भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
बुधः सौम्यस्तारकेयो राजपुत्र इलापतिः । कुमारो द्विजराजस्य यः पुरुरवसः पिता ॥ दुर्बुद्धिबोधदुरितं नाशयित्वावयोर्बुधः । सौख्यं च सौमनस्यं च करोतु शशिनन्दनः ॥
(उत्तरपर्व ५४।५२-५३)
इस विधिसे जो बुधाष्टमीका व्रत करता है, वह सात जन्मतक जातिस्मर होता है। धन, धान्य,
पुत्र, पौत्र, दीर्घ आयुष्य और ऐश्वर्य आदि संसारके सभी पदार्थोंको प्राप्त कर अन्त समयमें नारायणका स्मरण करता हुआ तीर्थ-स्थानमें प्राण त्याग करता है और प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। जो इस विधानको सुनता है, वह भी ब्रह्महत्यादि पापोंसे मुक्त हो जाता है१।
(अध्याय ५४)
श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीव्रतकी कथा एवं विधि
राजा युधिष्ठिरने कहा—अच्युत! आप विस्तारसे (अपने जन्म-दिन) जन्माष्टमीव्रतका विधान बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जब मथुरामें कंस मारा गया, उस समय माता देवकी मुझे अपनी गोदमें लेकर रोने लगीं। पिता वसुदेवजी भी मुझे तथा बलदेवजीको आलिङ्गित कर गद्गदावाणीसे कहने लगे—‘आज मेरा जन्म सफल हुआ, जो मैं अपने दोनों पुत्रोंको कुशलसे देख रहा हूँ। सौभाग्यसे आज हम सभी एकत्र मिल रहे हैं।’ हमारे माता- पिताको अति हर्षित देखकर बहुतसे लोग वहाँ एकत्र हुए और मुझसे कहने लगे—‘भगवन्! आपने बहुत बड़ा काम किया, जो इस दुष्ट कंसको मारा। हम सभी इससे बहुत पीड़ित थे। आप कृपाकर यह बतलायें कि आप माता देवकीके गर्भसे कब आविर्भूत हुए थे? हम सब उस दिन महोत्सव मनाया करेंगे। आपको बार-बार नमस्कार है, हम
सब आपकी शरण हैं। आप हम सभीपर प्रसन्न होइये। उस समय पिता वसुदेवजीने भी मुझसे कहा था कि अपना जन्मदिन इन्हें बता दो।’
तब मैंने मथुरानिवासी जनोंको जन्माष्टमीव्रतका रहस्य बतलाया और कहा—‘पुरवासियो! आपलोग मेरे जन्मदिनको विश्वमें जन्माष्टमीके नामसे प्रसारित करें। प्रत्येक धार्मिक व्यक्तिको जन्माष्टमीका व्रत अवश्य करना चाहिये। जिस समय सिंह राशिपर सूर्य और वृषराशिपर चन्द्रमा था, उस भाद्रपद मासकी कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको अर्धरात्रिमें रोहिणी नक्षत्रमें मेरा जन्म हुआ२। वसुदेवजीके द्वारा माता देवकीके गर्भसे मैंने जन्म लिया। यह दिन संसारमें जन्माष्टमी नामसे विख्यात होगा। प्रथम यह व्रत मथुरामें प्रसिद्ध हुआ और बादमें सभी लोकोंमें इसकी प्रसिद्धि हो गयी। इस व्रतके करनेसे संसारमें शान्ति होगी, सुख प्राप्त होगा और प्राणिवर्ग रोगरहित होगा।’
१-मत्स्यपुराणमें बुधका स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है—
पीतमल्याम्बरधरः कर्णिकारसमधृतिः। खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो वरदो बुधः ॥ (१४।४)
बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। उनकी शरीरकान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे चारों हाथोंमें क्रमशः तलवार, ढाल, गदा और वरदमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा सिंहपर सवार होते हैं।
हेमाद्रि, व्रतराज तथा जयसिंहकल्पद्रुम आदि निबन्धग्रन्थोंमें भी भविष्योत्तरपुराणके नामसे बुधाष्टमीव्रत दिया गया है, पर पाठ-भेद अधिक है। व्रतराजमें बुधके पूजनकी तथा व्रतके उद्यापनकी विधि भी भविष्योत्तरपुराणके नामसे दी गयी है। इस कथामें बुद्धि, युक्ति और विमर्श-शक्तिका भी पर्याप्त सम्मिश्रण दीखता है।
२-सिंहराशिगते सूर्य गगने जलदाकुले। मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां कृष्णपक्षेऽर्धरात्रके।
वृषराशिस्थिते चन्द्रे नक्षत्रे रोहिणीयुते ॥ (उत्तरपर्व ५५।१४)
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