भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२८८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हुआ था। वे ही सब दैत्य शन्तनुके राज्यमें पुनः भूलोकमें उत्पन्न हुए। दुर्घोधनकी विशाल सेनाके भारसे परिव्याप्त वसुन्धरा इन्द्रकी शरणमें गयी, तब भगवान् श्रीहरिका अवतार हुआ। सौरि वसुदेवके द्वारा देवकीके गर्भसे उन्होंने अवतार लिया। वे एक सौ पैंतीस वर्षोंतक१ पृथ्वीपर रहकर उसके बाद गोलोक चले गये। भगवान् श्रीकृष्णका अवतार द्वापरके चतुर्थ चरणके अन्तमें हुआ था।
इसके बाद हस्तिनापुरमें अभिमन्युके पुत्र परीक्षितने राज्य किया। परीक्षितके राज्य करनेके बाद उनके पुत्र जनमेजयने राज्य किया। तदनन्तर उनके पुत्र महाराज शतानीक पृथ्वीके शासक हुए। उनके पुत्र यज्ञदत्त (सहस्रानीक) हुए। उनके पुत्र निश्चक्र२ (निचकनु) हुए। उनके पुत्र उष्ट्र (उष्ण)- पाल हुए। उनके पुत्र चित्ररथ और
चित्ररथके पुत्र धृतिमान् और उनके पुत्र सुषेण हुए, सुषेणके पुत्र सुनीथ, उनके मखपाल, उनके चक्षु और चक्षुके पुत्र सुखवन्त (सुखावल) हुए। सुखवन्तके पुत्र पारिप्लव हुए। पारिप्लवके पुत्र सुनय, सुनयके पुत्र मेधावी, उनके नृपञ्जय और उनके पुत्र मदु हुए। मदुके पुत्र तिग्मज्योति, उनके बृहद्रथ और उनके पुत्र वसुदान हुए। इनके पुत्र शतानीक हुए, उनके पुत्र उदयन, उदयनके अहीनर, अहीनरके निरमित तथा निरमितके पुत्र क्षेमक हुए। महाराज क्षेमक राज्य छोड़कर कलापग्राम चले गये। उनकी मृत्यु म्लेच्छोंके द्वारा हुई। नारदजीके उपदेश एवं सत्प्रयाससे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम प्रद्योत हुआ। राजा प्रद्योतने मलेच्छ-यज्ञ किया, जिसमें म्लेच्छोंका विनाश हुआ। (अध्याय ३)
*
म्लेच्छवंशीय राजाओंका वर्णन तथा म्लेच्छ-भाषा आदिका संक्षिप्त परिचय
शौनकने पूछा—त्रिकालज्ञ महामुने! उस प्रद्योतने कैसे म्लेच्छ-यज्ञ किया? मुझे यह सब बतलायें।
श्रीसूतजीने कहा—महामुने! किसी समय क्षेमकके पुत्र प्रद्योत हस्तिनापुरमें विराजमान थे। उस समय नारदजी वहाँ आये। उनको देखकर प्रसन्न हो राजा प्रद्योतने विधिवत् उनकी पूजा की। सुखपूर्वक बैठे हुए मुनिने राजा प्रद्योतसे कहा—‘म्लेच्छोंके द्वारा मारे गये तुम्हारे पिता यमलोकको चले गये हैं। म्लेच्छ-यज्ञके प्रभावसे उनकी नरकसे मुक्ति होगी और उन्हें स्वर्गीय गति प्राप्त होगी। अतः तुम म्लेच्छ-यज्ञ करो।’
यह सुनकर राजा प्रद्योतकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। तब उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर कुरुक्षेत्रमें म्लेच्छ-यज्ञको तत्काल आरम्भ करा दिया। सोलह योजनमें चतुष्कोण यज्ञ-कुण्डका निर्माण कर देवताओंका आवाहन कर उस राजाने म्लेच्छोंका हनन किया। ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर अभिषेक कराया। इस यज्ञके प्रभावसे उनके पिता क्षेमक स्वर्गलोक चले गये। तभीसे राजा प्रद्योत सर्वत्र पृथ्वीपर म्लेच्छहन्ता (म्लेच्छोंको मारनेवाले) नामसे प्रसिद्ध हो गये। उनका पुत्र वेदवान् नामसे प्रसिद्ध हुआ।
१-विभिन्न पुराणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी स्थितिकालका उल्लेख कुछ अन्तरसे प्राप्त होता है, विशेषकर महाभारत, भागवत, हरिवंश, विष्णुपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण और गर्गसंहितामें भी उनका विस्तृत चरित्र प्राप्त होता है। अधिकांश स्थलोंपर उनका स्थितिकाल एक सौ पचीस वर्ष ही निर्दिष्ट है।
२-इनके शासनकालमें ही गङ्गा हस्तिनापुरके अधिकांश भागको बहा ले गयीं। अतः इन्होंने कौशाम्बीको राजधानी बनाया, जो प्रयागसे चार योजन पश्चिम थीं। (विष्णुपुराण अंश ४। अ० २१)
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- प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *
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म्लेच्छरूपमें स्वयं कलिने ही राज्य किया था। अनन्तर कलिने अपनी पत्नीके साथ नारायणकी पूजाकर दिव्य स्तुति की; स्तुतिसे प्रसन्न होकर नारायण प्रकट हो गये। कलिने उनसे कहा—‘हे नाथ! राजा वेदवान्के पिता प्रद्योतने मेरे स्थानका विनाश कर दिया है और मेरे प्रिय म्लेच्छोंको नष्ट कर दिया है।’
भगवान्ने कहा—कले! कई कारणोंसे अन्य युगोंकी अपेक्षा तुम श्रेष्ठ हो। अनेक रूपोंको धारणकर मैं तुम्हारी इच्छाको पूर्ण करूँगा। आदम नामका पुरुष और हव्यवती (हौवा) नामकी पत्नीसे म्लेच्छवंशोंकी वृद्धि करनेवाले उत्पन्न होंगे। यह कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और कलियुगको इससे बहुत आनन्द हुआ। उसने नीलाचल पर्वतपर आकर कुछ दिनोंतक निवास किया।
राजा वेदवान्को सुनन्द नामका पुत्र हुआ और बिना संततिके ही वह मृत्युको प्राप्त हुआ। इसके बाद आर्यावर्त देश सभी प्रकार क्षीण हो गया और धीरे-धीरे म्लेच्छोंका बल बढ़ने लगा। तब नैमिषारण्यनिवासी अठासी हजार ऋषि-मुनि हिमालयपर चले गये और वे बदरी-क्षेत्रमें आकर भगवान् विष्णुकी कथा-वार्तामें संलग्न हो गये।
सूतजीने पुनः कहा—मुने! द्वापरयुगके सोलह हजार वर्ष शेष कालमें आर्य-देशकी भूमि अनेक कीर्तियोंसे समन्वित रही; पर इतने समयमें कहीं शूद्र और कहीं वर्णसंकर राजा भी हुए। आठ हजार दो सौ दो वर्ष द्वापरयुगके शेष रह जानेपर यह भूमि म्लेच्छ देशके राजाओंके प्रभावमें आने लग गयी। म्लेच्छोंका आदि पुरुष आदम, उसकी स्त्री हव्यवती (हौवा) दोनों इन्द्रियोंका दमनकर ध्यानपरायण रहते थे। ईश्वरने प्रदान नगरके पूर्वाभागमें
चार कोसवाला एक रमणीय महावनका निर्माण किया। पापवृक्षके नीचे जाकर कलियुग सर्परूप धारणकर हौवाके पास आया। उस धूर्त कलिने हौवाको धोखा देकर गूलरके पत्तोंमें लपेटकर दूषित वायुयुक्त फल उसे खिला दिया, जिससे विष्णुकी आज्ञा भंग हो गयी। इससे अनेक पुत्र हुए, जो सभी म्लेच्छ कहलाये। आदम पत्नीके साथ स्वर्ग चला गया। उसका श्वेत नामसे विख्यात श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसकी एक सौ बारह वर्षकी आयु कही गयी है। उसका पुत्र अनुह हुआ, जिसने अपने पितासे कुछ कम ही वर्ष शासन किया। उसका पुत्र कीनाश था, जिसने पितामहके समान राज्य किया। महल्लल नामका उसका पुत्र हुआ, उसका पुत्र मानगर हुआ। उसको विरद नामका पुत्र हुआ और अपने नामसे नगर बसाया। उसका पुत्र विष्णुभक्तिपरायण हनूक हुआ। फलोंका हवन कर उसने अध्यात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया। म्लेच्छधर्मपरायण वह सशरीर स्वर्ग चला गया। इसने द्विजोंके आचार-विचारका पालन किया और देवपूजा भी की, फिर भी वह विद्वानोंके द्वारा म्लेच्छ ही कहा गया। मुनियोंके द्वारा विष्णुभक्ति, अग्निपूजा, अहिंसा, तपस्या और इन्द्रियदमन—ये म्लेच्छोंके धर्म कहे गये हैं। हनूकका पुत्र मतोच्छिल हुआ। उसका पुत्र लोमक हुआ, अन्तमें उसने स्वर्ग प्राप्त किया। तदनन्तर उसका न्यूह नामका पुत्र हुआ, न्यूहके सीम, शम और भाव—ये तीन पुत्र हुए। न्यूह आत्मध्यानपरायण तथा विष्णुभक्त था। किसी समय उसने स्वप्रमें विष्णुका दर्शन प्राप्त किया और उन्होंने न्यूहसे कहा—‘वत्स! सुनो, आजसे सातवें दिन प्रलय होगा। हे भक्तश्रेष्ठ! तुम सभी लोगोंके साथ नावपर चढ़कर अपने जीवनकी
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रक्षा करना। फिर तुम बहुत विख्यात व्यक्ति बन जाओगे। भगवान्की बात मानकर उसने एक सुदृढ़ नौकाका निर्माण कराया, जो तीन सौ हाथ लम्बी, पचास हाथ चौड़ी और तीस हाथ ऊँची थी और सभी जीवोंसे समन्वित थी। विष्णुके ध्यानमें तत्पर होता हुआ वह अपने वंशजोंके साथ उस नावपर चढ़ गया। इसी बीच इन्द्रदेवने चालीस दिनोंतक लगातार मेघोंसे मूसलधार वृष्टि करायी। सम्पूर्ण भारत सागरोंके जलसे प्लावित हो गया। चारों सागर मिल गये, पृथ्वी डूब गयी, पर हिमालय पर्वतका बदरी-क्षेत्र पानीसे ऊपर ही रहा, वह नहीं डूब पाया। अट्टासी हजार ब्रह्मवादी मुनिगण, अपने शिष्योंके साथ वहीं स्थिर और सुरक्षित रहे। न्यूह भी अपनी नौकाके साथ वहीं आकर बच गये। संसारके शेष सभी प्राणी विनष्ट हो गये। उस समय मुनियोंने विष्णुमायाकी स्तुति की।
मुनियोंने कहा—‘महाकालीको नमस्कार है, माता देवकीको नमस्कार है, विष्णुपत्नी महालक्ष्मीको, राधादेवीको और रेवती, पुष्पवती तथा स्वर्णवतीको नमस्कार है। कामाक्षी, माया और माताको नमस्कार है। महावायुके प्रभावसे, मेघोंके भयंकर शब्दसे एवं उग्र जलकी धाराओंसे दारुण भय उत्पन्न हो गया है। भैरवि! तुम इस भयसे हम किंकरोंकी रक्षा करो।’ देवीने प्रसन्न होकर जलकी वृद्धिको तुरंत शान्त कर दिया हिमालयकी प्रान्तवर्ती शिषिणा नामकी भूमि एक वर्षमें जलके हट जानेपर स्थलके रूपमें दीखने लगी। न्यूह अपने वंशजोंके साथ उस भूमिपर आकर निवास करने लगा।
शौनकने कहा—मुनीश्वर! प्रलयके बाद इस समय जो कुछ वर्तमान है, उसे अपनी दिव्य दृष्टिके
प्रभावसे जानकर बतलायें।
सूतजी बोले—शौनक! न्यूह नामका पूर्वनिर्दिष्ट म्लेच्छ राजा भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लीन रहने लगा, इससे भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर उसके वंशकी वृद्धि की। उसने वेद-वाक्य और संस्कृतसे बहिर्भूत म्लेच्छ-भाषाका विस्तार किया और कलिकी वृद्धिके लिये ब्राह्मी* भाषाको अपशब्दवाली भाषा बनाया और उसने अपने तीन पुत्रों—सीम, शम तथा भावके नाम क्रमशः सिम, हाम तथा याकृत रख दिये। याकृतके सात पुत्र हुए—जुम्र, माजुज, मादी, यूनान, तुवलोम, सक तथा तीरास। इन्हींके नामपर अलग-अलग देश प्रसिद्ध हुए। जुम्रके दस पुत्र हुए। उनके नामोंसे भी देश प्रसिद्ध हुए। यूनानकी अलग-अलग संतानें इलीश, तरलीश, किती और हूदा—इन चार नामोंसे प्रसिद्ध हुईं तथा उनके नामसे भी अलग-अलग देश बसे। न्यूहके द्वितीय पुत्र हाम (शम)-से चार पुत्र कहे गये हैं—कुश, मिश्र, कूज तथा कनआँ। इनके नामपर भी देश प्रसिद्ध हैं। कुशके छः पुत्र हुए—सवा, हबील, सर्वत, उरगम, सवतिका और महाबली निमरूह। इनकी भी कलन, सिना, रोरक, अकृद, बावुन और रसनादेशक आदि संतानें हुईं। इतनी बातें ऋषियोंको सुनाकर सूतजी समाधिस्थ हो गये।
बहुत वर्षोंके बाद उनकी समाधि खुली और वे कहने लगे—‘ऋषियो! अब मैं न्यूहके ज्येष्ठ पुत्र राजा सिमके वंशका वर्णन करता हूँ, म्लेच्छ राजा सिमने पाँच सौ वर्षोंतक भलीभाँति राज्य किया। अर्कन्सद उसका पुत्र था, जिसने चार सौ चौतीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र सिंहल हुआ, उसने भी चार सौ साठ वर्षोंतक राज्य
- ब्राह्मीको लिपियोंका मूल माना गया है। राजा न्यूहके हृदयमें स्वयं प्रविष्ट होकर भगवान् विष्णुने उसकी वृद्धिको प्रेरित किया, इसलिये उसने अपनी लिपिको उलटी गतिसे दाहिनेसे बायीं ओर प्रकाशित किया, जो उर्दू, अरबी, फारसी और हिब्रूकी लेखन-प्रक्रियामें देखी जाती है।
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- प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *
२१९
किया। उसका पुत्र इब्र हुआ, उसने पिताके समान ही राज्य किया। उसका पुत्र फलज हुआ, जिसने दो सौ चालीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र रऊ हुआ, उसने दो सौ सैंतीस वर्षोंतक राज्य किया। उसके जूज नामक पुत्र हुआ, पिताके समान ही उसने राज्य किया। उसका पुत्र नहूर हुआ, उसने एक सौ साठ वर्षोंतक राज्य किया। हे राजन्! अनेक शत्रुओंका भी उसने विनाश किया। नहूरका पुत्र ताहर हुआ, पिताके समान उसने राज्य किया। उसके अविराम, नहूर और हारन—ये तीन पुत्र हुए।
हे मुने! इस प्रकार मैंने नाममात्रसे म्लेच्छ राजाओंके वंशोंका वर्णन किया। सरस्वतीके शापसे ये राजा म्लेच्छ-भाषा-भाषी हो गये और आचारमें अधम सिद्ध हुए। कलियुगमें इनकी संख्याकी विशेष वृद्धि हुई, किंतु मैंने संक्षेपमें ही इन वंशोंका वर्णन किया। संस्कृत-भाषा भारतवर्षमें ही किसी तरह बची रही*। अन्य भागोंमें म्लेच्छ-भाषा ही आनन्द देनेवाली हुई।
सूतजी पुनः बोले— भार्गवतनय महामुने शौनक! तीन सहस्र वर्ष कलियुगके बीत जानेपर अवन्ती नगरीमें शङ्खु नामका एक राजा हुआ और म्लेच्छ देशमें शकोंका राजा राज्य करता था। इनकी अभिवृद्धिका कारण सुनो। दो हजार वर्ष कलियुगके बीत जानेपर म्लेच्छवंशकी अधिक वृद्धि हुई और
विश्वके अधिकांश भागकी भूमि म्लेच्छमयी हो गयी तथा भाँति-भाँतिके मत चल पड़े। सरस्वतीका तट ब्रह्मावर्त-क्षेत्र ही शुद्ध बचा था। मूशा नामका व्यक्ति म्लेच्छोंका आचार्य और पूर्व-पुरुष था। उसने अपने मतको सारे संसारमें फैलाया। कलियुगके आनेसे भारतमें देवपूजा और वेदभाषा प्रायः नष्ट हो गयी। भारतमें भी धीरे-धीरे प्राकृत और म्लेच्छ-भाषाका प्रचार प्रारम्भ हुआ। त्रजभाषा और महाराष्ट्री—ये प्राकृतके मुख्य भेद हैं। यावनी और गुरुण्डिका (अंग्रेजी) म्लेच्छ-भाषाके मुख्य भेद हैं। इन भाषाओंके और भी चार लाख सूक्ष्म भेद हैं। प्राकृतमें पानीयको पानी और बुभुक्षाको भूख कहा जाता है। इसी तरहसे म्लेच्छ-भाषामें पितुको पैतर-फादर और भ्रातुको बादर-ब्रदर कहते हैं। इसी प्रकार आहुतिको आजु, जानुको जैनु, रविवारको संडे, फाल्गुनको फरवरी और षष्ठिको सिक्सटी कहते हैं। भारतमें अयोध्या, मथुरा, काशी आदि पवित्र सात पुरियाँ हैं, उनमें भी अब हिंसा होने लग गयी है। डाकू, शबर, भिल्ल तथा मूर्ख व्यक्ति भी आर्यदेश—भारतवर्षमें भर गये हैं। म्लेच्छदेशमें म्लेच्छ-धर्मको माननेवाले सुखसे रहते हैं। यही कलियुगकी विशेषता है। भारत और इसके द्वीपोंमें म्लेच्छोंका राज्य रहेगा, ऐसा समझकर हे मुनिश्रेष्ठ! आपलोग हरिका भजन करें। (अध्याय ४-५)
- पहले संस्कृतका सम्पूर्ण विश्वमें प्रचार था। बालीद्वीपमें अब भी इसका पूरा प्रचार है तथा सुमात्रा, जावा, जापान आदिमें कुछ अंशोंमें इसका प्रचार है। बोर्निया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया और चीनमें भी इसका बहुत पहले प्रचार था। बीचमें संस्कृतकी बहुत उपेक्षा हुई, पर जर्मन, रूस और ब्रिटेनके निवासियोंके सत्प्रयाससे अब पुनः इसका सभी विश्वविद्यालयोंमें अध्यापन होने लगा है। यों कहना चाहिये कि भारतमें ही इसकी उपेक्षा हो रही है। पाश्चात्योंकी वैज्ञानिक उन्नतिमें संस्कृतका ही मुख्य योगदान रहा है। यूरोपकी गोथ-भाषा संस्कृतसे बहुत मिलती थी। सभी सभ्य भाषाओंके व्याकरणोंपर संस्कृतके व्याकरणका बहुत प्रभाव है। मोनियरविलियम तथा राजटर्नरने अपने-अपने कोशोंमें इसके अनेक अद्भुत उदाहरण उपस्थित किये हैं।
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२९२ * संक्षिप्त भविष्यपुराण * काश्यपके उपाध्याय, दीक्षित आदि दस पुत्रोंका नामोल्लेख, मगधके राजवंश और बौद्ध राजाओंका तथा चौहान और परमार आदि राजवंशोंका वर्णन
[बायाँ स्तम्भ] शौनकजीने पूछा—महाराज ! ब्रह्मावर्तमें १ म्लेच्छगण क्यों नहीं आ सके, इसका कारण बतायें। सूतजी बोले—मुने ! सरस्वतीके प्रभावसे वे सब वहाँ नहीं आ सके। वहाँ काश्यप नामके एक ब्राह्मण रहते थे। वे कलिके हजार वर्ष बीतनेपर देवताओंकी आज्ञासे स्वर्गलोकसे ब्रह्मावर्तमें आये। उनकी धर्म-पत्नीका नाम था आर्यावती। उससे काश्यपके दस पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम इस प्रकार हैं—उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य तथा चतुर्वेदी। वे अपने नामके अनुरूप गुणवाले थे। उनके पिता काश्यप, जो सभी ज्ञानोंसे समन्वित और सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता थे, उनके बीच रहकर उन्हें ज्ञान देते रहते थे। काश्यपने कश्मीरमें जाकर जगज्जननी सरस्वतीको रक्त पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य तथा पुष्पाञ्जलिके द्वारा संतुष्ट किया। देवीकी स्तुति करते हुए काश्यपने कहा— 'मातः ! शंकरप्रिये ! मुझपर आपकी करुणा क्यों नहीं होती ? देवि ! आप सारे संसारकी माता हैं, फिर मुझे जगत्से बाहर क्यों मानती हैं ? देवि ! देवताओंके लिये धर्मद्रोहियोंको आप क्यों नहीं मारती हैं ? म्लेच्छोंको मोहित कीजिये और उत्तम संस्कृत-भाषाका विस्तार कीजिये। अम्ब ! आप अनेक रूपोंको धारण करनेवाली हैं, हुंकारस्वरूपा हैं, आपने धूम्रलोचनको मारा है। दुर्गरूपमें आपने भयंकर दैत्योंको मारकर जगत्में सुख प्रदान किया है। मातः ! आप दम्भ, मोह तथा भयंकर गर्वका
[दायाँ स्तम्भ] नाशकर सुख प्रदान करें और दुष्टोंका नाश करें तथा संसारमें ज्ञान प्रदान करें।' इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर सरस्वतीदेवीने उन काश्यप मुनिके मनमें निवासकर उन्हें ज्ञान प्रदान किया। वे मुनि मिश्र देशमें चले गये और उन्होंने वहाँ म्लेच्छोंको मोहित कर उन्हें द्विजन्मा बना लिया। सरस्वतीके अनुग्रहसे उन लोगोंके साथ सदा मुनिवृत्तिमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ काश्यपने आर्यदेशमें निवास किया। उन आर्योंकी देवीके वरदानसे बहुत वृद्धि हुई। काश्यप मुनिका राज्यकाल एक सौ बीस वर्षतक रहा। राज्यपुत्र नामक देशमें आठ हजार शूद्र हुए। उनके राजा आर्य पृथु हुए। उनसे ही मागधकी उत्पत्ति हुई। मागध नामके पुत्रका अभिषेककर पृथु चले गये। यह सुनकर भृगुश्रेष्ठ शौनक आदि ऋषि प्रसन्न हो गये। फिर वे पौराणिक सूतको नमस्कार कर विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो गये। चार वर्षतक ध्यानमें रहकर वे उठे और नित्य-नैमित्तिक क्रियाओंको सम्पन्न कर पुनः सूतजीके पास गये और बोले— 'लोमहर्षणजी ! अब आप मागध राजाओंका वर्णन करें। किन मागधोंने कलियुगमें राज्य किया, हे व्यासशिष्य ! आप हमें यह बतायें।' सूतजीने कहा—मगध-प्रदेशमें काश्यपपुत्र मागधने पितासे प्राप्त राज्यका भार वहन किया। उन्होंने आर्यदेशको अलग कर दिया। पाञ्चाल (पंजाब)-से पूर्वका देश मगध २ देश कहा जाता है। मगधकी आग्नेय दिशामें कलिंग (उड़ीसा), दक्षिणमें अवन्तिदेश, नैर्ऋत्यमें आनर्त (गुजरात),
[पाद-टिप्पणी] १-ब्रह्मावर्त मुख्यरूपसे गङ्गाका उत्तरी भाग है, जो बिजनौरसे लेकर प्रयागतक और उत्तरमें नैमिषारण्यतक फैला है। २-यहाँसे लेकर आगे उदयाश्वतक मगधके राजवंशका वर्णन है, जिनकी राजधानी राजगृह थी।
- प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *
२९३
पश्चिममें सिन्धुदेश, वायव्य दिशामें कैक्यदेश, उत्तरमें मद्रदेश और ईशानमें कुलिन्द देश हैं। इस प्रकार आर्यदेशका उन्होंने भेद किया। इस देशका नामकरण महात्मा मागधके पुत्रने किया था। अनन्तर राजाने यज्ञके द्वारा बलरामजीको प्रसन्न किया, इसके फलस्वरूप बलभद्रके अंशसे शिशुनागका जन्म हुआ, उसने सौ वर्षतक राज्य किया। उसे काकवर्मा नामका पुत्र हुआ, उसने नब्बे वर्षतक राज्य किया। उसे क्षेमधर्मा नामका पुत्र हुआ, उसने अस्सी वर्ष राज्य किया। उसका पुत्र क्षेत्रौजा हुआ, उसने सत्तर वर्षतक राज्य किया। उसके वेदमिश्र नामक पुत्र हुआ, उसने साठ वर्षतक शासन किया। उसे अजातरिपु (अजातशत्रु) नामक पुत्र हुआ, उसने पचास वर्षतक राज्य किया। उसका पुत्र दर्भक हुआ, उसने चालीस वर्षतक राज्य किया। उसे उदयाश्र१ नामका पुत्र हुआ, उसने तीस वर्षतक शासन किया। उसका पुत्र नन्दवर्धन हुआ, उसने बीस वर्षतक शासन किया। नन्दवर्धनका पुत्र नन्द हुआ, उसने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। नन्दके प्रनन्द हुआ, जिसने दस वर्ष राज्य किया। उससे परानन्द हुआ, उसने अपने पिताके तुल्य वर्षांतक ही राज्य किया। उससे समानन्द हुआ, उसने बीस वर्ष राज्य किया। उससे प्रियानन्द हुआ, उसने भी पिताके समान वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र देवानन्द हुआ, उसने भी पिताके समान राज्य किया। देवानन्दका पुत्र यज्ञभंग हुआ, उसने अपने पिताके आधे वर्षांतक (दस वर्ष) राज्य किया। उसका पुत्र
मौर्यानन्द और उसका पुत्र महानन्द हुआ। दोनोंने अपने-अपने पिताके समान वर्षांतक राज्य किया।
इसी समय कलिनै हरिका स्मरण किया। अनन्तर प्रसिद्ध गौतम नामक देवताकी काश्यपसे उत्पत्ति हुई। उसने बौद्धधर्मको संस्कृतकर पट्टण नगर (कपिलवस्तु)-में प्रचार किया और दस वर्षतक राज्य किया१। उससे शक्यमुनिका जन्म हुआ, उसने भी बीस वर्षतक राज्य किया। उससे शुद्धोदन नामक पुत्र हुआ, उसने तीस वर्षतक शासन किया। उससे शक्यसिंहका जन्म हुआ। कलियुगके दो हजार वर्ष व्यतीत हो जानेके बाद शताद्विमें उसने शासन किया। कलिके प्रथम चरणमें वेदमार्गको उसने विनष्ट कर दिया और साठ वर्षतक उसने राज्य किया। उस समय प्रायः सभी बौद्ध हो गये। विष्णुस्वरूप उसके राजा होनेपर जैसा राजा था, वैसी ही प्रजा हो गयी, क्योंकि विष्णुकी शक्तिके अनुसार ही जगत्में धर्मकी प्रवृत्ति होती है। जो मनुष्य मायापति हरिकी शरणमें जाते हैं, वे उनकी कृपाके प्रभावसे मोक्षके भागी हो जाते हैं। शक्यसिंहका पुत्र बुद्धसिंह हुआ, उसने तीस वर्ष राज्य किया। उसका पुत्र (शिष्य) चन्द्रगुप्त२ हुआ, जिसने पारसीदेशके राजा सुलूब (सेल्युकस)-की पुत्रीके साथ विवाह कर यवन-सम्बन्धी बौद्धधर्मका प्रचार किया। उसने साठ वर्षतक शासन किया। चन्द्रगुप्तका पुत्र बिन्दुसार (बिम्बसार) हुआ। उसने भी पिताके समान राज्य किया। उसका पुत्र अशोक हुआ। उसी समय कान्यकुब्ज देशका एक ब्राह्मण आबू पर्वतपर
१-इसीने राजगृहसे हटाकर राजधानी गङ्गाके किनारे बसायी और उसका नाम पाटलिपुत्र या पटना पड़ा। इसके आगेके राजागण पटनासे ही भारतका शासन करते थे।
२-यहाँसे आगे अब लिच्छवि राज्यवंशका वर्णन है, जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी।
३-अब यहाँ फिर पाटलिपुत्रके राजवंशका वर्णन प्रारम्भ हुआ और यह चन्द्रगुप्त ही मौर्यवंशका पहला राजा था। जिसने भारतके साथ अन्य देशोंपर अधिकार किया था, जिन्हें बादमें अशोकने बौद्ध देश बना डाला। उन दिनों वे सभी देश भारतके ही उपनिवेश थे। जिसका यहाँ आगे वर्णन है। चन्द्रगुप्तने ही सेल्युकसकी पुत्रीसे शादी की थी।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
चला गया और वहाँ उसने विधिपूर्वक ब्रह्महोत्र सम्पन्न किया। वेदमन्त्रोंके प्रभावसे यज्ञकुण्डसे चार क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई—प्रमर—परमार (सामवेदी), चपहानि—चौहान (कृष्णयजुर्वेदी), त्रिवेदी—गहरवार (शुक्ल यजुर्वेदी) और परिहारक (अथर्ववेदी) क्षत्रिय थे। वे सब ऐरावत-कुलमें
उत्पन्न गजोंपर आरूढ़ होते थे। इन लोगोंने अशोकके वंशजोंको अपने अधीन कर भारतवर्षके सभी बौद्धोंको नष्ट कर दिया।
अवन्तमें प्रमर—परमार राजा हुआ। उसने चार योजन विस्तृत अम्बावती नामक पुरीमें स्थित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। (अध्याय ६)
महाराज विक्रमादित्यके चरित्रका उपक्रम
सूतजी बोले—शौनक! चित्रकूट पर्वतके आस-पासके क्षेत्र (प्रायः आजके पूरे बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड)—में परिहार नामका एक राजा हुआ। उसने रमणीय कलिंगर नगरमें रहकर अपने पराक्रमसे बौद्धोंको परास्त कर पूरी प्रतिष्ठा प्राप्त की। राजपूतानेके क्षेत्र (दिल्ली नगर)—में चपहानि—चौहान नामक राजा हुआ। उसने अति सुन्दर अजमेर नगरमें रहकर सुखपूर्वक राज्य किया। उसके राज्यमें चारों वर्ण स्थित थे। आनर्त (गुजरात)—देशमें शुक्ल नामक राजा हुआ, उसने द्वारकाको राजधानी बनाया।
शौनकजीने कहा—हे महाभाग! अब आप अग्रिवंशी राजाओंका वर्णन करें।
सूतजी बोले—ब्राह्मणो! इस समय मैं योगनिद्राके वशमें हो गया हूँ। अब आपलोग भी भगवान्का ध्यान करें। अब मैं थोड़ा विश्राम करूँगा। यह सुनकर मुनिगण भगवान् विष्णुके ध्यानमें लीन हो गये। लम्बे अन्तरालके बाद ध्यानसे उठकर सूतजी पुनः बोले—महामुने! कलियुगके सैतीस सौ दस वर्ष व्यतीत होनेपर प्रमर नामक राजाने राज्य करना प्रारम्भ किया। उन्हें महामद (मुहम्मद) नामक पुत्र हुआ, जिसने पिताके शासन-कालके आधे समयतक राज्य किया। उसे देवापि नामक
पुत्र हुआ, उसने भी पिताके ही तुल्य वर्षांतक राज्य किया। उसे देवदूत नामक पुत्र हुआ, उसके गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ, जिसने पचास वर्षांतक राज्य किया। वह अपने पुत्र शङ्खुका अभिषेक कर वन चला गया। शङ्खुने तीस वर्षांतक राज्यभार सँभाला। उसी समय देवराज इन्द्रने वीरमती नामक एक देवाङ्गनाको पृथ्वीपर भेजा। शङ्खुने वीरमतीसे गन्धर्वसेन नामक पुत्ररत्नको प्राप्त किया। पुत्रके जन्म-समयमें आकाशसे पुष्पवृष्टि हुई और देवताओंने दुंदुभी बजायी। सुखप्रद शीतल-मन्द वायु बहने लगी। इसी समय अपने शिष्योंसहित शिवदृष्टि नामके एक ब्राह्मण तपस्याके लिये वनमें गये और शिवकी आराधनासे वे शिवस्वरूप हो गये।
तीन हजार वर्ष पूर्ण होनेपर जब कलियुगका आगमन हुआ, तब शकोंके विनाश और आर्यधर्मकी अभिवृद्धिके लिये वे ही शिवदृष्टि गृह्यकोंकी निवासभूमि कैलाससे भगवान् शंकरकी आज्ञा पाकर पृथ्वीपर विक्रमादित्य नामसे प्रसिद्ध हुए। वे अपने माता-पिताको आनन्द देनेवाले थे। वे बचपनसे ही महान् बुद्धिमान् थे। बुद्धिविशारद विक्रमादित्य पाँच वर्षकी ही बाल्यावस्थामें तप करने वनमें चले गये। बारह वर्षांतक प्रयत्नपूर्वक तपस्या कर वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हो गये। उन्होंने
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- प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *
२९५
अम्बावती नामक दिव्य नगरीमें आकर बत्तीस मूर्तियोंसे समन्वित, भगवान् शिवद्वारा अभिरक्षित रमणीय और दिव्य सिंहासनको सुशोभित किया। भगवती पार्वतीके द्वारा प्रेषित एक वैताल उनकी रक्षामें सदा तत्पर रहता था। उस वीर राजाने महाकालेश्वरमें जाकर देवाधिदेव महादेवकी पूजा की और अनेक व्यूहोंसे परिपूर्ण धर्म-सभाका निर्माण किया। जिसमें विविध मणियोंसे विभूषित अनेक धातुओंके स्तम्भ थे। शौनकजी! उसने अनेक लताओंसे पूर्ण, पुष्पान्वित स्थानपर अपने
दिव्य सिंहासनको स्थापित किया। उसने वेद-वेदाङ्ग-पारंगत मुख्य ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उनकी पूजाकर उनसे अनेक धर्म-गाथाएँ सुनीं। इसी समय वैताल नामक देवता ब्राह्मणका रूप धारण कर 'आपकी जय हो', इस प्रकार कहता हुआ वहाँ आया और उनका अभिवादन कर आसनपर बैठ गया। उस वैतालने राजासे कहा— 'राजन्! यदि आपको सुननेकी इच्छा हो तो मैं आपको इतिहाससे परिपूर्ण एक रोचक आख्यान सुनाता हूँ*' इसे आप सुनें। (अध्याय ७)
॥ प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड सम्पूर्ण ॥
- भारतवर्षमें विक्रमादित्य अत्यन्त प्रसिद्ध दानी, परोपकारी और सर्वार्ज्ञ-सदाचारी राजा हुए हैं। स्कन्द आदि पुराणों, बृहत्कथा और द्वात्रिंशत्पुत्तलिका, सिंहासनबत्तीसी, कथासरित्सागर, पुरुष-परीक्षा आदि ग्रन्थोंमें इनका चरित्र वर्णित है। अब इधर कैम्ब्रजके इतिहासके दूसरे भागमें इनका चरित्र आया है। वैसे स्मिथ और रिफिन्स्टन आदिने अनेक विक्रमादित्योंकी चर्चा की है, पर ये महाराज विक्रमादित्य उज्जयिनीके राजा थे और कालिदास, अमरसिंह, वराहमिहिर, वैद्यराज धन्वन्तरि, घटकर्पर आदि नवरत्न इनकी ही राजसभाकी दिव्य विद्वद्भिर्भूतियाँ थे। जिनकी आगे-पीछे कोई उपमा नहीं है। राजा भोजसे लेकर बादशाह अकबरतक सभीने अपनी सभाको वैसे ही नवरत्नोंसे अलंकृत करनेका प्रयत्न किया था।
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
प्रतिसर्गपर्व
(द्वितीय खण्ड)
स्वामी एवं सेवककी परस्पर भक्तिका आदर्श*
(राजा रूपसेन तथा वीरवरकी कथा)
सूतजी बोले—महामुने! एक बार रुद्रकिंकर वैतालने सर्वप्रथम भगवान् शंकरका ध्यान किया और फिर महाराज विक्रमादित्यसे इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया—
राजन्! अब आप एक मनोहर कथा सुनें। प्राचीन कालमें सर्वसमृद्धिपूर्ण वर्धमान नामक नगरमें रूपसेन नामका एक धर्मात्मा राजा रहता था। उसकी पतिव्रता रानीका नाम विद्वन्माला था। एक दिन राजाके दरबारमें वीरवर नामका एक क्षत्रिय गुणी व्यक्ति अपनी पत्नी, कन्या एवं पुत्रके साथ वृत्तिके लिये उपस्थित हुआ। राजाने उसकी विनयपूर्ण बातोंको सुनकर प्रतिदिन एक सहस्र स्वर्णमुद्रा वेतन निर्धारित कर महलके सिंहद्वारपर रक्षकके रूपमें उसकी नियुक्ति कर ली। कुछ दिन बाद राजाने अपने गुप्तचरोंसे जब उसकी आर्थिक स्थितिका पता लगाया तो ज्ञात हुआ कि वह अपना अधिकांश द्रव्य यज्ञ, तीर्थ, शिव तथा विष्णुके मन्दिरोंमें आराधनादि कार्योंमें तथा साधु, ब्राह्मण एवं अनाथोंमें वितरित कर अत्यल्प शेषसे अपने परिजनोंका पालन करता है। इससे प्रसन्न होकर राजाने उसकी स्थायी नियुक्ति कर दी।
एक दिन जब आधी रातमें मूसलाधार वृष्टि, बादलोंकी गरज, बिजलीकी चमक एवं झंझावातसे रात्रिकी विभीषिका सीमा पार कर रही थी, उसी समय श्मशानसे किसी नारीकी करुणकन्दन-ध्वनि
राजाके कानोंमें पड़ी। राजाने सिंहद्वारपर उपस्थित वीरवरसे इस रुदन-ध्वनिका पता लगानेके लिये कहा। जब वीरवर तलवार लेकर चला, तब राजा भी उसके भयकी आशंका तथा उसके सहयोगके लिये एक तलवार लेकर गुप्त रूपसे स्वयं उसके पीछे लग गया। वीरवरने श्मशानमें पहुँचकर एक स्त्रीको वहाँ रोते देखा और उससे जब इसका कारण पूछा, तब उसने कहा कि 'मैं इस राज्यकी लक्ष्मी—राष्ट्रलक्ष्मी हूँ—इसी मासके अन्तमें राजा रूपसेनकी मृत्यु हो जायगी। राजाकी मृत्यु हो जानेपर मैं अनाथ होकर कहाँ जाऊँगी'—इसी चिन्तासे मैं रो रही हूँ।
स्वामिभक्त वीरवरने राजाके दीर्घायु होनेका उससे उपाय पूछा। इसपर वह देवी बोली—'यदि तुम अपने पुत्रकी बलि चण्डिकादेवीके सामने दे सको तो राजाके आयुकी रक्षा हो सकती है।' फिर क्या था, वीरवर उल्टे पाँव घर लौट आया और अपनी पत्नी, पुत्र तथा लड़कीको जगाकर उनकी सम्मति लेकर उनके साथ चण्डिकाके मन्दिरमें जा पहुँचा। राजा भी गुप्त रूपसे उसके पीछे-पीछे सर्वत्र चलता रहा। वीरवरने देवीकी प्रार्थना कर अपने स्वामीकी आयु बढ़ानेके लिये अपने पुत्रकी बलि चढ़ा दी। भाईका कटा सिर देखकर दुःखसे उसकी बहिनका हृदय विदीर्ण हो गया—वह मर गयी और इसी शोकमें उसकी
- भारतवर्षमें प्राचीन कालसे 'वैताल-पञ्चविंशतिका' या 'वैतालपचीसी' की कथाएँ, जो विक्रम-वैताल-संवादके रूपमें लोकमें अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, उनका मूल भविष्यपुराण ही प्रतीत होता है। ये कथाएँ स्त्री-पुरुषोंके अमर्यादित एवं अनैतिक आकर्षणसे समन्वित होते हुए भी लोक-व्यवहारकी दृष्टिसे शिक्षाप्रद भी हैं। अतः उनमेंसे कुछ कथाएँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं।
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
२१७
माता भी चल बसी। वीरवर इन तीनोंका दाह-संस्कार कर स्वयं भी राजाकी आयुकी वृद्धिके लिये बलि चढ़ गया।
राजा छिपकर यह सब देख रहा था। उसने देवीकी प्रार्थना कर अपने जीवनको व्यर्थ बताते हुए अपना सिर काटनेके लिये ज्यों ही तलवार खींची, त्यों ही देवीने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया और बोली—‘राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी आयु तो सुरक्षित हो ही गयी, अब तुम अपने इच्छानुसार वर माँग लो।’ राजाने देवीसे परिजनोसहित वीरवरको जिलानेकी प्रार्थना की। ‘तथास्तु’ कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं। राजा प्रसन्न होकर चुपके-से वहाँसे चलकर अपने महलमें आकर लेट गया। इधर वीरवर भी चकित होता हुआ और देवीकी कृपा मानता हुआ अपने पुनर्जीवित परिवारको घरपर छोड़कर राजप्रासादके सिंहद्वारपर आकर खड़ा हो गया।
अनन्तर राजाने वीरवरको बुलाकर रातमें रोनेवाली नारीके रुदनका कारण पूछा तो वीरवरने कहा—‘राजन्! वह तो कोई चुड़ैल थी, मुझे देखते ही वह अदृश्य हो गयी। चिन्ताकी कोई बात नहीं है।’ वीरवरकी स्वामिभक्ति और धीरताको
देखकर राजा रूपसेन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने अपनी कन्याका विवाह वीरवरके पुत्रसे कर दिया तथा उसे अपना मित्र बना लिया। इतनी कथा कहकर वैताल शान्त हो गया। वैतालने राजा विक्रमसे फिर पूछा—‘राजन्! इस कथामें परस्पर सबने एक-दूसरेके लिये स्नेहवश अपने प्राणोंका उत्सर्ग किया, पर सबसे अधिक स्नेह और त्याग किसका था? यह आप बताइये।’
राजा बोले—यद्यपि सभीने अपने-अपने कर्तव्यका अद्भुत आदर्श उपस्थित किया, फिर भी राजाका स्नेह ही सबसे अधिक मान्य प्रतीत होता है, क्योंकि वीरवर राजसेवक था, उसे अपनी सेवाके प्रतिफलमें स्वर्णमुद्राएँ मिलती थीं, अतः उसने स्वर्णप्राप्तिकी दृष्टिसे अपना उत्सर्ग किया, वीरवरकी पत्नी पतिव्रता थी, धर्मस्नेही थी, इसलिये उसने अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। बहिनका अपने भाईमें प्रेम था, पुत्रका अपने पितामें स्नेह था, यह तो स्वभाववश होता ही है, किंतु राजा रूपसेनने महान् स्नेहका आदर्श उपस्थित किया, जो कि वे एक सामान्य सेवकके लिये भी अपना प्राणोत्सर्ग करनेको उद्यत हो गये, अतः उन्हींका स्नेहमय त्याग महान् त्याग है।
ब्राह्मण-पुत्री महादेवीकी कथा
वैतालने कहा—राजन्! उज्जयिनी नामकी नगरीमें चन्द्रवंशमें उत्पन्न महाबल नामसे विख्यात अत्यन्त बुद्धिमान् तथा वेदादि-शास्त्रोंका ज्ञाता एक राजा निवास करता था। उसका स्वामिभक्त हरिदास नामका एक दूत था। हरिदासकी पत्नी भक्तिमाला साधु पुरुषोंकी सेवामें तत्पर रहती थी। भक्तिमालाको सभी विद्याओंमें पारंगत कमलके समान नेत्रवाली अत्यन्त रूपवती एक कन्या उत्पन्न हुई, उसका नाम था महादेवी। एक दिन महादेवीने अपने
पिता हरिदाससे कहा—‘तात! आप मुझे ऐसे योग्य पुरुषको दीजियेगा, जो गुणोंमें मुझसे भी अधिक हो, अन्य किसीको नहीं।’ अपनी पुत्रीकी बात सुनकर हरिदास बड़ा प्रसन्न हुआ और ‘ऐसा ही होगा’—कहकर हरिदास राजसभामें आया और उसने राजाका अभिनन्दन किया। तदनन्तर राजाने कहा—‘हरिदास! तुम मेरे ससुर तैलंग देशके राजा हरिश्रन्द्दके पास जाओ और उनका कुशल-समाचार जानकर शीघ्र ही मुझे
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
बताओ।' हरिदास आज्ञा पाकर राजा हरिश्चन्द्रके पास गया और उसने उन्हें अपने स्वामी महाबलका कुशल-समाचार बतलाया। सारा कुशल-समाचार जानकर राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने हरिदाससे पूछा—'प्रभो! आप विद्वान् हैं, मुझे यह बतायें कि कलिका आगमन हो गया, यह कैसे मालूम होगा?
हरिदासने कहा—राजन्! जब वेदोंकी मर्यादाएँ नष्ट हो जायँ और वेदोक्त धर्म विपरीत दिखलायी देने लगेँ, तब कलिका आगमन समझना चाहिये, साथ ही कलिके प्रिय म्लेच्छगण कहे गये हैं। अधर्म ही जिसका मित्र है, ऐसे कलिके द्वारा सभी देवताओंको अपमानित किया गया हो, तब कलिका आगमन समझना चाहिये। राजन्! पापकी स्त्रीका नाम है मृषा (असत्य), उसका पुत्र दुःख कहा गया है। दुःखकी स्त्री है दुर्गति, जो कलियुगमें घर-घरमें व्याप्त रहेगी। सभी राजा क्रोधके वशीभूत हो जायँगे तथा सभी ब्राह्मण कामके दास हो जायँगे। धनिक-वर्ग लोभके वशीभूत हो जायगा तथा शूद्रजन महत्त्वको प्राप्त करेंगे। स्त्रियाँ लज्जासे रहित होंगी और सेवक स्वामीके ही प्राण हरण करनेवाले होंगे। पृथ्वी निष्फल (सत्त्वशून्य) हो जायगी। ऐसी स्थितिमें समझना चाहिये कि कलिका आगमन हो गया है, किंतु कलियुगमें जो मनुष्य भगवान् श्रीहरिकी शरणमें जायँगे, वे ही आनन्दसे रह पायेंगे, अन्य कोई नहीं।
यह सुनकर राजा हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे बहुत-सी दक्षिणा देकर बिदा किया तथा राजा महाबलको सम्पूर्ण समाचार देकर अपने महलमें चला आया और वह विप्र भी अपने शिविरमें आ गया। उसी समय एक बुद्धिकोविद नामक बुद्धिमान् ब्राह्मण वहाँ आया और उसने अपनी विशिष्ट विद्याओंका हरिदासके
सामने प्रदर्शन किया—उस ब्राह्मणने मन्त्र जपकर देवीकी आराधना की और एक महान् आश्चर्यजनक शीघ्रग नामक विमान प्रकटकर हरिदासको दिखलाया। उसकी विद्याओंसे मुग्ध होकर हरिदासने उसे अपनी कन्याके योग्य समझकर उसका वरण कर लिया।
हरिदासका पुत्र था मुकुन्द। वह विद्याध्ययनके लिये अपने गुरुके यहाँ गया था, जब वह अपने गुरुसे विद्याओंको पढ़ चुका तो गुरुदक्षिणाके लिये प्रार्थना करने लगा। गुरुने उससे कहा—'अरे मुकुन्द! सुनो, तुम गुरुदक्षिणाके रूपमें अपनी बहिन महादेवी मेरे दैवज्ञ पुत्र धीमान्को समर्पित कर दो।' 'ठीक है'—ऐसा कहकर मुकुन्द अपने घर आ गया।
इधर हरिदासकी पत्नी भक्तिमालाने द्रौणिशिष्य वामन नामक एक विप्रका जो शब्दवेधी बाण चलानेमें कुशल एवं शस्त्रविद्याका ज्ञाता था, उसकी विद्यासे प्रभावित होकर अपनी कन्याके लिये दक्षिणा, ताम्बूल आदिके द्वारा पूजित कर उसका वरण कर लिया।
समय आनेपर पिता, पुत्र तथा माताद्वारा वरण किये गये तीनों गुणवान् ब्राह्मण महादेवी नामवाली उस कन्याको प्राप्त करनेके लिये हरिदासके यहाँ आ पहुँचे। इसी बीच एक राक्षस अपनी मायासे उस कन्या महादेवीका हरण कर विन्ध्यपर्वतपर चला गया। यह समाचार जानकर ये तीनों कन्यार्थी दुःखी होकर रोने लगे। जब उनमेंसे गुरुपुत्र धीमान् नामक दैवज्ञ विद्वान् ब्राह्मणसे कन्याका पता पूछा गया तो उसने बतलाया कि वह कन्या विन्ध्यपर्वतपर राक्षसद्वारा हरण कर ले जायी गयी है। तदनन्तर उस कन्याकी प्राप्तिके लिये द्वितीय बुद्धिकोविद नाम ब्राह्मणने अपने द्वारा बनाये गये आकाशचारी विमानपर उन दोनों
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
२१९
विप्रोंको बैठाकर विन्ध्यपर्वतपर पहुँचाया। तब शब्दवेधी बाणोंको चलानेमें निपुण वामन नामक तीसरे ब्राह्मणने धनुषपर बाणका संधान किया और बाणसे उस राक्षसको मार डाला। वे तीनों कन्या महादेवीको प्राप्त कर उसी विमानमें बैठकर उज्जयिनीमें वापस लौट आये।
वहाँ पहुँचकर तीनों ब्राह्मण अपने-अपने कार्यका महत्त्व बताते हुए कन्याके वास्तविक अधिकारी होनेके लिये परस्परमें विवाद करने लगे, यह निर्णय नहीं हो सका कि कन्याका विवाह किसके साथ हो।
वैतालने राजा विक्रमसे पूछा—राजन्! आप
बतलायें कि इन तीनोंमें विवाहका अर्थात् कन्या प्राप्त करनेका अधिकारी कौन है?
राजा विक्रमादित्यने कहा—जिस विद्वान् गुरुके पुत्र ज्योतिषी ब्राह्मणने कन्याका यह पता बताया कि वह राक्षसद्वारा चुराकर विन्ध्यपर्वतपर पहुँचायी गयी है, वह ब्राह्मण कन्याके लिये पितृतुल्य है और जिस दूसरे ब्राह्मण बुद्धिकोविदने अपने मन्त्रबलद्वारा उत्पन्न विमानसे महादेवी नामकी कन्याको यहाँ पहुँचाया, वह भाईके समान है, किंतु जिस वामन नामक ब्राह्मण युवकने शब्दवेधी बाणोंसे राक्षसके साथ युद्ध कर उसे मार गिराया, वही वीर ब्राह्मण इस कन्याको प्राप्त करनेका योग्य अधिकारी है।
समान-वर्णमें विवाह-सम्बन्धका औचित्य
( त्रिलोकसुन्दरीकी कथा )
वैताल पुनः बोला—राजन्! अब मैं एक दूसरी कथा सुनाता हूँ। चम्पापुरी (भागलपुर) नामकी एक प्रसिद्ध नगरी थी, वहाँ चम्पकेश नामका एक बलवान् और धनुर्धारी राजा रहता था। उसकी रानीका नाम था सुलोचना। उसके त्रिलोकसुन्दरी नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। उसका मुख चन्द्रमाके समान, भौँहें धनुषकी प्रत्यञ्जोके समान, नेत्र मृगके समान तथा शब्द कोकिलके समान थे। राजन्! उस बालासे देवता भी विवाह करना चाहते थे, अन्य मनुष्योंकी तो बात ही क्या? उसके स्वयंवरमें लोकविश्रुत सभी राजा तथा देवराज इन्द्र, वरुण, कुबेर, धर्मराज और यम आदि देवता भी मनुष्यका शरीर धारण करके आये। उनमेंसे इन्द्रदत्तने कन्याके पिता राजा चम्पकसे कहा—‘राजन्! मैं सभी शास्त्रोंमें कुशल हूँ, रूपवान् एवं मनोरम हूँ, अतः आप अपनी पुत्रीको मुझे समर्पित कर दें।’ दूसरे धर्मदत्तने कहा—‘राजन्! मैं धनुर्विद्यामें कुशल एवं मनोरम हूँ, आप अपनी
कन्या मुझे समर्पित करें।’ तीसरेने कहा—‘राजन्! मेरा नाम धनपाल है, मैं सभी प्राणियोंकी भाषा जानता हूँ, मैं गुणवान् और रूपवान् भी हूँ। आप अपनी कन्या मुझे समर्पित कर सुखी होइये।’ चौथेने कहा—‘राजन्! मैं सर्वकला-विशारद हूँ, प्रतिदिन अपने उद्योगसे पाँच रत्न प्राप्त करता हूँ, उनमेंसे पुण्यके लिये प्रथम रत्न, होमके लिये द्वितीय रत्न, आत्माके लिये तृतीय रत्न, पत्नीके लिये चतुर्थ रत्न तथा शेष अन्तिम रत्न भोजनके लिये व्यय करता हूँ। अतः आप अपनी कन्या मुझ सर्वकला-विशारदको प्रदान करें।’
यह सुनकर राजा आश्चर्यमें पड़ गया कि अपनी कन्या मैं किसे दूँ। वह कुछ निश्चय नहीं कर पाया। अन्तमें उसने सारी बातें कन्याको बतायीं और उससे पूछा कि तुम्हें इनमेंसे कौनसा वर अभीष्ट है, पर कन्या त्रिलोकसुन्दरीने लजावश कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
वैतालने पूछा—राजन्! अब आप बतायें कि
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उस कन्याके योग्य वर इनमेंसे कौन था ?
राजा बोला—रुद्रकिंकर! वह रूपवती कन्या त्रिलोकसुन्दरी धर्मदत्तके योग्य है; क्योंकि इन्द्रदत्त वेदादि शास्त्रोंका ज्ञाता है, अतः वर्णसे वह द्विज कहा जायगा। भाषा जाननेवाला तथा धन-धान्यका विस्तार करनेवाला धनपाल वणिक् कहा जायगा।
तृतीय जो कलाविद् है और रत्नोंका व्यापार करता है, वह शूद्र कहलायेगा। वैताल! सवर्णके लिये ही कन्या योग्य होती है, अतः धनुर्वेद-शास्त्रमें जो निपुण धर्मदत्त है, वह वर्णसे क्षत्रिय कहलायेगा, इसलिये उस क्षत्रिय कन्याका विवाह धर्मदत्तके साथ ही किया जाना चाहिये।
विषयी राजा राज्यके विनाशका कारण बनता है
(राजा धर्मवल्लभ और मन्त्री सत्यप्रकाशकी कथा)
वैतालने पुनः राजासे कहा—राजन्! प्राचीन कालमें रमणीय पुण्यपुर (पूना) नगरमें धर्मवल्लभ नामका एक राजा राज्य करता था। उसका मन्त्री सत्यप्रकाश था। मन्त्रीकी स्त्रीका नाम था लक्ष्मी। एक बार राजा धर्मवल्लभने मन्त्रीसे कहा—‘मन्त्रिवर! आनन्दके कितने भेद हैं? यह मुझे बताओ।’ उसने कहा—‘महाराज! आनन्द चार प्रकारके हैं—(१) ब्रह्मचर्याश्रमका आनन्द जो ब्रह्मानन्द है, वह श्रेष्ठ है। (२) गृहस्थाश्रमका विषयानन्द मध्यम है। (३) वानप्रस्थका धर्मानन्द सामान्य है और (४) संन्यासमें जो शिवानन्दकी प्राप्ति है, वह आनन्द उत्तमोत्तम है। राजन्! इनमें गृहस्थाश्रमका विषयानन्द स्त्री-प्रधान है, क्योंकि गृहस्थाश्रममें स्त्रीके बिना सुख नहीं मिलता।’
यह सुनकर राजा अपने अनुकूल धर्मपरायणा पत्नी प्राप्त करनेके लिये अन्य देशमें चला गया, किंतु उसे मनोऽनुकूल पत्नी नहीं प्राप्त हुई। तब उसने अपने मन्त्रीसे कहा—‘मेरे अनुरूप कोई स्त्री ढूँढ़ो।’ यह सुनकर मन्त्री विभिन्न देशोंमें गया। पर जब कहीं भी उसे राजाके योग्य स्त्री नहीं मिली तो वह सिन्धु देशमें आकर समुद्रकी
ओर बढ़ा। सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ सिन्धुको देखकर वह प्रसन्न हुआ। मन्त्री सत्यप्रकाशने समुद्रसे इस प्रकार प्रार्थना की—‘सभी रत्नोंके आलय, सिन्धुदेशके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। शरणागतवत्सल! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, गङ्गा आदि नदियोंके स्वामी जलाधीश! आपको नमस्कार है। मेरे राजाके लिये आप उत्तम स्त्री-रत्न प्रदान करें। यदि ऐसा आप नहीं करेंगे तो मैं अपने प्राण यहीं दे दूँगा।’ नदीपति सागर यह स्तुति सुनकर प्रसन्न हो गये और उसे जलमें विदुमके पत्नोंवाले, मुक्तारूपी फलसे समन्वित एक वृक्षको दिखाया, जिसके ऊपर मनोरमा, सुकुमारी एक सुन्दरी कन्या स्थित थी। पर कुछ ही क्षणोंमें देखते-ही-देखते वह कन्या वृक्षसहित पुनः जलमें लीन हो गयी।
यह देखकर अतिशय आश्चर्यचकित होकर मन्त्री सत्यप्रकाश पुनः राजाके पास लौट आया और उसने सारी बातें राजाको सुनवाई। पुनः दोनों समुद्रके किनारे आये। राजाने भी मन्त्रीके समान ही कन्याको वृक्षपर बैठा देखा और राजाके देखते ही वह कन्या पूर्ववत् जलमें प्रविष्ट हो गयी। इस अद्भुत दृश्यको देखकर राजा भी समुद्रमें
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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प्रविष्ट हो गया तथा उसी कन्याके साथ पातालमें पहुँच गया और मन्त्री वापस लौट आया।
राजाने कहा—वरानने! मैं तुम्हारे लिये यहाँ आया हूँ। गान्धर्व विवाहसे मुझे प्राप्त करो। उसने हँसकर कहा—‘नृपश्रेष्ठ! जब कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथि आयेगी, तब मैं देवी-मन्दिरमें आकर तुम्हें मिलूँगी।’ राजा लौट आया और पुनः कृष्ण चतुर्दशीके दिन हाथमें तलवार लेकर देवीके मन्दिरमें गया। वह कन्या राजासे पूर्व ही मन्दिरमें पहुँच चुकी थी। उसी समय बकवाहन नामके एक राक्षसने आकर उस कन्याका स्पर्श किया। यह देखकर राजा क्रोधान्ध हो गया। उसने राक्षसका सिर तलवारसे काट दिया। पुनः उस कन्यासे कहा—‘भामिनि! तुम सत्य बताओ, यह कौन था और यहाँ कैसे आया?’ उसने कहा—‘राजन्! मैं विद्याधरकी कन्या हूँ। मेरा नाम मदवती है। मैं पिताजीकी प्रिय कन्या हूँ। एक बार मैं किसी समय वनमें गयी थी और भोजनके समय पिता-माताके पास घरमें नहीं पहुँच सकी थी। मेरे पिताजीने ध्यानके द्वारा सारा वृत्तान्त जान लिया, उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि मदवती! कृष्ण चतुर्दशीको तुमको राक्षस ग्रहण करेगा।’ जब मुझे शापकी बात मालूम हुई, तब मैंने रोते हुए पिताजीसे पूछा—‘देव! मेरी इस शापसे मुक्ति कब होगी?’ उन्होंने कहा—‘पुत्री! जब कृष्ण चतुर्दशीको कोई राजा तुम्हारा वरण करेगा, तब तुम्हारे शापकी निवृत्ति हो जायगी।’
मदवतीने कहा—राजन्! आपके अनुग्रहसे आज
मैं शापसे मुक्त हो गयी हूँ। आपकी आज्ञा पाकर अब मैं अपने पिताके घर जाना चाहती हूँ। यह सुनकर राजाने कहा—‘तुम मेरे साथ मेरे घर चलो। इसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे पिताके पास ले चलूँगा।’ वह राजाकी बात मानकर राजाके महलमें आ गयी और राजासे उसका विवाह हो गया। उस राजाके नगरमें महान् उत्सव हुआ। मन्त्रीने देखा कि राजाके साथ एक दिव्य कन्या भी आयी है। कुछ दिनों बाद मन्त्री एकाएक मृत्युको प्राप्त हो गया।
वैतालने पूछा—राजन्! बताओ, उस मन्त्रीके मरनेमें क्या कारण है? क्या रहस्य है?
राजा विक्रमने कहा—मन्त्री सत्यप्रकाश राजाका मित्र और प्रजाका परम हितैषी था। उसके ही समुद्योगसे राजाको श्रेष्ठ मदवती नामकी विद्याधर-कन्या रानीके रूपमें प्राप्त हुई थी, किंतु मदवतीके साथ विवाहके बाद मन्त्री सत्यप्रकाशने देखा कि राजा मदवतीको पाकर विलासी होते जा रहे हैं और राज्य एवं प्रजाकी उपेक्षा करने लगे हैं। दिन-रात विषय-सुखमें ही लिस रहने लगे हैं। यह देखकर उसने समझ लिया कि अब शीघ्र ही इस राज्यका विनाश होनेवाला है; क्योंकि जब राजा विषयी एवं स्वार्थी बन जाता है, तब राज्यका नाश अवश्य होता है। ऐसी स्थितिमें मेरी मन्त्रणाएँ भी व्यर्थ सिद्ध होंगी, अतः राज्यके विनाशको मैं अपनी आँखोंसे न देख सकूँ, इसलिये पहले ही मैं अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर देता हूँ। वैताल! यही समझकर मन्त्री सत्यप्रकाशने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया।
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३०२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है
(हरिस्वामीकी कथा)
वैतालने पुनः कहा—राजन्! चूड़ापुर नामक एक रमणीय नगरमें चूड़ामणि नामका एक राजा राज्य करता था। उसकी विशालाक्षी नामकी पतिव्रता पत्नी थी। रानीने पुत्रकी कामनासे भगवान् शंकरकी आराधना की। उनकी कृपासे उसे कामदेवके समान एक सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ, जो देवताओंके अंशसे सम्भूत था। उसका नाम रखा गया हरिस्वामी। सभी सम्पत्तियोंसे समन्वित वह हरिस्वामी पृथ्वीपर देवताके समान सुख भोगने लगा। देवलमुनिके शापसे एक देवाङ्गना मानुषीरूपमें रूपलावण्यका नामसे उत्पन्न होकर राजकुमार हरिस्वामीकी पत्नी हुई। एक समय वह सुन्दरी अपने प्रासादमें आनन्दपूर्वक शय्यापर शयन कर रही थी। उस समय सुकल नामका एक गन्धर्व आया और उसने प्रगाढ़ निद्रामें निमग्न उस रानीका अपहरण कर लिया। जब हरिस्वामी उठा, तब अपनी पत्नीको न देखकर उसे दूँदने लगा। उसके न मिलनेपर वह व्याकुल हो गया और नगर छोड़कर वनमें चला गया तथा सभी विषयोंका परित्याग कर एकमात्र भगवान् श्रीहरिके ध्यानमें लीन हो गया और भिक्षावृत्तिका आश्रय ग्रहण कर संन्यासी हो गया।
एक दिन वह संन्यासी (राजा हरिस्वामी) भिक्षा माँगनेके लिये एक ब्राह्मणके घर आया और ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक खीर बनाकर उसको दी। खीरका पात्र लेकर वह वहाँसे स्नान करने चला आया। खीरका पात्र उसने वटवृक्षपर रख दिया और स्वयं नदीमें स्नान करने लगा। उसी समय कहींसे एक सर्प आया और उसने उस खीरमें अपने मुँहसे विष उगल दिया। जब संन्यासी हरिस्वामी स्नानसे आकर खीर खाने लगा तो विषके प्रभावसे वह बेहोश
होने लगा और उस ब्राह्मणके पास आकर कहने लगा—‘अरे दुष्ट ब्राह्मण! तुम्हारे द्वारा दिये गये विषमय खीरको खाकर अब मैं मर रहा हूँ। इसलिये तुम्हें ब्रह्महत्याका पाप लेगेगा।’ यह कहकर वह संन्यासी मर गया और उसने अपनी तपस्याके प्रभावसे शिवलोकको प्राप्त किया।
वैतालने राजासे पूछा—राजन्! इनमें ब्रह्महत्याका पाप किसको लेगेगा? यह मुझे बताओ।
राजाने कहा—विषधर नागने अज्ञानवश स्वभावतः उस पायसको विषमय कर दिया, अतः ब्रह्महत्याका पाप उसे नहीं होगा।
चूँकि संन्यासी बुभुक्षित था और भिक्षा माँगने ब्राह्मणके घर आया था, ब्राह्मणके लिये वह अतिथि देवस्वरूप था। अतः अतिथिधर्मका पालन करना उसके कुल-धर्मके अनुकूल ही था। उसने श्रद्धासे खीर बनाकर संन्यासीको निवेदित किया; ऐसेमें वह कैसे ब्रह्महत्याका भागी बन सकता है? यदि वह विष मिलाकर अन्न देता, तभी ब्रह्महत्या उसे लगती, क्योंकि अतिथिका अपमान भी ब्रह्महत्याके समान ही है। अतः ब्राह्मणको ब्रह्महत्या नहीं लेगेगी। शेष बच गया वह संन्यासी। चूँकि अपने किये गये शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है। अतः वह संन्यासी अपने किसी जन्मान्तरीय कर्मवश कालकी प्रेरणासे स्वतः ही मरा, उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूपसे ही हुई। इसमें किसीका दोष नहीं। पायसका भोजन करना तो मरनेमें केवल निमित्तमात्र ही था। अतः उसे भी ब्रह्महत्या नहीं लेगेगी। इस प्रकार इन तीनोंमें किसीको भी ब्रह्महत्या नहीं लेगेगी।
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३०३
जीवन-दानका आदर्श
(जीमूतवाहन और शङ्खुचूड़की कथा)
रुद्रकिंकर वैतालने राजा विक्रमादित्यसे कहा—महाराज! कान्यकुब्ज (कन्नौज)-में दानशील, सत्यवादी एवं देवी-पूजनमें तत्पर एक ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिग्रहसे प्राप्त द्रव्यका दान कर देता था। एक बार शारदीय नवदुर्गाका व्रत आया। उसे दानमें कुछ भी द्रव्य प्राप्त नहीं हो सका, अतः वह बहुत चिन्तित हो गया, सोचने लगा, कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मुझे द्रव्यकी प्राप्ति हो। मैंने दुर्गा-पूजामें कन्याओंको निमन्त्रित किया है, अब उन्हें कैसे भोजन कराऊँगा। वह इसी चिन्तामें निमग्न हो रहा था कि देवीकी कृपासे उसे अनायास पाँच मुद्राएँ प्राप्त हो गयीं और उसीसे उसने व्रत सम्पन्न किया। उसने नौ दिनोंतक निराहार व्रत किया था। उस व्रतके प्रभावसे मरकर उसने देवस्वरूपको प्राप्त किया। फलतः वह विद्याधरोंका स्वामी जीमूतकेतु हुआ। वह हिमालय पर्वतके रम्य स्थानमें रहता था। वहाँ वह भक्तिपूर्वक कल्पवृक्षकी पूजा भी करता था। उस वृक्षके प्रभावसे उसे सभी कलाओंमें कुशल जीमूतवाहन नामका एक पुत्र प्राप्त हुआ।
पूर्वजन्ममें वह जीमूतवाहन मध्यदेशका शूरसेन नामक राजा था। किसी समय वह राजा शूरसेन आखेटके लिये महर्षि वाल्मीकिकी निवासभूमि उत्पलावर्त नामक वनमें आया। वहाँ चैत्र शुक्ला नवमीको उसने विधिवत् रामजन्मका श्रीरामनवमी-उत्सव किया। उसने महर्षि वाल्मीकिकी कुटीमें रात्रि-जागरण भी किया। राममयी गाथाके श्रवणजन्म पुण्यके प्रभावसे वह शूरसेन राजा ही जीमूतकेतुके पुत्र-रूपमें जीमूतवाहन नामक विद्याधर हुआ।
उस महात्मा जीमूतवाहनने भी कल्पवृक्षकी श्रद्धापूर्वक पूजा की। एक वर्षके भीतर ही प्रसन्न
होकर उस वृक्षने उससे वर माँगनेको कहा। इसपर जीमूतवाहनने कहा—‘महावृक्ष! मेरा नगर आपकी कृपासे धन-धान्य-सम्पन्न हो जाय। कल्पवृक्षने नगरको पृथ्वीमें सर्वश्रेष्ठ कर दिया। वहाँ कोई भी ऐसा नहीं था जो कल्पवृक्षके प्रभावसे राजाके समान न हो गया हो। अनन्तर वे पिता और पुत्र दोनों तपस्याके लिये वनमें चले गये और अतिशय रमणीय मलयाचलपर कठोर तपस्या करने लगे।’
राजन्! एक दिन राजा मलयध्वजकी पुत्री कमलाक्षी शिवकी पूजाके लिये अपनी सखियोंके साथ शिव-मन्दिरमें आयी। उसी समय जीमूतवाहन भी पूजाके लिये मन्दिरमें पहुँचा। सभी अलंकारोंसे अलंकृत दिव्य राजकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा जीमूतवाहनको जाग्रत् हुई तथा इसके लिये उसने प्रार्थना भी की। अन्तमें कन्याके पिता मलयध्वजने जीमूतवाहनसे उसका विवाह करा दिया।
राजा मलयध्वजका पुत्र विश्वावसु एक दिन अपने बहनोंई जीमूतवाहनके साथ गन्धमादन पर्वतपर गया। वहाँ उसने नर-नारायणको प्रणाम किया। उसी शिखरपर भगवान् विष्णुका वाहन गरुड आया। उस समय शङ्खुचूड़ नागकी माता, जहाँ जीमूतवाहन था वहाँ विलाप कर रही थी। स्त्रीके करुणक्रन्दनको सुनकर दीनवत्सल जीमूतवाहन दुःखी होकर शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। वृद्धाको आश्वासन देकर उसने पूछा—‘तुम क्यों रो रही हो? तुम्हें क्या कष्ट है?’ वह बोली—‘देव! आज मेरा पुत्र गरुडका भक्ष्य बनेगा, उसके वियोगके कारण दुःखसे व्याकुल होकर मैं रो रही हूँ।’ यह सुनकर राजा जीमूतवाहन गरुड-शिखरपर गया। गरुड उसे अपना भक्ष्य समझकर पकड़कर आकाशमें ले गया। जीमूतवाहनकी
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३०४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पत्नी कमलाक्षी आकाशमें गरुडके द्वारा भक्षण किये जाते हुए अपने पतिको देखकर दुःखसे रोने लगी। परंतु बिना कष्टके खाये जाते उस जीमूतवाहनको मानव-रूपमें देखकर गरुड डर गया और जीमूतवाहनसे कहने लगा—‘तुम मेरे भक्ष्य क्यों बन गये?’ इसपर उसने कहा—‘शङ्खचूड नागकी माता बड़ी दुःखी थी, उसके पुत्रकी रक्षाके लिये मैं तुम्हारे पास आया।’ जब यह घटना शङ्खचूड नागको मालूम हुई तो दुःखी होकर वह शीघ्र ही गरुडके पास आया और कहने लगा—‘कृपासागर! आपके भोजनके लिये मैं उपस्थित हूँ। महामते! इस दिव्य मनुष्यको छोड़कर मुझे अपना आहार बनाइये।’ जीमूतवाहनकी महानता और परोपकारकी भावना देखकर गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उसने विद्याधर जीमूतवाहनको तीन वर दिये। ‘अब मैं आगेसे कभी शङ्खचूडके वंशजोंको नहीं खाऊँगा। श्रेष्ठ जीमूतवाहन! तुम विद्याधरोंकी नगरीमें श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करोगे और एक लाख वर्षतक आनन्दका उपभोग कर वैकुण्ठ प्राप्त करोगे।’ इतना कहकर गरुड अन्तर्हित हो गया और जीमूतवाहनने पितासे राज्य प्राप्त किया
तथा अपनी पत्नी कमलाक्षीके साथ राज्य-सुख भोगकर अन्तमें वह वैकुण्ठलोकको चला गया।
वैतालने राजासे पूछा—भूपते! अब आप बताइये कि शङ्खचूड तथा जीमूतवाहन—इन दोनोंमें किसको महान् फल प्राप्त हुआ और दोनोंमें कौन अधिक साहसी था?
राजा बोला—वैताल! शङ्खचूडको ही महान् फल प्राप्त हुआ; क्योंकि उपकार करना तो राजाका स्वभाव ही होता है। राजा जीमूतवाहनने शङ्खचूडके लिये यद्यपि अपना जीवन देकर महान् त्याग एवं उपकार किया, उसीके फलस्वरूप गरुडने प्रसन्न होकर उसे राज्य एवं वैकुण्ठ-प्राप्तिका वर प्रदान किया, तथापि राजा होनेसे जीमूतवाहनका जीवन-दान (नागकी रक्षा करना) कर्तव्यकोटिमें आ जाता है। अतः उसका त्याग शङ्खचूडके त्याग एवं साहसके सामने महत्त्वपूर्ण नहीं प्रतीत होता, परंतु शङ्खचूडने निर्भय होकर अपने शत्रु गरुडको अपना शरीर समर्पित कर एक महान् धर्मात्मा राजाके प्राण बचाये थे। अतः शङ्खचूड ही सबसे बड़े फलका अधिकारी प्रतीत होता है। वैताल राजाके इस उत्तरसे संतुष्ट हो गया।
साधनामें मनोयोगकी महत्ता
(गुणाकरकी कथा)
वैतालने पुनः कहा—राजन्! उज्जयिनीमें महासेन नामका एक राजा था। उसके राज्यमें देवशर्मा नामका एक ब्राह्मण रहता था। देवशर्माका गुणाकर नामक एक पुत्र था, जो द्यूत, मद्य आदिका व्यसनी था। उस दुष्ट गुणाकरने पिताका सारा धन द्यूत आदिमें नष्ट कर दिया। उसके बन्धुओंने उसका परित्याग कर दिया। वह पृथ्वीपर इधर-उधर भटकने लगा। दैवयोगसे गुणाकर एक सिद्धके
आश्रममें आया, वहाँ कपदी नामके एक योगीने उसे कुछ खानेको दिया, किंतु भूखसे पीड़ित होते हुए भी उसने उस अन्नको पिशाच आदिसे दूषित समझकर ग्रहण नहीं किया। इसपर उस योगीने उसके आतिथ्यके लिये एक यक्षिणीको बुलाया। यक्षिणीने आकर गुणाकरका आतिथ्य-स्वागत किया। तदनन्तर वह कैलास-शिखरपर चली गयी। उसके वियोगसे विह्वल होकर गुणाकर पुनः
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३०५
योगीके पास आया। योगीने यक्षिणीको आकृष्ट करनेवाली विद्या गुणाकरको प्रदान की और कहा—‘वत्स! तुम चालीस दिनतक जलमें स्थित रहकर आधी रातमें इस शुभ मन्त्रका जप करो। ऐसा करनेपर यदि तुम मन्त्र सिद्ध कर लोगे तो मन्त्रकी शक्तिके प्रभावसे वह यक्षिणी तुम्हें प्राप्त हो जायगी। गुणाकरने वैसा ही किया, किंतु वह यक्षिणीको प्राप्त नहीं कर सका। अन्तमें विवश होकर योगीकी आज्ञासे अपने घर लौट आया। उसने अपने माता-पिताको नमस्कार कर वह रात्रि बितायी। दूसरे दिन प्रातः वह गुणाकर सन्यासियोंके एक मठमें गया और वहाँ शिष्य-रूपमें रहने लगा। पञ्चाग्रिके मध्यमें स्थित होकर उसने पवित्र हो यक्षिणीको प्राप्त करनेके लिये कपदीद्वारा बताये गये मन्त्रका पुनः जप करना प्रारम्भ किया, पर यक्षिणी फिर भी नहीं आयी, जिससे उसे बड़ा कष्ट हुआ।’
वैतालने ज्ञानविशारद राजासे पूछा—‘महाभाग! गुणाकर अपनी प्रिया यक्षिणीको क्यों नहीं प्राप्त कर सका?’
