भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें४४६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
ॐ श्रीकृष्णाय नमः, ॐ सुभद्रायै नमः, ॐ नन्दाय नमः तथा ॐ यशोदायै नमः'—इन नाम-मन्त्रोंसे सबका अलग-अलग पूजन करे।
कुछ लोग चन्द्रमाके उदय हो जानेपर चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान कर हरिका ध्यान करते हैं, उन्हें निम्नलिखित मन्त्रोंसे हरिका ध्यान करना चाहिये—
अनधं वामनं शौरिं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् । वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम् ॥ वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं ब्राह्मणप्रियम् । दामोदरं पद्मनाभं केशवं गरुडध्वजम् ॥ गोविन्दमच्युतं कृष्णामनन्तमपराजितम् । अधोक्षजं जगद्गीजं सर्गस्थित्यन्तकारणम् ॥ अनादिनिधनं विष्णुं त्रैलोक्येशं त्रिविक्रमम् । नारायणं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ पीताम्बरधरं नित्यं वनमालाविभूषितम् । श्रीवत्साङ्कं जगत्सेतुं श्रीधरं श्रीपतिं हरिम् ॥
(उत्तरपर्व ५५।४६—५०)
—इन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके 'योगेश्वराय योगसम्भवाय योगपतये गोविन्दाय नमो नमः'—इस मन्त्रसे प्रतिमाको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर 'यज्ञेश्वराय यज्ञसम्भवाय यज्ञपतये गोविन्दाय नमो नमः'—इस मन्त्रसे अनुलेपन, अर्घ्य, धूप, दीप आदि अर्पण करे। तदनन्तर 'विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वसम्भवाय विश्वपतये गोविन्दाय नमो नमः।' इस मन्त्रसे नैवेद्य निवेदित करे। दीप अर्पण करनेका मन्त्र इस प्रकार है—'धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।'
इस प्रकार वेदीके ऊपर रोहिणीसहित चन्द्रमा, वसुदेव, देवकी, नन्द, यशोदा और बलदेवजीका पूजन करे, इससे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। चन्द्रोदयके समय इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे—
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव । गृह्णाणार्घ्यं शशाङ्कन्दो रोहिण्या सहितो मम ॥
(उत्तरपर्व ५५।५४)
आधी रातको गुड़ और घीसे वसोर्धाराकी आहुति देकर षष्ठीदेवीकी पूजा करे। उसी क्षण नामकरण आदि संस्कार भी करने चाहिये। नवमीके दिन प्रातःकाल मेरे ही समान भगवतीका भी उत्सव करना चाहिये। इसके अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर 'कृष्णो मे प्रीयताम्' कहकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये और यह मन्त्र भी पढ़ना चाहिये—
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् । भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥
(उत्तरपर्व ५५।६०)
इसके बाद ब्राह्मणोंको बिदा करे और ब्राह्मण कहें—'शान्तिरस्तु शिवं चास्तु।'
धर्मनन्दन! इस प्रकार जो मेरा भक्त पुरुष अथवा नारी देवी देवकीके इस महोत्सवको प्रतिवर्ष करता है, वह पुत्र, संतान, आरोग्य, धन-धान्य, सदगृह, दीर्घ आयुष्य और राज्य तथा सभी मनोरथोंको प्राप्त करता है। जिस देशमें यह उत्सव किया जाता है, वहाँ जन्म-मरण, आवागमनकी व्याधि, अवृष्टि तथा ईति-भीति आदिका कभी भय नहीं रहता। मेघ समयपर वर्षा करते हैं। पाण्डुपुत्र! जिस घरमें यह देवकी-व्रत किया जाता है, वहाँ अकालमृत्यु नहीं होती और न गर्भपात होता है तथा वैधव्य, दौर्भाग्य एवं कलह नहीं होता। जो एक बार भी इस व्रतको करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है। इस व्रतके करनेवाले संसारके सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें विष्णुलोकमें निवास करते हैं।
(अध्याय ५५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth