भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२२ | * संक्षिप्त भविष्यपुराण * |
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कहे गये हैं। ‘आ कृष्णेन रजसा०’ (यजु० ३३। ४३) तथा ‘हꣵ सः शुचिषद०’ (यजु० १०। २४) इन मन्त्रोंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। ‘अपसे तारकं०’ मन्त्रसे दीप्तादेवीकी पूजा करे। ‘अदृश्रमस्य केतवो०’ (यजु० ८। ४०) मन्त्रसे सूक्ष्मादेवीकी, ‘तरणिर्विश्वदर्शतो०’ (यजु० ३३। ३६)—से जयाकी, ‘प्रत्यङ्देवाना०’ इस मन्त्रसे भद्राकी, ‘येना पावक चक्षसा०’ (यजु० ३३। ३२) इस मन्त्रसे विभूतिकी, ‘विद्यामेषि०’ इस मन्त्रसे विमलादेवीकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकारसे अमोघा, विद्युता तथा सर्वतोमुखी देवियोंकी भी पूजा करनी चाहिये। अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे ससावरण-पूजनपूर्वक मध्यमें भगवान् सूर्यकी पूजा करे। भगवान् सूर्य एक चक्रवाले रथपर बैठकर श्वेत कमलपर स्थित हैं। उनका लाल वर्ण है। वे सर्वाभरणभूषित तथा सभी लक्षणोंसे समन्वित और महातेजस्वी हैं। उनका बिम्ब वर्तुलाकार है। वे अपने हाथोंमें कमल और धनुष लिये हैं। ऐसे उनके स्वरूपका ध्यानकर नित्य श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये।
भगवान् विष्णुने कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मण्डलस्थ भगवान् भास्करकी प्रतिमारूपमें किस प्रकारसे पूजा की जाय, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले—हे सुव्रत! आप एकाग्रचित्त-मनसे प्रतिमा-पूजन-विधिको सुनिये। ‘इषे त्वो०’ (यजु० १। १) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सिर-प्रदेशका पूजन करना चाहिये। ‘अग्निमीळे०’ (ऋ० १। १। १) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके दक्षिण हाथकी पूजा करनी चाहिये। ‘अग्न आ याहि०’ (ऋ० ६। १६। १०) इस मन्त्रसे सूर्यभगवान्के दोनों चरणोंकी पूजा करनी चाहिये। ‘आ जिघ्र०’ (यजु० ८। ४२) इस मन्त्रसे पुष्पमाला समर्पित करनी चाहिये। ‘योगे योगे०’ (यजु० ११। १४) इस मन्त्रसे पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। ‘समुद्रंगच्छ०’ (यजु० ६। २१) तथा ‘इमं मे गङ्गे०’ (ऋ० १०। ७५। ५) तथा ‘समुद्रज्येष्ठाः०’ (ऋ० ७। ४९। १) इन मन्त्रोंसे उन्हें अङ्गराग लगाये। ‘आप्यायस्व०’ (यजु० १२। ११२) इस मन्त्रसे दुग्ध-स्नान, ‘दधिक्राव्णो०’ (यजु० २३। ३२) इस मन्त्रसे दधिस्नान, ‘तेजोऽसि शुक्रं०’ (यजु० २२। १) इस मन्त्रसे घृत-स्नान तथा ‘या ओषधीः०’ (यजु० १२। ७५) इस मन्त्रद्वारा ओषधि-स्नान कराये। इसके बाद ‘द्विपदा०’ (यजु० २३। ३४) इस मन्त्रसे भगवान्का उद्वर्तन करे। फिर ‘मा नस्तोके०’ (यजु० १६। १६) इस मन्त्रसे पुनः स्नान कराये। ‘विष्णो रराट०’ (यजु० ५। २१) इस मन्त्रसे गन्ध तथा जलसे स्नान कराये। ‘स्वर्ण घर्मः०’ (यजु० १८। ५०) इस मन्त्रसे पाद्य देना चाहिये। ‘इदं विष्णुर्वि चक्रमे०’ (यजु० ५। १५) इस मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। ‘वेदोऽसि०’ (यजु० २। २१) इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत और ‘बृहस्पते०’ (यजु० २६। २३) इस मन्त्रसे वस्त्र-उपवस्त्र आदि भगवान् सूर्यको चढ़ाना चाहिये। इसके अनन्तर पुष्पमाला चढ़ाये। ‘धूरसि धूर्व०’ (यजु० १। ८) इस मन्त्रसे गुग्गुलसहित धूप दिखाना चाहिये। ‘समिद्धो०’ (यजु० २९। १) इस मन्त्रसे रोचना लगाये। ‘दीर्घायुस्त०’ (यजु० १२। १००) इस मन्त्रसे आलक्त (आलता) लगाये। ‘सहस्रशीर्षा’ (यजु० ३१। १) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सिरका पूजन करना चाहिये। ‘संभावया०’ इस मन्त्रसे दोनों नेत्रों और ‘विश्वतश्चक्षु०’ (यजु० १७। १९) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श करना चाहिये। ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च’ (यजु० ३१। २२) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक भगवान् सूर्यनारायणका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन-अर्चन करना चाहिये। (अध्याय १९८—२०२)