भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *
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म्लेच्छरूपमें स्वयं कलिने ही राज्य किया था। अनन्तर कलिने अपनी पत्नीके साथ नारायणकी पूजाकर दिव्य स्तुति की; स्तुतिसे प्रसन्न होकर नारायण प्रकट हो गये। कलिने उनसे कहा—‘हे नाथ! राजा वेदवान्के पिता प्रद्योतने मेरे स्थानका विनाश कर दिया है और मेरे प्रिय म्लेच्छोंको नष्ट कर दिया है।’
भगवान्ने कहा—कले! कई कारणोंसे अन्य युगोंकी अपेक्षा तुम श्रेष्ठ हो। अनेक रूपोंको धारणकर मैं तुम्हारी इच्छाको पूर्ण करूँगा। आदम नामका पुरुष और हव्यवती (हौवा) नामकी पत्नीसे म्लेच्छवंशोंकी वृद्धि करनेवाले उत्पन्न होंगे। यह कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और कलियुगको इससे बहुत आनन्द हुआ। उसने नीलाचल पर्वतपर आकर कुछ दिनोंतक निवास किया।
राजा वेदवान्को सुनन्द नामका पुत्र हुआ और बिना संततिके ही वह मृत्युको प्राप्त हुआ। इसके बाद आर्यावर्त देश सभी प्रकार क्षीण हो गया और धीरे-धीरे म्लेच्छोंका बल बढ़ने लगा। तब नैमिषारण्यनिवासी अठासी हजार ऋषि-मुनि हिमालयपर चले गये और वे बदरी-क्षेत्रमें आकर भगवान् विष्णुकी कथा-वार्तामें संलग्न हो गये।
सूतजीने पुनः कहा—मुने! द्वापरयुगके सोलह हजार वर्ष शेष कालमें आर्य-देशकी भूमि अनेक कीर्तियोंसे समन्वित रही; पर इतने समयमें कहीं शूद्र और कहीं वर्णसंकर राजा भी हुए। आठ हजार दो सौ दो वर्ष द्वापरयुगके शेष रह जानेपर यह भूमि म्लेच्छ देशके राजाओंके प्रभावमें आने लग गयी। म्लेच्छोंका आदि पुरुष आदम, उसकी स्त्री हव्यवती (हौवा) दोनों इन्द्रियोंका दमनकर ध्यानपरायण रहते थे। ईश्वरने प्रदान नगरके पूर्वाभागमें
चार कोसवाला एक रमणीय महावनका निर्माण किया। पापवृक्षके नीचे जाकर कलियुग सर्परूप धारणकर हौवाके पास आया। उस धूर्त कलिने हौवाको धोखा देकर गूलरके पत्तोंमें लपेटकर दूषित वायुयुक्त फल उसे खिला दिया, जिससे विष्णुकी आज्ञा भंग हो गयी। इससे अनेक पुत्र हुए, जो सभी म्लेच्छ कहलाये। आदम पत्नीके साथ स्वर्ग चला गया। उसका श्वेत नामसे विख्यात श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसकी एक सौ बारह वर्षकी आयु कही गयी है। उसका पुत्र अनुह हुआ, जिसने अपने पितासे कुछ कम ही वर्ष शासन किया। उसका पुत्र कीनाश था, जिसने पितामहके समान राज्य किया। महल्लल नामका उसका पुत्र हुआ, उसका पुत्र मानगर हुआ। उसको विरद नामका पुत्र हुआ और अपने नामसे नगर बसाया। उसका पुत्र विष्णुभक्तिपरायण हनूक हुआ। फलोंका हवन कर उसने अध्यात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया। म्लेच्छधर्मपरायण वह सशरीर स्वर्ग चला गया। इसने द्विजोंके आचार-विचारका पालन किया और देवपूजा भी की, फिर भी वह विद्वानोंके द्वारा म्लेच्छ ही कहा गया। मुनियोंके द्वारा विष्णुभक्ति, अग्निपूजा, अहिंसा, तपस्या और इन्द्रियदमन—ये म्लेच्छोंके धर्म कहे गये हैं। हनूकका पुत्र मतोच्छिल हुआ। उसका पुत्र लोमक हुआ, अन्तमें उसने स्वर्ग प्राप्त किया। तदनन्तर उसका न्यूह नामका पुत्र हुआ, न्यूहके सीम, शम और भाव—ये तीन पुत्र हुए। न्यूह आत्मध्यानपरायण तथा विष्णुभक्त था। किसी समय उसने स्वप्रमें विष्णुका दर्शन प्राप्त किया और उन्होंने न्यूहसे कहा—‘वत्स! सुनो, आजसे सातवें दिन प्रलय होगा। हे भक्तश्रेष्ठ! तुम सभी लोगोंके साथ नावपर चढ़कर अपने जीवनकी
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