भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • ब्राह्मपर्व *

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आशीर्वाद श्रेष्ठ फलदायक है। पर्वत, अश्व, सिंह, बैल और हाथीपर विशिष्ट पराक्रमके साथ स्वप्नमें जो आरोहण करता है, उसे महान् ऐश्वर्य एवं सुखकी प्राप्ति होती है। ग्रह, तारा, सूर्यका जो स्वप्नमें परिवर्तन करता है और पर्वतका उन्मूलन करता है, उसे पृथ्वीपति होनेका संकेत मिलता है। शरीरसे आँतोंका निकालना, समुद्र एवं नदियोंका पान करना ऐश्वर्य-प्राप्तिका सूचक है। जो स्वप्नमें समुद्रको एवं नदीको साहसके साथ पार करता है, उसे चिरजीवी पुत्र होता है। यदि स्वप्नमें कृमिका भक्षण करना देखता है तो उसे अर्थकी प्राप्ति होती है। सुन्दर अङ्गोंको देखनेसे लाभ होता है। मङ्गलकारी वस्तुओंसे योग होनेपर

आरोग्य और धनकी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं।

भगवान् भास्कर अज्ञानान्धकारको दूरकर अपनी अचल भक्ति प्रदान करते हैं, उनके विधिपूर्वक पूजन करनेके पश्चात् सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करनी चाहिये। जो व्यक्ति भगवान् भास्करकी पूजा करता है, वह उत्तम विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है। विधिपूर्वक पूजन करनेके पश्चात् उनके यथेष्ट मन्त्रोंका जप तथा हवन करना चाहिये। सप्तमीके दिन भगवान् सूर्यनारायणका विधिपूर्वक पूजन कर केवल आधी अञ्जलि जल पीकर व्रत करनेको उदक-सप्तमी कहते हैं, वह सदैव सुख देनेवाली है। (अध्याय १९४-१९७)

सूर्यनारायणकी महिमा, अर्घ्य प्रदान करनेका फल तथा आदित्य-पूजनकी विधियाँ

महाराज शतानीकने कहा—सुमन्तु मुने! इस लोकमें ऐसे कौन देवता हैं, जिनकी पूजा-स्तुति करके सभी मनुष्य शुभ-पुण्य और सुखका अनुभव करते हैं। सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म कौन है? आपके विचारसे कौन पूजनीय है तथा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता किसकी पूजा-अर्चना करते हैं और आदिदेव किस देवताको कहा जाता है?

सुमन्तुजी बोले—राजन्! मैं इस विषयमें भगवान् वेदव्यास और भीष्मपितामहके उस संवादको कह रहा हूँ जो सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा सुख प्रदान करनेवाला है, उसे आप सुनें।

एक समय गङ्गाके किनारे वेदव्यासजी बैठे हुए थे। वे अग्निके समान जाज्वल्यमान, तेजमें आदित्यके समान, साक्षात् नारायणतुल्य दिखायी दे रहे थे। भगवान् वेदव्यास महाभारतके कर्ता तथा वेदके अर्थोंको प्रकाशित करनेवाले हैं और ऋषियों तथा राजर्षियोंके आचार्य हैं, कुरुवंशके

स्वष्ट हैं, साथ ही मेरे परमपूज्य हैं। इन वेदव्यासजीके पास कुरुश्रेष्ठ महातेजस्वी भीष्मजी आये और उन्हें प्रणाम कर कहने लगे।

भीष्मपितामहने पूछा—हे महामते पराशरनन्दन! आपने सम्पूर्ण वाङ्मयकी व्याख्या मुझसे की है, किंतु मुझे भगवान् भास्करके सम्बन्धमें संशय उत्पन्न हो गया है। सर्वप्रथम भगवान् आदित्यको नमस्कार करनेके पश्चात् ही अन्य देवताओंको नमस्कार किया जाता है। इसमें क्या कारण है? ये भगवान् भास्कर कौन हैं? कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? हे द्विजश्रेष्ठ! इस लोकके कल्याणके लिये उस परम तत्त्वको कहिये। मुझे जाननेकी बड़ी ही अभिलाषा है।

व्यासजीने कहा—भीष्म! आप अवश्य ही किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान् भास्करकी स्तुति, पूजन-अर्चना सभी सिद्ध और ब्रह्मादि देवता करते हैं। सभी देवताओंमें

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