भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 654 में से

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पृष्ठ 302
  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *

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किया। उसका पुत्र इब्र हुआ, उसने पिताके समान ही राज्य किया। उसका पुत्र फलज हुआ, जिसने दो सौ चालीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र रऊ हुआ, उसने दो सौ सैंतीस वर्षोंतक राज्य किया। उसके जूज नामक पुत्र हुआ, पिताके समान ही उसने राज्य किया। उसका पुत्र नहूर हुआ, उसने एक सौ साठ वर्षोंतक राज्य किया। हे राजन्! अनेक शत्रुओंका भी उसने विनाश किया। नहूरका पुत्र ताहर हुआ, पिताके समान उसने राज्य किया। उसके अविराम, नहूर और हारन—ये तीन पुत्र हुए।

हे मुने! इस प्रकार मैंने नाममात्रसे म्लेच्छ राजाओंके वंशोंका वर्णन किया। सरस्वतीके शापसे ये राजा म्लेच्छ-भाषा-भाषी हो गये और आचारमें अधम सिद्ध हुए। कलियुगमें इनकी संख्याकी विशेष वृद्धि हुई, किंतु मैंने संक्षेपमें ही इन वंशोंका वर्णन किया। संस्कृत-भाषा भारतवर्षमें ही किसी तरह बची रही*। अन्य भागोंमें म्लेच्छ-भाषा ही आनन्द देनेवाली हुई।

सूतजी पुनः बोले— भार्गवतनय महामुने शौनक! तीन सहस्र वर्ष कलियुगके बीत जानेपर अवन्ती नगरीमें शङ्खु नामका एक राजा हुआ और म्लेच्छ देशमें शकोंका राजा राज्य करता था। इनकी अभिवृद्धिका कारण सुनो। दो हजार वर्ष कलियुगके बीत जानेपर म्लेच्छवंशकी अधिक वृद्धि हुई और

विश्वके अधिकांश भागकी भूमि म्लेच्छमयी हो गयी तथा भाँति-भाँतिके मत चल पड़े। सरस्वतीका तट ब्रह्मावर्त-क्षेत्र ही शुद्ध बचा था। मूशा नामका व्यक्ति म्लेच्छोंका आचार्य और पूर्व-पुरुष था। उसने अपने मतको सारे संसारमें फैलाया। कलियुगके आनेसे भारतमें देवपूजा और वेदभाषा प्रायः नष्ट हो गयी। भारतमें भी धीरे-धीरे प्राकृत और म्लेच्छ-भाषाका प्रचार प्रारम्भ हुआ। त्रजभाषा और महाराष्ट्री—ये प्राकृतके मुख्य भेद हैं। यावनी और गुरुण्डिका (अंग्रेजी) म्लेच्छ-भाषाके मुख्य भेद हैं। इन भाषाओंके और भी चार लाख सूक्ष्म भेद हैं। प्राकृतमें पानीयको पानी और बुभुक्षाको भूख कहा जाता है। इसी तरहसे म्लेच्छ-भाषामें पितुको पैतर-फादर और भ्रातुको बादर-ब्रदर कहते हैं। इसी प्रकार आहुतिको आजु, जानुको जैनु, रविवारको संडे, फाल्गुनको फरवरी और षष्ठिको सिक्सटी कहते हैं। भारतमें अयोध्या, मथुरा, काशी आदि पवित्र सात पुरियाँ हैं, उनमें भी अब हिंसा होने लग गयी है। डाकू, शबर, भिल्ल तथा मूर्ख व्यक्ति भी आर्यदेश—भारतवर्षमें भर गये हैं। म्लेच्छदेशमें म्लेच्छ-धर्मको माननेवाले सुखसे रहते हैं। यही कलियुगकी विशेषता है। भारत और इसके द्वीपोंमें म्लेच्छोंका राज्य रहेगा, ऐसा समझकर हे मुनिश्रेष्ठ! आपलोग हरिका भजन करें। (अध्याय ४-५)

  • पहले संस्कृतका सम्पूर्ण विश्वमें प्रचार था। बालीद्वीपमें अब भी इसका पूरा प्रचार है तथा सुमात्रा, जावा, जापान आदिमें कुछ अंशोंमें इसका प्रचार है। बोर्निया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया और चीनमें भी इसका बहुत पहले प्रचार था। बीचमें संस्कृतकी बहुत उपेक्षा हुई, पर जर्मन, रूस और ब्रिटेनके निवासियोंके सत्प्रयाससे अब पुनः इसका सभी विश्वविद्यालयोंमें अध्यापन होने लगा है। यों कहना चाहिये कि भारतमें ही इसकी उपेक्षा हो रही है। पाश्चात्योंकी वैज्ञानिक उन्नतिमें संस्कृतका ही मुख्य योगदान रहा है। यूरोपकी गोथ-भाषा संस्कृतसे बहुत मिलती थी। सभी सभ्य भाषाओंके व्याकरणोंपर संस्कृतके व्याकरणका बहुत प्रभाव है। मोनियरविलियम तथा राजटर्नरने अपने-अपने कोशोंमें इसके अनेक अद्भुत उदाहरण उपस्थित किये हैं।

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