भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 454
  • उत्तरपर्व *

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भक्षण कर रहे हैं, पाँचवेंमें लोहेके संदेशसे उसे पीड़ित कर रहे हैं। छठेमें कोल्हूके बीच ईखके समान पेरी जा रही है और सातवें स्थानपर ताला खोलकर देखा तो वहाँ भी उसकी माताको हजारों कृमि भक्षण कर रहे हैं और वह रुधिर आदिसे लथपथ हो रही है।

यह देखकर श्यामलाने विचार किया कि मेरी माताने ऐसा कौन-सा पाप किया, जिससे वह इस दुर्गतिको प्राप्त हुई। यह सोचकर उसने सारा वृत्तान्त अपने पति धर्मराजको बतलाया।

धर्मराज बोले—‘प्रिये! मैंने इसीलिये कहा था कि ये सात ताले कभी न खोलना, नहीं तो तुम्हें वहाँ पश्चात्ताप होगा। तुम्हारी माताने संतानके स्नेहसे ब्राह्मणके गेहूँ चुराये थे, क्या तुम इस बातको नहीं जानती हो जो तुम मुझसे पूछ रही हो? यह सब उसी कर्मका फल है। ब्राह्मणका धन स्नेहसे भी भक्षण करे तो भी सात कुल अधोगतिको प्राप्त होते हैं और चुराकर खाये तो जबतक चन्द्रमा और तारे हैं, तबतक नरकसे उद्धार नहीं होता। जो गेहूँ इसने चुराये थे, वे ही कृमि बनकर इसका भक्षण कर रहे हैं।’

श्यामलाने कहा—महाराज! मेरी माताने जो कुछ भी पहले किया, वह सब मैं जानती ही हूँ, फिर भी अब आप कोई ऐसा उपाय बतलायें, जिससे मेरी माताका नरकसे उद्धार हो जाय। इसपर धर्मराजने कुछ समय विचार किया और कहने लगे—‘प्रिये! आजसे सात जन्म पूर्व तुम ब्राह्मणी थीं। उस समय तुमने अपनी सखियोंके साथ जो बुधाष्टमीका व्रत किया था, यदि उसका फल तुम संकल्पपूर्वक अपनी माताको दे दो तो इस संकटसे उसकी मुक्ति हो जायगी।’ यह सुनते ही श्यामलाने स्नानकर अपने व्रतका पुण्यफल संकल्पपूर्वक माताके लिये दान कर दिया। व्रतके

फलके प्रभावसे उसकी माता भी उसी क्षण दिव्य देह धारणकर विमानमें बैठकर अपने पतिसहित स्वर्गलोकको चली गयी और बुध ग्रहके समीप स्थित हो गयी।

राजन्! अब इस व्रतके विधानको भी आप सावधान होकर सुनें—जब-जब शुक्ल पक्षकी अष्टमीको बुधवार पड़े तो उस दिन एकभुक्त-व्रत करना चाहिये। पूर्वाह्नमें नदी आदिमें स्नान करे और वहाँसे जलसे भरा नवीन कलश लाकर घरमें स्थापित कर दे, उसमें सोना छोड़ दे और बाँसके पात्रमें पक्वान्न भी रखे। आठ बुधाष्टमियोंका व्रत करे और आठोंमें क्रमसे ये आठ पक्वान्न—मोदक, घीका अपूप, वटक, श्वेत कसारसे बने पदार्थ, सोहालक (खांडयुक्त अशोकवर्तिका) और फल, पुष्प तथा फेनी आदि अनेक पदार्थ बुधको निवेदित कर बादमें स्वयं भी अपने इष्ट-मित्रोंके साथ भोजन करे। साथ ही बुधाष्टमीकी कथा भी सुने। बिना कथा सुने भोजन न करे। बुधकी एक माशे (८ रती=एक माशा) या आधे माशेकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, पीत वस्त्र तथा दक्षिणा आदिसे उसका पूजन करे। पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—

‘ॐ बुधाय नमः, ॐ सोमात्मजाय नमः, ॐ दुर्बुद्धिनाशनाय नमः, ॐ सुबुद्धिप्रदाय नमः, ॐ ताराजाताय नमः, ॐ सौम्यग्रहाय नमः तथा ॐ सर्वसौख्यप्रदाय नमः।’

तदनन्तर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर मूर्तिके साथ-साथ वह भोज्य-सामग्री तथा अन्य पदार्थ ब्राह्मणको दान कर दे—

ॐ बुधोऽयं प्रतिगृह्णातु द्रव्यस्थोऽयं बुधः स्वयम्। दीयते बुधराजाय तुष्यतां च बुधो मम॥

(उत्तरपर्व ५४।५१)

ब्राह्मण भी मूर्ति आदि ग्रहणकर यह मन्त्र पढ़े—

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