भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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१३६ भोजप्रबन्धः क्रूरक्वेङ्कृतिनिर्व्हरां गिरमिह स्थाने वृथैवोद्गिर- न्मूर्ख ध्वाङ्क्ष न लज्जसेऽप्यसदृशं पाण्डित्यमुन्नाटयन्' ॥२६८॥ उसी समय उस वृक्ष की ( जिसके नीचे भोज विश्राम कर रहे थे ) एक शाखा पर काँउ-काँउ करते कौए और दूसरी डाली पर कूकती कोयल को देखकर देवजय नामक कवि ने कहा— न तो तेरे सुंदर पैर हैं और न चोंच; न मधुरी वाणी है, न लीला- मनोरम गति और न पावन पंख ही। अरे मूर्ख काक, इस स्थान पर केवल कर्कश काँउ-काँउ-भरी वाणी व्यर्थ उच्चारते और बेतुकी पंडिताई का नाट्य करते तुझे लज्जा नहीं आती ? तत एतां देवजयकविना काकमिषेण विरचितां स्वगर्हणां मन्यमान- स्तत्स्पर्द्धालुर्हरिशर्मा नाम कविः कोपेनेर्ष्यापूर्वं प्राह— 'तुल्यवर्णाच्छदः कृष्णः कोकिलैः सह सङ्गतः । केन व्याख्यायते काकः स्वयं यदि न भाषते' ॥ २६६ ॥ तब देवजय कवि द्वारा काक के व्याज से रचित इस ( पद योजना ) से अपना अपमान मानता हुआ उससे स्पर्धा करनेवाला हरिशर्मा नाम का कवि ईर्ष्या पूर्वक क्रोध से बोला— एक जैसे रंग और पंखों वाले, कोकिल कुल की संगति में रहनेवाले काले कौए को कौन पहिचान पाता यदि वह स्वयं न बोलता ? ततो राजा तयोर्हरिशर्मदेवजययोरन्योन्यवैरं ज्ञात्वा मिथ आलिङ्गना- द्विवस्त्रालङ्कारादिदानेन च मित्रत्वं व्यधात् । तो राजा ने हरिशर्मा और देवजय नामक उन कवियों का परस्पर वैर जानकर दोनों को गले मिलवा कर और वस्तु आभूषणादि देकर उनमें मित्रता करा दी । —:०:— ( २२ ) विदुषां काशीगमनम् अन्यदा राजा यानमारुह्य गच्छन्वत्र्मनि कञ्चित्तपोनिधिं दृष्ट्वा तं प्राह- 'भवादृशानां दर्शनं भाग्यायत्तम् । भवतां क्व स्थितिः । भोजनार्थं के वा प्रार्थ्यन्ते' इति ।