भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 231, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें२२०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
आदिदेव भगवान् भास्करको ही कहा जाता है। ये संसार-सागरके अन्धकारको दूरकर सब लोकों और दिशाओंको प्रकाशित करते हैं। ये सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्मस्वरूप हैं। ये पूज्यतम हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देवता आदिदेव भगवान् आदित्यकी ही पूजा करते हैं। आदित्य ही अदिति और कश्यपके पुत्र हैं। ये आदिकर्ता हैं, इसलिये भी आदित्य कहे जाते हैं। भगवान् आदित्यने ही सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया है। देवता, असुर, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, पक्षी आदि तथा इन्द्रादि देवता, ब्रह्मा, दक्ष, कश्यप सभीके आदिकारण भगवान् आदित्य ही हैं। भगवान् आदित्य सभी देवताओंमें श्रेष्ठ और पूजित हैं।
भीष्मपितामहने पूछा —पराशरनन्दन महर्षि व्यासजी! यदि भगवान् सूर्यनारायणका इतना अधिक प्रभाव है तो प्रातः, मध्याह्न और सार्यकाल—इन तीनों कालोंमें राक्षसादि कैसे इन्हें संत्रस्त करते हैं तथा भगवान् आदित्य फिर कैसे चक्रवत् घूमते रहते हैं? हे द्विजोत्तम! राहु उन्हें कैसे प्रसित करता है?
व्यासजीने कहा —पिशाच, सर्प, डाकिनी, दानव आदि जो क्रोधसे उन्मत्त हो भगवान् सूर्यनारायणपर आक्रमण करते हैं, भगवान् सूर्यनारायण उन्हें प्रताडित करते हैं। यह मुहुर्तादि कालस्वरूप भगवान् सूर्यका ही प्रभाव है। संसारमें धर्म एकमात्र भगवान् सूर्यका आधार लेकर प्रवर्तित होता है। ब्रह्मादि देवता सूर्यमण्डलमें स्थित रहते हैं। भगवान् सूर्यनारायणको नमस्कार करनेमात्रसे ही सभी देवताओंको नमस्कार प्राप्त हो जाता है। तीनों कालोंमें संध्या करनेवाले ब्राह्मणजन भगवान् आदित्यको ही प्रणाम करते हैं। भगवान् भास्करके बिम्बके नीचे राहु स्थित है। अमृतकी इच्छा करनेवाला राहु विमानस्थ अमृत-घटसे थोड़ा भी अमृत छलकनेपर उस अमृतको प्राप्त करनेके
उद्देश्यसे जब विमानके अति संनिकट पहुँचता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि राहुने सूर्यनारायणको प्रसित कर लिया है, उसे ही ग्रहण कहा जाता है। आदित्यभगवान्को कोई प्रसित नहीं कर सकता; क्योंकि वे ही इस चराचर जगत्का विनाश करनेवाले हैं। दिन, रात्रि, मुहुर्त आदि सब आदित्यभगवान्के ही प्रभावसे प्रकाशित होते हैं। दिन, रात्रि, धर्म, अधर्म जो कुछ भी इस संसारमें दृष्टिगोचर हो रहा है, उन सबको भगवान् आदित्य ही उत्पन्न करते हैं। वे ही उसका विनाश भी करते हैं। जो व्यक्ति भगवान् आदित्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, उस व्यक्तिको भगवान् आदित्य शीघ्र ही संतुष्ट होकर वर प्रदान करते हैं तथा बल, वीर्य, सिद्धि, ओषधि, धन-धान्य, सुवर्ण, रूप, सौभाग्य, आरोग्य, यश, कीर्ति, पुत्र, पौत्रादि और मोक्ष आदि सब कुछ प्रदान करते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
भीष्मने कहा —महात्मन्! अब आप मुझसे सौर-धर्मके स्नानकी विधि रहस्यसहित बतलायें। जिससे भगवान् आदित्यकी पूजा कर मनुष्य सभी प्रकारके दोषोंसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है।
व्यासजी बोले —भीष्म! मैं सौर-स्नानकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ, जो सभी प्रकारके पापोंको दूर कर देती है। सर्वप्रथम पवित्र स्थानसे मृत्तिका ग्रहण करे, तदनन्तर उस मृत्तिकाको शरीरमें लगाये। फिर जलको अभिमन्त्रित कर स्नान करे। शङ्ख, तुरही आदिसे ध्वनि करते हुए सूर्यनारायणका ध्यान करना चाहिये। भगवान् सूर्यके 'हौं हौं सः' इस मन्त्रराजसे आचमन करना चाहिये। फिर देवताओं एवं ऋषियोंका तर्पण और स्तुति करनी चाहिये। अपसव्य होकर पितरोंका तर्पण करे। अनन्तर संध्या-वन्दन करे। उसके बाद भगवान् भास्करको अञ्जलिसे जल देना चाहिये। स्नान करनेके बाद त्र्यक्षर-मन्त्र 'हौं हौं सः' अथवा
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth