भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हुआ था। वे ही सब दैत्य शन्तनुके राज्यमें पुनः भूलोकमें उत्पन्न हुए। दुर्घोधनकी विशाल सेनाके भारसे परिव्याप्त वसुन्धरा इन्द्रकी शरणमें गयी, तब भगवान् श्रीहरिका अवतार हुआ। सौरि वसुदेवके द्वारा देवकीके गर्भसे उन्होंने अवतार लिया। वे एक सौ पैंतीस वर्षोंतक१ पृथ्वीपर रहकर उसके बाद गोलोक चले गये। भगवान् श्रीकृष्णका अवतार द्वापरके चतुर्थ चरणके अन्तमें हुआ था।
इसके बाद हस्तिनापुरमें अभिमन्युके पुत्र परीक्षितने राज्य किया। परीक्षितके राज्य करनेके बाद उनके पुत्र जनमेजयने राज्य किया। तदनन्तर उनके पुत्र महाराज शतानीक पृथ्वीके शासक हुए। उनके पुत्र यज्ञदत्त (सहस्रानीक) हुए। उनके पुत्र निश्चक्र२ (निचकनु) हुए। उनके पुत्र उष्ट्र (उष्ण)- पाल हुए। उनके पुत्र चित्ररथ और
चित्ररथके पुत्र धृतिमान् और उनके पुत्र सुषेण हुए, सुषेणके पुत्र सुनीथ, उनके मखपाल, उनके चक्षु और चक्षुके पुत्र सुखवन्त (सुखावल) हुए। सुखवन्तके पुत्र पारिप्लव हुए। पारिप्लवके पुत्र सुनय, सुनयके पुत्र मेधावी, उनके नृपञ्जय और उनके पुत्र मदु हुए। मदुके पुत्र तिग्मज्योति, उनके बृहद्रथ और उनके पुत्र वसुदान हुए। इनके पुत्र शतानीक हुए, उनके पुत्र उदयन, उदयनके अहीनर, अहीनरके निरमित तथा निरमितके पुत्र क्षेमक हुए। महाराज क्षेमक राज्य छोड़कर कलापग्राम चले गये। उनकी मृत्यु म्लेच्छोंके द्वारा हुई। नारदजीके उपदेश एवं सत्प्रयाससे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम प्रद्योत हुआ। राजा प्रद्योतने मलेच्छ-यज्ञ किया, जिसमें म्लेच्छोंका विनाश हुआ। (अध्याय ३)
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म्लेच्छवंशीय राजाओंका वर्णन तथा म्लेच्छ-भाषा आदिका संक्षिप्त परिचय
शौनकने पूछा—त्रिकालज्ञ महामुने! उस प्रद्योतने कैसे म्लेच्छ-यज्ञ किया? मुझे यह सब बतलायें।
श्रीसूतजीने कहा—महामुने! किसी समय क्षेमकके पुत्र प्रद्योत हस्तिनापुरमें विराजमान थे। उस समय नारदजी वहाँ आये। उनको देखकर प्रसन्न हो राजा प्रद्योतने विधिवत् उनकी पूजा की। सुखपूर्वक बैठे हुए मुनिने राजा प्रद्योतसे कहा—‘म्लेच्छोंके द्वारा मारे गये तुम्हारे पिता यमलोकको चले गये हैं। म्लेच्छ-यज्ञके प्रभावसे उनकी नरकसे मुक्ति होगी और उन्हें स्वर्गीय गति प्राप्त होगी। अतः तुम म्लेच्छ-यज्ञ करो।’
यह सुनकर राजा प्रद्योतकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। तब उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर कुरुक्षेत्रमें म्लेच्छ-यज्ञको तत्काल आरम्भ करा दिया। सोलह योजनमें चतुष्कोण यज्ञ-कुण्डका निर्माण कर देवताओंका आवाहन कर उस राजाने म्लेच्छोंका हनन किया। ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर अभिषेक कराया। इस यज्ञके प्रभावसे उनके पिता क्षेमक स्वर्गलोक चले गये। तभीसे राजा प्रद्योत सर्वत्र पृथ्वीपर म्लेच्छहन्ता (म्लेच्छोंको मारनेवाले) नामसे प्रसिद्ध हो गये। उनका पुत्र वेदवान् नामसे प्रसिद्ध हुआ।
१-विभिन्न पुराणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी स्थितिकालका उल्लेख कुछ अन्तरसे प्राप्त होता है, विशेषकर महाभारत, भागवत, हरिवंश, विष्णुपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण और गर्गसंहितामें भी उनका विस्तृत चरित्र प्राप्त होता है। अधिकांश स्थलोंपर उनका स्थितिकाल एक सौ पचीस वर्ष ही निर्दिष्ट है।
२-इनके शासनकालमें ही गङ्गा हस्तिनापुरके अधिकांश भागको बहा ले गयीं। अतः इन्होंने कौशाम्बीको राजधानी बनाया, जो प्रयागसे चार योजन पश्चिम थीं। (विष्णुपुराण अंश ४। अ० २१)
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