भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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षडक्षर-मन्त्र 'खखोल्लकाय नमः' का जप करना चाहिये। जिस मन्त्रराजको पूर्वमें कहा है उस मन्त्रराजसे हृदयादि- न्यास करना चाहिये। मन्त्रको हृदयङ्गम कर भगवान् सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। एक ताम्रपात्रमें गन्ध, लाल चन्दन आदिसे सूर्य-मण्डल बनाकर उसमें करवीर (कनेर) आदिके पुष्प, गन्धोदक, रक्त चन्दन, कुश, तिल, चावल आदि स्थापित कर घुटनेको मोड़ उस ताम्रपात्रको उठाकर सिरसे लगाये और भक्तिपूर्वक 'हां हों सः' इस मन्त्रराजसे भगवान् सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करे। जो व्यक्ति इस विधिसे भगवान् आदित्यको अर्घ्य निवेदन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। हजारों संक्रान्तियों, हजारों चन्द्रग्रहणों, हजारों गोदानों तथा पुष्कर एवं कुरुक्षेत्र आदि तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल केवल सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। सौरदीक्षाविहीन व्यक्ति भी यदि भगवान् आदित्यको संवत्सरपर्यन्त अर्घ्य प्रदान करता है तो उसे भी वही फल प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। फिर दीक्षाको ग्रहण कर जो विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करता है, वह व्यक्ति इस संसार-सागरको पारकर भगवान् भास्करमें विलीन हो जाता है।
भीष्मने कहा—ब्रह्मन्! आपने पाप-हरण करनेवाली स्नान-विधि तो बता दी, अब कृपाकर उनकी पूजा-विधि बतायें, जिससे मैं भगवान् सूर्यकी पूजा कर सकूँ।
व्यासजी बोले—भीष्म! अब मैं आदित्य-पूजनकी विधि कह रहा हूँ, आप सुनें। आदित्यपूजकको चाहिये कि स्नानादिसे पवित्र होकर किसी शुद्ध एकान्त स्थानमें प्रसन्न होकर भास्करकी पूजा करे। वह श्रेष्ठ सुन्दर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठे। सूर्य-मन्त्रोंसे करन्यास एवं हृदयादि-
न्यास करे। इस प्रकार आत्मशुद्धिकर न्यासद्वारा भगवान् सूर्यकी अपनेमें भावना करे। अपनेको भास्कर समझकर स्थण्डिलपर भानुकी स्थापना करके विधिवत् पूजा करे। दक्षिण पार्श्वमें पुष्पकी टोकरी एवं वाम पार्श्वमें जलसे परिपूर्ण ताम्रपात्र स्थापित करे। पूजाके लिये उपकल्पित सभी द्रव्योंका अर्घ्यपात्रके जलसे प्रोक्षण कर पूजन करे, अनन्तर मन्त्रवेता एकाग्रचित्त होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे।
भीष्मने कहा—भगवन्! अब आप भगवान् सूर्यकी वैदिक अर्चाविधि बतलायें।
व्यासजी बोले—भीष्म! आप इस सम्बन्धमें सुरज्येष्ठ ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य हुए संवादको सुनें। एक बार ब्रह्माजी मेरूपर्वतपर स्थित अपनी मनोवती नामकी सभामें सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय विष्णुभगवान्ने प्रणाम कर उनसे कहा—'ब्रह्मन्! आप भगवान् भास्करकी आराधनाविधि बतायें और मण्डलस्थ भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये, इसे कहें।'
ब्रह्माने कहा—महाबाहो! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है, आप एकाग्रचित्त होकर भगवान् भास्करकी पूजनविधि सुनिये।
सर्वप्रथम शास्त्रोक्त विधिसे भूमिका विधिवत् शोधनकर केसर आदि गन्धोंसे सात आवरणोंसे युक्त कर्णिकासमन्वित एक अष्टदलकमल बनाये। उसमें दीसा आदि सूर्यकी दिव्य अष्ट शक्तियोंको पूर्वादि-क्रमसे ईशानकोणतक स्थापित करे। बीचमें सर्वतोमुखी देवीकी स्थापना करे। दीसा, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता और सर्वतोमुखी—ये नौ सूर्यशक्तियाँ हैं। इन शक्तियोंका आवाहन कर पद्मकी कर्णिकाके ऊपर भगवान् भास्करको स्थापित करना चाहिये। 'उदु त्वं जातवेदसं' (यजु० ७।४१) तथा 'अग्निं दूतं' (यजु० २२।१७)—ये मन्त्र आवाहन और उपस्थानके
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