मृतः । कपिप्रियो दधिफलस्तथा दन्तशठोऽपि च ।। ६१ ।। कपित्थमामं संग्राहि कषायं लघु लेखनम् । पक्वं गुरु तृषाहिक्काशमनं वातपित्तजित् ।। स्वादम्लं तुवरं कण्ठशोधनं ग्राहि दुर्जरम् ।। ६२ ।। कैथ के संस्कृत नाम—कपित्थ, दधित्थ, पुष्पफल, कपिप्रिय, दधिफल तथा दन्तशठ ये सब हैं। कैथ का कच्चा फल—कषाय रसयुक्त, संग्राही, लघु तथा लेखन होता है। पका फल—अम्ल तथा कषाय रसयुक्त, गुरु, कण्ठ को साफ करने वाला, ग्राही, देर में हजम होने वाला एवम्—प्यास तथा हिक्का को शमन करने वाला और वात तथा पित्त को दूर करने वाला होता है। [६१-६२] १६. कैंथ हिं०—कै(कें)थ, कैथा, कैंत, कईंत । बं०—कयेद्, कयेत् बेल । म०—कंवठ । गु०—कोठ । क०—वेललु । ते०—वेलग । ता०—बलामरं । अं०—Wood Apple (उड अॅपल), Elephant Apple (एलिफेण्ट अॅपल) । ले०—Feronia elephantum Correa (फेरोनिया एलिफॅन्टम्) । Fam. Rutaceae (रूटेसी) । यह इस देश के प्रायः सूखे प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होता है तथा दक्षिण में वन्य अवस्थाओं में पाया जाता है । इसका वृक्ष—बहुत बड़ा होता है और उस पर सीधे काँटे होते हैं । वृक्ष से बबूर के गोंद के समान एक प्रकार का गोंद निकलता है । पत्ते—संयुक्त, सदलपर्ण, ३ से ४ इञ्च लम्बे होते हैं । पत्रक-अंडाकार या अभिअंडाकार, छोटे-छोटे, एक-एक सींक पर तीन-तीन अथवा ५ या ७-७ रहते हैं । फूल—फीके लाल रंग के होते हैं । फल—२-३ इञ्च के घेरे में गोल होते हैं और छिलका कठोर होता है । भीतर सुगंधित, स्वादु, खाने लायक गूदी होती है और गूदी में छोटे- छोटे अनेक चिपटे बीज होते हैं । इसमें एक आश्चर्यजनक गुण यह है कि यदि हाथी कैंत के फल को खाजावे तो इसका गूदा हाथी के पेट में रह जाता है और गूदा रहित अखंडित फल मल के साथ बाहर निकल आता है । इसके दो भेद होते हैं । एक में फल छोटे तथा अम्ल होते हैं । तथा दूसरे में फल बड़े तथा मीठे होते हैं । पक्व फल को चीनी के साथ या शरबत बनाकर या चटनी के रूप में खाया जाता है । इसकी जेली भी बनाई जाती है । इसके पत्र, गोंद तथा फल का उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन—फल में खनिज तव विशेषकर खटिक, फॉस्फोरस तथा लोह अधिक होते हैं । इसके अतिरिक्त राइबोफ्लेविन (Riboflavine) तथा विटामिन 'सी' एवं पेक्टिन (Pectin 3 to 5%) होता है । इसके पत्तों में उड़नशील तैल ०.७३% होता है जिसमें मुख्य भाग एस्ट्रेंगॉल (Estragol, C₁₀ H₁₂ O) का होता है । गुण और प्रयोग—इसका फल—गुणों में बेल की तरह होता है । यह विशेष रूप से रक्तपित्तशामक होता है । पत्ते वातानुलोमक होते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

७२४ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) इसका फल रक्तपित्त, अतिसार तथा प्रवाहिका में दिया जाता है। इसके गोंद से उदर की मरोड़ कम होती है। (२) बच्चों के अजीर्ण में पत्तों का उपयोग करते हैं। अथ नारङ्गः (नारङ्गी)। तन्नामानि मधुराम्लनारङ्गयोर्गुणांश्चाह नारङ्गो नागरङ्गः स्यात्त्वक्सुगन्धो मुखप्रियः ।। ६३ ।। नारङ्गो मधुराम्लः स्याद्रोचनो वातनाशनः। अपरं त्वम्लमत्युष्णं दुर्जरं वातहृत् सरम् ।। ६४ ।। नारङ्गी के संस्कृत नाम—नारङ्ग, नागरङ्ग, त्वक्सुगन्ध तथा मुखप्रिय ये सब हैं। नारङ्गी—मधुर तथा अम्लरसयुक्त, रोचक एवम् वातनाशक होती है और दूसरी जाति की नारङ्गी अम्लरसयुक्त, अत्यन्त उष्ण, देर में हजम होने वाली, सारक तथा वातनाशक होती है। [६३-६४] १७. नारङ्गी हिं०—नारङ्गी, संतरा, संत्रा। बं०—कमलानेबु। म०—नारिंग, संत्रा गु०—नारङ्गी। फा०—किस्मे अज नारंज, नारंज। अ०—नारंज। अं०—Orange (ऑरेंज)। ले०—Citrus reticulata Blanco (साइट्रस रेटिक्युलेटा)। Fam. Rutaceae (रूटेंसी)। यह सब प्रान्तों की वाटिकाओं में रोपण किया जाता है। आसाम, सिक्किम, मध्य भारत, पंजाब तथा कुर्ग में इसकी अधिक खेती की जाती है। इसका वृक्ष—छोटा होता है। पत्ते—चिकने ४-५ इञ्च लम्बे नींबू के पत्ते के आकार वाले होते हैं। पर्णवृन्त करीब- करीब पक्षहीन होता है। फूल—सफेद रंग के आते हैं और उनसे सुगन्ध आती है। फल—२ इञ्च के घेरे में गोलाकार और दोनों ओर दबे हुए होते हैं, पकने पर वे नारङ्गी रंग के हो जाते हैं। इसकी एक अन्य जाति होती है जिसमें फल बहुत खट्टा होता है उसे सा० ऑरेंन्शिअम् लिन. (C. aurantium Linn.) कहते हैं। इसका चिकित्सा की दृष्टि से यह महत्त्व है कि इसमें विटामिन ‘ए’ का पूर्वरूप एवं विटामिन बी बहुत होता है तथा इसके छिलके कुछ दीपन एवं सुगंधि के लिये काम में आते हैं। संतरे के स्थान, स्वरूप आदि भेद से अनेक भेद पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—छिलके में एक तेल होता है जिसमें लिमोनेन (Limonene) बहुत होता है। इसकी शाखा तथा पत्तों से पेटिट्ग्रेन आईल (Petitgrain oil) प्राप्त किया जाता है। फल में विटामिन ‘सी’, ‘बी’, ‘ए’ एवं खनिज द्रव्य, शर्करा, अम्ल द्रव्य एवं पेक्टिन आदि द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग—इसका रस ज्वरहर, तृषाशामक, दुर्जर, हृद्य, रुचिकारक एवं वातघ्न है। अथ तिन्दुकः (तेंन्दू)। तन्नामानि पक्वापक्वतत्फलगुणांश्चाह तिन्दुकः स्फूर्जकः कालस्कन्धश्चासितकारकः। स्यादामं तिन्दुकं ग्राहि वातलं शीतलं लघु ।। पक्वं पित्तप्रमेहास्रश्लेष्मघ्नं मधुरं गुरु ।। ६५ ।। तेंदू के संस्कृत नाम—तिन्दुक, स्फूर्जक, कालस्कन्ध तथा असितकारक ये सब हैं। तेंदू का कच्चा फल—ग्राही, वातजनक, शीतल एवम् लघु होता है। पकाफल—मधुर रसयुक्त, गुरु एवम्—पित्त, प्रमेह, रक्तविकार तथा कफ का नाशक होता है।

आम्रादिफलवर्गः ७२५ १८. तेंदू हिं०-तेंदू, गाव, गाभ। बं०-गाव। म०-टेंबुरणी। गु०-टींबरू। ते०-तुमिवि। ता०-तुम्बिक। अं०- Gaub Persimon (गाँब पर्सिमॉन)। ले०-Diospyros embryopteris Pers. (डायोस्पाइरॉस एम्ब्रीओप्टेरिस)। Fam. Ebenaceae (एबेनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। विशेष कर बंगाल में अधिक होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का, शाखा-प्रशाखा करके सघन और बारहोमास हरा-भरा रहता है। छाल-भूरे रंग की होती है। पत्ते-२ इञ्च चौड़े, ५-९ इञ्च तक लम्बे, किंचित् अण्डाकार, आयताकार, चिकने, चर्मसदृश और चमकीले होते हैं। फूल-सफेद, पत्रदण्ड के पास झुमकों में आते हैं। फल-२-३ इञ्च के घेरे में गोलाकार और पकने पर कुछ पीले रंग के हो जाते हैं। ये रक्तकट्टावरण से ढके रहते हैं। इसके भीतर लसीली गूदी होती है। मल्लाह लोग सन के साथ इसकी गूदी को मिला कर नाव के छेदों को बन्द करते हैं। बीज-४ से ८ रहते हैं। इसको बंदर बहुत खाते हैं। इस आधा पर इसे 'मर्कटतिन्दुक' एवं इसकी अन्य जाति डॉ० मेलॅनोक्जाइलोन (D. melanoxylon, Roxb.) को तिन्दुक श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने माना है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में तेल होता है। छाल तथा फल में टैनिन होता है। फलों में पेक्टिन बहुत होता है। इसके ईथरीय सत्त्व में, ईस्चेरिचिया कोलाई (Escherichia coli) जीवाणुनाशक शक्ति होती है। गुण और प्रयोग-इसकी गुदी अच्छी संग्राहक होती है। इसको जीर्ण अतिसार तथा प्रवाहिका में देते हैं। बीजों का तेल भी अतिसारादि में दिया जाता है। विषम ज्वर में छाल देते हैं। मुखपाक में फल के फांट से कुल्ला कराते हैं तथा व्रण एवं क्षत पर स्वरस लगाते हैं। मात्रा-शुष्क गुद्दी १ से ५ रत्ती। अथ कुपीलुः । यस्य फलं कुचिला इति लोके 'मकरतेंदुआ' इति च। तन्नामानि तत्फलगुणाँश्चाह तिन्दुको यस्तु कथितो जलदो दीर्घपत्रकः ।। ६६ ।। कुपीलुः कुलकः काकतिन्दुकः काकपीलुकः । काकेन्दुर्व्विषतिन्दुश्च तथा मर्कटतिन्दुकः ।। ६७ ।। कुपीलुः शीतलं तिक्तं वातलं मदकृल्लघु । परं व्यथाहरं ग्राहि कफपित्तास्रनाशनम् ।। ६८ ।। कुपीलु (जिसके फल को लोक में 'कुचिला' कहते हैं तथा जो 'मकरतेंदुआ' भी कहलाता है) के संस्कृत नाम- तिन्दुक, जलद, दीर्घपत्रक, कुपीलु, कुलक, काकतिन्दुक, काकपीलुक, काकेन्दु, विषतिन्दु तथा मर्कटतिन्दुक ये सब हैं। कुचिला-तिक्तरसयुक्त, शीतल, वातजनक, मदकारक, लघु, अत्यन्त व्यथा को दूर करने वाला, ग्राही एवं- कफ, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [६६-६८] १९. कुचला हिं०-कुचला, कुचिला। बं०-कुँचिला। म०-काजरा। गु०-झेर कोंचला। क०-कंजि, हेमुष्टि, कासर। ते०-मुसिडे। ता०-एट्टेमारं, काकोठीं। फा०-कुचूला, फुलूसंमाही, इजराकी। अ०-हब्बुलगुराब, अजराकि, खानेकऊल् केल्ला। अं०-Poison-nut tree (पॉइजन नट ट्री); Nux-vomica tree (नक्स-वोमिका ट्री)। ले०-Strychnos nux-vomica Linn. (स्ट्रिक्नॉंस नक्स वोमिका)। Loganiaceae (लोगेनिएसी)।

७२६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह गोरखपुर, बिहार, उड़ीसा तथा विशेष रूप से दक्षिण में पाया जाता है। इसका वृक्ष-बड़ा होता है एवं किसी-किसी में काँटे भी होते हैं। स्तम्भ-मोटा और सीधा रहता है। पत्ते- ३ से ६ इञ्च तक लम्बे, १ ३/४-३ इञ्च चौड़े, दीर्घवृत्ताकार, चिकने चमकीले तथा ५ शिराओं से युक्त जिनमें पार्श्व की शिराएँ अस्पष्ट रहती हैं। फूल-छोटे-छोटे हरापन युक्त सफेद आते हैं। फूला हुआ वृक्ष बहुत सुहावना दिखाई पड़ता है। फल-गोल, चिकने, नारङ्गी के बराबर १ से ३ इञ्च व्यास में और उसी रंग में आते हैं। इसके भीतर एक प्रकार का कड़वा सफेदकोमल पदार्थ (गूदी) भरा रहता है जिसमें अनेक बीज रहते हैं। बीज-३/४ इञ्च के घेरे में, चिपटे, गोल, एक तरफ से उन्नतोदर तथा दूसरी तरफ से नतोदर और चमकीले सफेद मखमली रेशों से भरे रहते हैं। इसके बीज, छाल, पत्ते, काष्ठ आदि का उपयोग किया जाता है। बीजों का ही अधिक उपयोग होता है। शोधन-बीजों को शोधन करके व्यवहार करना चाहिये। सात दिन गोमूत्र में रखकर छिलके निकाल कर, गोदुग्ध में उबाले। फिर गाय के घी में भून कर चूर्ण बना प्रयोग करें। रासायनिक संगठन-इसके समस्त भागों में प्रधान रूप से स्ट्रिकनीन् Strychnine) तथा ब्रूसीन (Brucine) एवं अल्प अन्य क्षाराभ पाये जाते हैं। छाल में ब्रूसीन ही अधिक होता है। बीज में १.५३-३.४२% क्षाराभ होता है जिसमें करीब आधा स्ट्रिकनीन होता है। बीजों में एक ग्लूकोसाइड, लोगैनिन् (Loganin) एवं अत्यल्प ताम्र पाया जाता है। अन्य जाति के बीजों की मिलावट से इसके क्षाराभों की मात्रा में कमी हो जाती है अन्यथा बीजों को रखने से इसमें परिवर्तन नहीं होता। गुण और प्रयोग-यह कटु, तिक्त, उष्ण, दीपन, पाचन, उत्तेजक, बल्य एवं बाजीकर है। इसका उपयोग, पाचन के विकार, वातरोग तथा हृदय की दुर्बलता में किया जाता है। यह केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान, विशेष कर सुषुम्ना तथा प्रेरक केन्द्रों को उत्तेजित करता है। (१) इसका चूर्ण देने से भूख बढ़ती है तथा पाचक रसों की वृद्धि होती है। इसके टिंचर से आंत्र की गति बढ़ती है इसलिये इसे जीर्ण विबंध में अन्य मृदुविरेचन औषधियों के साथ देते हैं। कुपचन, शूल आदि विकारों में इससे लाभ होता है। (२) वातिक संस्थान के लिए उत्तेजक होने के कारण अनेक वातविकारों जैसे अर्दित, अर्धांग, गतिभ्रंश, ज्ञानभ्रंश, पेशीशोष, कंप, नाड़ीशूल, बाधिर्य, घटसर्प से उत्पन्न या अधिक बोलने से उत्पन्न आवाज न निकलना एवं तंबाकू के अधिक सेवन से उत्पन्न आन्ध्य आदि में इससे लाभ होता है। (३) बच्चों के शय्यामूत्र, हस्तमैथुन या अतिमैथुन से उत्पन्न नपुंसकता में इसे देते हैं। वार्धक्य में बाजीकरण के लिये कुचला, लोह तथा काली मिरिच देते हैं। (४) हृदय तथा श्वसन-संस्थान की दुर्बलता में इसके देने से उन-उन अंगों को बल मिलता है। इसके साथ अन्य औषधियों को देना पड़ता है। (५) इसके जड़ की छाल को नींबू के रस में घोंटकर बनाई गोली विसूचिका में दी जाती है। कृमियुक्त व्रण में पत्तों का पुल्टिस लगाया जाता है। गाय को पत्ते खिलाने से दूध में कडुवाहट आती है तथा वह अधिक सुपाच्य या पाच्य माना जाता है। कुछ पक्षी, जानवर इसके फल को खाते हैं। जानवरों को मारने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। विषलक्षण एवं चिकित्सा-इसको अधिक मात्रा में देने से मृत्यु हो सकती है इसलिये इसका प्रयोग सावधानी से करना चाहिये। प्रारम्भ में इससे बेचैनी, घबड़ाहट, प्रतिवर्तों (Reflex) का बढ़ना, पेशीस्फुरण, गले एवं चलने में भारीपन एवं एकाएक किसी अंग में विक्षेप आदि लक्षण होते हैं। ये लक्षण १५ से २० मिनट में प्रारम्भ होते हैं। कभी- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA