भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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कागजी नींबू के संस्कृत नाम—निम्बू (यह स्त्रीलिङ्गी है), निम्बुक (यह नपुंसकलिंगी है) तथा निम्बूक ये सब हैं। कागजीनींबू—अम्लरसयुक्त, अग्निदीपक, पाचक, लघु तथा वातनाशक होता है। [१३६] अन्यच्च निम्बुकं कृमिसमूहनाशनं-तीक्ष्णमम्लमुदरग्रहापहम्। वातपित्तकफशूलिने हितं-कष्टनष्टरुचिरोचनं परम् ।। १३७ ।। त्रिदोषवह्निक्षयवातरोग-निपीडितानां विषविह्वलानाम्। मन्दानले बद्धगुदे प्रदेयं-विषूचिकायां मुनयो वदन्ति ।। १३८ ।। अन्य कहे हुए कागजी नींबू के और भी गुण—कागजी नींबू—कृमिसमूह का नाशक, तीक्ष्ण, अम्लरसयुक्त, उदरपीड़ा तथा ग्रहबाधा को दूर करनेवाला, वात-पित्त तथा कफ सम्बन्धी शूलरोगवालों के लिए हितकर, कष्ट से जिनकी अन्न की रुचि नष्ट हो गई है उसे पुनः उत्पन्न करने वाला होता है और त्रिदोष अग्निक्षीणता तथा वातरोग से पीड़ित, विष से विह्वल, मन्दाग्नि, मलबन्ध तथा हैजा रोग से युक्त रोगियों को कागजीनींबू खिलाना हितकर है ऐसा मुनियों का मत है ।। १३७-१३८ ।। ५४. नींबू हिं०—कागजी नींबू, नींबू। बं०—कागदी लेंबु, पति लेंबु। म०—लिंबु। गु०—लींबु, कागदी लीम्बु। ता०— एलुमिच्चै। क०—लिम्बे। ते०—निम्न पंडु। फा०—लिमुने तुर्श, लींबु, लीमूं। अ०—लिमुने हाजिम, लेमू हाजिम। अं०—Lime (लाइम्)। ले०—Citrus medica var. acida (साइट्रस् मेडिका भेद ॲसिडा)। Fam. Rutaceae (रूटेसी)। इसकी सभी स्थानों पर, ४००० फीट की ऊँचाई तक उपज की जाती है तथा हिमालय की उष्ण घाटियों में यह वन्य अवस्था में भी पाया जाता है। इसके वृक्ष—छोटे, ५-१० फीट ऊँचे, कंटकित झाड़ीदार होते हैं। पत्ते—वृन्त थोड़ा सा पक्षयुक्त होता है। पुष्प— छोटे, आधा इञ्च व्यास में, एक साथ ३ से १० की संख्या में पत्रकोण में आते हैं। फल—गोल, १-१।। इञ्च व्यास में, चिकना या झुर्रीदार; छिलका पतला तथा गुद्दी से लगा हुआ, हरा तथा पकने पर कुछ पीत; गुद्दी पीत हरित, अम्ल, सुगंधित एवं अंदर की कली छोटी तथा चमकीली रहती है। इसके भी अनेक कृषित उपभेद पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—रस में साइट्रिक अम्ल, विटामिन ‘सी’ एवं छिलके में उड़नशील तेल होता है। गुण और प्रयोग—यह दीपन, पाचन, किंचित् उष्ण, चक्षुष्य, हृद्य, रक्तपित्तप्रशमन, तृष्णानिग्रहण, ज्वरहर एवं मूत्रजनन है। रक्तपित्त, आमवात, ज्वर, अतिसार, वमन तथा पित्त के विकारों में इसका रस दिया जाता है। खटाई के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। अथ मिष्टनिम्बूफलम् (मीठा नींबू)। तस्य गुणानाह मिष्टनिम्बूफलं स्वादु गुरु मारुतपित्तनुत् ।। १३९ ।। गलरोगविषध्वंसिकफोत्क्लेशि च रक्तहृत्। शोषारुचितृषाच्छर्दिहरं बल्यञ्च बृंहणम् ।। १४० ।। मीठे नींबू का संस्कृत नाम—मिष्टनिम्बू है।