भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 654 में से

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पृष्ठ 303

२९२ * संक्षिप्त भविष्यपुराण * काश्यपके उपाध्याय, दीक्षित आदि दस पुत्रोंका नामोल्लेख, मगधके राजवंश और बौद्ध राजाओंका तथा चौहान और परमार आदि राजवंशोंका वर्णन

[बायाँ स्तम्भ] शौनकजीने पूछा—महाराज ! ब्रह्मावर्तमें १ म्लेच्छगण क्यों नहीं आ सके, इसका कारण बतायें। सूतजी बोले—मुने ! सरस्वतीके प्रभावसे वे सब वहाँ नहीं आ सके। वहाँ काश्यप नामके एक ब्राह्मण रहते थे। वे कलिके हजार वर्ष बीतनेपर देवताओंकी आज्ञासे स्वर्गलोकसे ब्रह्मावर्तमें आये। उनकी धर्म-पत्नीका नाम था आर्यावती। उससे काश्यपके दस पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम इस प्रकार हैं—उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य तथा चतुर्वेदी। वे अपने नामके अनुरूप गुणवाले थे। उनके पिता काश्यप, जो सभी ज्ञानोंसे समन्वित और सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता थे, उनके बीच रहकर उन्हें ज्ञान देते रहते थे। काश्यपने कश्मीरमें जाकर जगज्जननी सरस्वतीको रक्त पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य तथा पुष्पाञ्जलिके द्वारा संतुष्ट किया। देवीकी स्तुति करते हुए काश्यपने कहा— 'मातः ! शंकरप्रिये ! मुझपर आपकी करुणा क्यों नहीं होती ? देवि ! आप सारे संसारकी माता हैं, फिर मुझे जगत्‌से बाहर क्यों मानती हैं ? देवि ! देवताओंके लिये धर्मद्रोहियोंको आप क्यों नहीं मारती हैं ? म्लेच्छोंको मोहित कीजिये और उत्तम संस्कृत-भाषाका विस्तार कीजिये। अम्ब ! आप अनेक रूपोंको धारण करनेवाली हैं, हुंकारस्वरूपा हैं, आपने धूम्रलोचनको मारा है। दुर्गरूपमें आपने भयंकर दैत्योंको मारकर जगत्में सुख प्रदान किया है। मातः ! आप दम्भ, मोह तथा भयंकर गर्वका

[दायाँ स्तम्भ] नाशकर सुख प्रदान करें और दुष्टोंका नाश करें तथा संसारमें ज्ञान प्रदान करें।' इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर सरस्वतीदेवीने उन काश्यप मुनिके मनमें निवासकर उन्हें ज्ञान प्रदान किया। वे मुनि मिश्र देशमें चले गये और उन्होंने वहाँ म्लेच्छोंको मोहित कर उन्हें द्विजन्मा बना लिया। सरस्वतीके अनुग्रहसे उन लोगोंके साथ सदा मुनिवृत्तिमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ काश्यपने आर्यदेशमें निवास किया। उन आर्योंकी देवीके वरदानसे बहुत वृद्धि हुई। काश्यप मुनिका राज्यकाल एक सौ बीस वर्षतक रहा। राज्यपुत्र नामक देशमें आठ हजार शूद्र हुए। उनके राजा आर्य पृथु हुए। उनसे ही मागधकी उत्पत्ति हुई। मागध नामके पुत्रका अभिषेककर पृथु चले गये। यह सुनकर भृगुश्रेष्ठ शौनक आदि ऋषि प्रसन्न हो गये। फिर वे पौराणिक सूतको नमस्कार कर विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो गये। चार वर्षतक ध्यानमें रहकर वे उठे और नित्य-नैमित्तिक क्रियाओंको सम्पन्न कर पुनः सूतजीके पास गये और बोले— 'लोमहर्षणजी ! अब आप मागध राजाओंका वर्णन करें। किन मागधोंने कलियुगमें राज्य किया, हे व्यासशिष्य ! आप हमें यह बतायें।' सूतजीने कहा—मगध-प्रदेशमें काश्यपपुत्र मागधने पितासे प्राप्त राज्यका भार वहन किया। उन्होंने आर्यदेशको अलग कर दिया। पाञ्चाल (पंजाब)-से पूर्वका देश मगध २ देश कहा जाता है। मगधकी आग्नेय दिशामें कलिंग (उड़ीसा), दक्षिणमें अवन्तिदेश, नैर्ऋत्यमें आनर्त (गुजरात),

[पाद-टिप्पणी] १-ब्रह्मावर्त मुख्यरूपसे गङ्गाका उत्तरी भाग है, जो बिजनौरसे लेकर प्रयागतक और उत्तरमें नैमिषारण्यतक फैला है। २-यहाँसे लेकर आगे उदयाश्वतक मगधके राजवंशका वर्णन है, जिनकी राजधानी राजगृह थी।