राजा बोला—रुद्रकिंकर! साधककी सिद्धिके लिये तीन आवश्यक गुण होने चाहिये—मन, वाणी तथा शरीरका ऐकात्म्य। मन और वाणीकी एकतासे किया गया कर्म परलोकमें सुखप्रद होता है। वाणी
और शरीरसे किया गया कार्य सुन्दर होता है। वह इस जन्ममें आंशिक फल देता है और परलोकमें अधिक फलप्रद होता है। मन और शरीरके द्वारा किया गया कर्म दूसरे जन्ममें सिद्धि प्रदान करता है; परंतु मन, वाणी और शरीर—इन तीनोंकी तन्मयतासे सम्पादित कर्म इस जन्ममें ही शीघ्र फल प्रदान करता है और अन्तमें मोक्ष भी प्रदान करता है। अतः साधकको कोई भी कार्य अत्यन्त मनोयोगसे करना चाहिये।
गुणाकरने यद्यपि दो बार बड़े कष्टपूर्वक मन्त्रका जप किया, किंतु दोनों ही बारकी साधनामें मनोयोगकी कमी रही। जलके भीतर तथा पञ्चाग्रि-सेवन आदिमें शरीरका योग रहा और वाणीसे जप भी होता रहा, किंतु गुणाकरका मन मन्त्रमें न लगकर यक्षिणीमें लगा हुआ था। इसी कारण उसे मन्त्र-शक्तिपर विश्वास भी न हो सका। शरीर और वाणीका योग होते हुए भी मनका योग न रहनेके कारण गुणाकर यक्षिणीको प्राप्त न कर सका, किंतु कर्म तो उसने किया ही था, फलतः परलोकमें वह यक्ष हुआ और यक्ष होकर यक्षिणीको प्राप्त किया। इससे यह सिद्ध हुआ कि किसी भी कार्यकी पूर्ण सिद्धिके लिये मन, वाणी और शरीर—इन तीनोंका ही योग आवश्यक है। इनमें भी मनका योग परम आवश्यक है।
संतानमें समान-भाव रखें
(मझले पुत्रकी कथा)
वैतालने पुनः कहा—राजन्! चित्रकूटमें रूपदत्त नामका एक विख्यात राजा रहता था। एक दिन वह एक मृगका पीछा करते हुए एक वनमें प्रविष्ट हो गया। मध्याह्नकालमें वह एक सरोवरके पास पहुँचा और वहाँ उसने अपनी सखीके साथ कमल-
पुष्पोंका चयन करती हुई एक सुन्दर मुनि-कन्याको देखा। उसके श्रेष्ठ रूपको देखकर राजाने उसे अपनी रानी बनानेका निश्चय किया। वह कन्या भी राजाको देखकर प्रसन्न हुई। दोनों परस्पर प्रीतिपूर्वक एक-दूसरेको देखने लगे। उसकी सखीसे
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३०६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
राजाने जब उस कन्याका पता पूछा, तब उसने कहा कि यह एक मुनिकी धर्मपुत्री है। उसी समय उस कन्याके पिता वहाँ आ पहुँचे। मुनिको देखकर राजाने विनयपूर्वक उनसे पूछा—‘मुने! उत्तम धर्म क्या है?’ इसपर महामनीषी मुनि बोले—‘राजन्! असहायका पालन-पोषण, शरणागतकी रक्षा और दया करना यही मुख्य धर्म है। भयभीतको अभय-दान देनेके समान कोई दान नहीं है। उदण्डोंको दण्ड देना चाहिये। पूज्यजनोंकी पूजा करनी चाहिये। गौ एवं ब्राह्मणमें नित्य आदरभाव रखना चाहिये। दण्ड देनेमें समानभाव रखना चाहिये, पक्षपात नहीं करना चाहिये। देवताकी पूजामें छल-छद्म एवं कपटको छोड़कर श्रद्धा-भक्तिरूपी सत्यका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। गुरु एवं श्रेष्ठ जनोंकी पूजामें इन्द्रिय-निग्रह एवं समाहितचित्तताका विशेष ध्यान रखना चाहिये। दान देते समय मृदुताका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। थोड़े-से भी हुए निन्द्य कर्मको बहुत बड़ा अपराध समझकर सर्वथा उससे विरत रहना चाहिये*।’
ऐसा कहकर उस मुनिने अपनी कन्याका विवाह राजकुमारके साथ कर दिया। राजा उसे लेकर अपनी राजधानीकी ओर चला। मार्गमें उसने एक वटवृक्षके नीचे विश्राम किया। उसी समय उसकी पत्नीको खा जानेके लिये एक राक्षस वहाँ आया और कहने लगा कि ‘तुम दोनोंने मेरा स्थान अपवित्र कर दिया है, अतः मैं तुम लोगोंको खा जाऊँगा।’ राजाके क्षमा माँगनेपर उसने पुनः कहा—‘यदि तुम किसी सात वर्षके ब्राह्मण-
बालकको मेरे खानेके लिये प्रस्तुत करो तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।’ राजा राक्षसको वचन देकर अपनी पत्नीके साथ महलमें चला आया।
दूसरे दिन राजाने मन्त्रियोंको सब समाचार कह सुनाया। मन्त्रियोंके परामर्शपर राजाने एक ब्राह्मणको एक लक्ष स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उसके मध्यम पुत्रको राक्षसको समर्पित करनेके लिये राजी कर लिया। उस ब्राह्मणपुत्रने भी पिताके लिये अपना बलिदान देना स्वीकार कर लिया। यथासमय उसे लेकर सभी राक्षसके पास पहुँचे। ज्यों ही बलिदानका समय आया, त्यों ही वह ब्राह्मणका बालक पहले हँसा और फिर उच्च स्वरसे रोने लगा।
वैतालने पूछा—‘राजन्! बताओ कि मृत्युके समय वह ब्राह्मण-बालक पहले क्यों हँसा और बादमें फिर क्यों रोया?’
राजाने कहा—‘वैताल! बड़ा पुत्र पिताको प्रिय होता है और छोटा पुत्र माताको प्रिय होता है। इसलिये माता-पितासे अपनेको उपेक्षित जानकर और अन्य कोई शरण्य न देखकर बड़ी आशासे मध्यम पुत्रने राजाकी शरण ग्रहण की, परंतु अपनी पत्नीका प्रिय चाहनेवाले उस निर्दयी राजा रूपदत्तके हाथमें मृत्युरूपी तलवार देखकर उस ब्राह्मणकुमारको पहले हँसी आ गयी और फिर मेरा यह उत्तम शरीर अधम राक्षसको प्राप्त होगा, यह सोचकर वह दुःखी होकर उच्च स्वरसे रोता हुआ पश्चात्ताप करने लगा। वैताल राजाके इस उत्तरसे बहुत प्रसन्न हुआ।
- तमुवाच मुनिर्धीमान् दयाधर्मप्रपोषणम् । निर्भयस्य समं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ अनहनि दण्डमादद्यादहंपूजाफलं भजेत् । मित्रता गोह्निजे नित्यं समता दण्डनिग्रहे ॥ सत्यता सुरपूजार्थां दमता गुरुपूजने । मृदुता दानसमये संतुष्टिनिन्द्यकर्मणि ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।१९।५-७)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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पढ़ो कम, समझो ज्यादा
(चार मूर्खोंकी कथा)
वैतालने राजासे पुनः कहा—राजन्! रमणीय जयपुरमें वर्धमान नामका एक राजा था। उसके गाँवमें वेदवेदाङ्गपारंगत विष्णुस्वामी नामका एक ब्राह्मण निवास करता था। वह राधा-कृष्णका भक्त था। उसके चार पुत्र थे, जो विभिन्न व्यसनोंमें लगे रहते थे। वे जैसा निन्दित कर्म करते थे, वैसा ही उनका नाम भी निन्दित ही हो गया। पहला पुत्र दूतकर्मा था, दूसरा व्यभिचारी, तीसरा विषयी और चौथा नास्तिक था। संयोगसे दुर्भाग्यवश वे सभी निर्धन हो गये। एक बार वे सभी अपने पिता विष्णुशर्माके पास गये। उन लोगोंने विनयपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और कहा—‘पिताजी! हमलोगोंकी लक्ष्मी कैसे नष्ट हो गयी?’ पिताने कहा—‘दूतकर्मन्! दूतकर्म धनको नष्ट कर देता है। यह पापका मूल है। दूतकर्मसे व्यभिचार, चौर्य और निर्दयता आदि उत्पन्न होते हैं। यह महान् दुष्परिणामकारी है। दूतकर्म करनेके कारण तुम्हारे द्रव्यका नाश हुआ।’ यह सुनकर उसने कहा—‘पितृचरण! आप मुझे कृपया धन-प्राप्तिका सही मार्ग बतायें।’ पिताने कहा—‘तीर्थ और व्रतके प्रभावसे तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँगे। तुम अपने माता-पिताकी बातोंपर ध्यान दो, उनका कहना मानो।’ तदनन्तर पिताने द्वितीय पुत्रसे कहा—‘पुत्र! तुम व्यभिचारी हो। वेश्याका संग बड़ा अशुभ है। तुम इस अशुभ कर्मको त्यागकर ब्रह्मचर्यपूर्वक ब्रह्मपरायण हो। ब्रह्मचर्यव्रत धारण करो।’ तृतीय पुत्र विषयीसे कहा—‘मांस और मदिरा सदा पापकी वृद्धिके कारण हैं, इनके द्वारा तुम चौर्य-कर्म करोगे और नरकगामी होगे, इसलिये
तुम ऐश्वर्यसम्पन्न जगत्पति, सर्वोत्तम भगवान् विष्णुके निमित्त द्रव्योंको समर्पितकर मौन होकर भोजन करो’ और अपने नास्तिक पुत्रसे कहा—‘तुम देवनिन्दा आदि नास्तिकभावको छोड़कर शुद्ध आस्तिकमार्गका अवलम्बन करो, आत्मा शुद्ध-बुद्ध एवं नित्य है और महादेवी चण्डिका महाशक्ति हैं। सभी प्राणियोंके हृदय-गुहामें स्थित देवतागण परमात्माके अङ्ग हैं। उनका ज्ञान प्राप्तकर पापकी शान्तिके लिये उनकी पूजा करो।’
यह सुनकर वे चारों पुत्र अपने पिताके द्वारा निर्दिष्ट साधनोंमें प्रवृत्त हो गये और सुन्दर ज्ञानकी प्राप्तिके लिये सर्वेश्वर शिवकी आराधना भी करने लगे। भगवान् शंकरने वर्षभरमें उन्हें संजीवनी विद्या प्रदान कर दी। वे संजीवनी विद्या प्राप्त कर एक वनमें आये और वहाँ बिखरी व्याघ्रकी अस्थियोंपर विद्याकी परीक्षा करने लगे। प्रथम पुत्रने मरे हुए व्याघ्रकी अस्थियोंको एकत्र करके उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का। उस मन्त्रके प्रभावसे वे अस्थियाँ पंजररूप हो गयीं। दूसरे व्यभिचारी पुत्रने उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का, जिसके प्रभावसे वह पंजर मांस और रुधिरसे सम्पन्न हो गया। विषयी पुत्रने उसके ऊपर अभिमन्त्रित जल छिड़का। फलस्वरूप त्वचा और प्राण उसमें आ गये। सोये हुए व्याघ्रको जीवित करनेके लिये नास्तिक पुत्रने जल छिड़का। मन्त्रके प्रभावसे जीवित होनेपर उस व्याघ्रने उन सभीका भक्षण कर लिया।
वैतालने राजासे पूछा—राजन्! अब आप बतायें कि उन चारोंमें सबसे बड़ा मूर्ख कौन था? राजा बोले—जिसने मरे हुए व्याघ्रको जिलाया,
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