भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 456
  • उत्तरपर्व *

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महाराज युधिष्ठिरने कहा— भगवन् ! अब आप इस व्रतका विधान बतलायें, जिसके करनेसे आप प्रसन्न होते हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज ! इस एक ही व्रतके कर लेनेसे सात जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। व्रतके पहले दिन दन्तधवन आदि करके व्रतका नियम ग्रहण करे। व्रतके दिन मध्याह्नमें स्नानकर माता भगवती देवकीका एक सूतिका-गृह बनाये। उसे पद्मरागमणि और वनमाला* आदिसे सुशोभित करे। गोकुलकी भाँति गोप, गोपी, घण्टा, मृदङ्ग, शङ्ख और माङ्गल्य-कलश आदिसे समन्वित तथा अलंकृत सूतिका-गृहके द्वारपर रक्षाके लिये खड्ग, कृष्ण छग, मुशल आदि रखे। दीवालोंपर स्वस्तिक आदि माङ्गलिक चिह्न बना दे। षष्ठीदेवीकी भी नैवेद्य आदिके साथ स्थापना करे। इस प्रकार यथाशक्ति उस सूतिकागृहको विभूषितकर बीचमें पर्यङ्कके ऊपर मुझसहित अर्थसुसावस्थावाली, तपस्विनी माता देवकीकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाएँ आठ प्रकारकी होती हैं—स्वर्ण, चाँदी, ताम्र, पीतल, मृत्तिका, काष्ठकी, मणिमयी तथा चित्रमयी। इनमेंसे किसी भी वस्तुकी सर्वलक्षणसम्पन्न प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। माता देवकीका स्तनपान करती हुई बालस्वरूप मेरी प्रतिमा उनके समीप पलँगके ऊपर स्थापित करे। एक कन्याके साथ माता यशोदाकी प्रतिमा भी वहाँ स्थापित की जाय। सूतिका-मण्डपके ऊपरकी भित्तियोंमें देवता, ग्रह, नाग तथा विद्याधर आदिकी मूर्तियाँ हाथोंसे पुष्प-वर्षा करते हुए बनाये। वसुदेवजीको भी सूतिकागृहके बाहर खड्ग और ढाल धारण किये चित्रित करना चाहिये। वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अवतार हैं और देवकी माता अदितिकी। बलदेवजी शेषनागके

अवतार हैं, नन्दबाबा दक्षप्रजापतिके, यशोदा दितिकी और गर्गमुनि ब्रह्माजीके अवतार हैं। कंस कालनेमिका अवतार है। कंसके पहेरदारोंको सूतिकागृहके आस-पास निद्रावस्थामें चित्रित करना चाहिये। गौ, हाथी आदि तथा नाचती-गाती हुई अप्सराओं और गन्धर्वोंकी प्रतिमा भी बनाये। एक ओर कालिय नागको यमुनाके हृदमें स्थापित करे।

इस प्रकार अत्यन्त रमणीय नवसूतिका-गृहमें देवी देवकीका स्थापनकर भक्तिसे गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, नारियल, दाडिम, ककड़ी, बीजपूर, सुपारी, नारंगी तथा पनस आदि जो फल उस देशमें उस समय प्राप्त हों, उन सबसे पूजनकर माता देवकीकी इस प्रकार प्रार्थना करे—

गायद्रिः किन्नराहैः सततपरिवृता वेणुवीणानिनादै-

भृङ्गारादर्शकुम्भप्रमरकृतकैः सेव्यमाना मुनीन्द्रैः । पर्यङ्के स्वास्तुते या मुदिततरमनाः पुत्रिणी सव्यगास्ते सा देवी देवमाता जयति सुवदना देवकी कातरूपा ॥

(उत्तरपर्व ५५।४२)

‘जिनके चारों ओर किन्नर आदि अपने हाथोंमें वेणु तथा वीणा-वाद्योंके द्वारा स्तुति-गान कर रहे हैं और जो अभिषेक-पात्र, आदर्श, मङ्गलमय कलश तथा चैवर हाथोंमें लिये श्रेष्ठ मुनिगणोंद्वारा सेवित हैं तथा जो कृष्ण-जननी भलीभाँति बिछे हुए पलँगपर विराजमान हैं, उन कमनीय स्वरूपवाली सुवदना देवमाता अदिति-स्वरूपा देवी देवकीकी जय हो।’

उस समय यह ध्यान करे कि कमलासना लक्ष्मी देवकीके चरण दबा रही हों। उन देवी लक्ष्मीकी— ‘नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।’ इस मन्त्रसे पूजा करे। इसके बाद ‘ॐ देवक्यै नमः, ॐ वसुदेवाय नमः, ॐ बलभद्राय नमः,

  • आजानुलम्बिनी ऋतु-पुष्योकी माला और पद्मराग, मुक्ता आदि पञ्चमणियोंकी माला तथा तुलसीपत्रमिश्रित विविध पुष्पोंकी मालाको भी वनमाला, जयमाला और वैजयन्ती माला कहा गया है।

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