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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

१३६ भोजप्रबन्धः क्रूरक्वेङ्कृतिनिर्व्हरां गिरमिह स्थाने वृथैवोद्गिर- न्मूर्ख ध्वाङ्क्ष न लज्जसेऽप्यसदृशं पाण्डित्यमुन्नाटयन्' ॥२६८॥ उसी समय उस वृक्ष की ( जिसके नीचे भोज विश्राम कर रहे थे ) एक शाखा पर काँउ-काँउ करते कौए और दूसरी डाली पर कूकती कोयल को देखकर देवजय नामक कवि ने कहा— न तो तेरे सुंदर पैर हैं और न चोंच; न मधुरी वाणी है, न लीला- मनोरम गति और न पावन पंख ही। अरे मूर्ख काक, इस स्थान पर केवल कर्कश काँउ-काँउ-भरी वाणी व्यर्थ उच्चारते और बेतुकी पंडिताई का नाट्य करते तुझे लज्जा नहीं आती ? तत एतां देवजयकविना काकमिषेण विरचितां स्वगर्हणां मन्यमान- स्तत्स्पर्द्धालुर्हरिशर्मा नाम कविः कोपेनेर्ष्यापूर्वं प्राह— 'तुल्यवर्णाच्छदः कृष्णः कोकिलैः सह सङ्गतः । केन व्याख्यायते काकः स्वयं यदि न भाषते' ॥ २६६ ॥ तब देवजय कवि द्वारा काक के व्याज से रचित इस ( पद योजना ) से अपना अपमान मानता हुआ उससे स्पर्धा करनेवाला हरिशर्मा नाम का कवि ईर्ष्या पूर्वक क्रोध से बोला— एक जैसे रंग और पंखों वाले, कोकिल कुल की संगति में रहनेवाले काले कौए को कौन पहिचान पाता यदि वह स्वयं न बोलता ? ततो राजा तयोर्हरिशर्मदेवजययोरन्योन्यवैरं ज्ञात्वा मिथ आलिङ्गना- द्विवस्त्रालङ्कारादिदानेन च मित्रत्वं व्यधात् । तो राजा ने हरिशर्मा और देवजय नामक उन कवियों का परस्पर वैर जानकर दोनों को गले मिलवा कर और वस्तु आभूषणादि देकर उनमें मित्रता करा दी । —:०:— ( २२ ) विदुषां काशीगमनम् अन्यदा राजा यानमारुह्य गच्छन्वत्र्मनि कञ्चित्तपोनिधिं दृष्ट्वा तं प्राह- 'भवादृशानां दर्शनं भाग्यायत्तम् । भवतां क्व स्थितिः । भोजनार्थं के वा प्रार्थ्यन्ते' इति ।

भोजप्रबन्धः १३७ एक वार राजा ने यान पर चढ़कर जाते हुए मार्ग में किसी तपस्वी को देखकर उससे कहा--'आप जैसे तपस्वियों का दर्शन भाग्याधीन होता है । आपका ठांव कहाँ है और भोजन के निमित्त आप किनसे प्रार्थना करते हैं ? ततः स राजवचनमाकर्ण्य तपोनिधिराह-- 'फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं क्षितिरुहां पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम् । मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी सहन्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः ॥ २७० ॥ राजन्, वयं कमपि नाभ्यर्थयामः, न गृह्णीमश्च' इति । राजा तुष्टो नमति । राजा के वचन सुनकर उस तपोधन ने कहा-- 'बिना कष्ट ही वृक्षों के फल वन-वन स्वेच्छा से मिल जाते; शीतल, मधुर पुण्य नदियों का ठांव-ठांव जल हम पा जाते; लता-पल्लवों की मृदु कोमल चिकनी शय्या पर सोते हैं, कृपण व्यक्ति धनियों के द्वारे तो भी ताप-तप्त होते हैं । हे राजा, न हम किसी से प्रार्थना करते हैं, न लेते हैं।' तुष्ट हो राजा ने प्रणाम किया । तत उत्तरदेशादागत्य कश्चिद्राजानं 'स्वस्ति' इत्याह । तं च राजा पृच्छति--'विद्वन्, कुत्र ते स्थितिः' इति । तदनंतर उत्तर देश से एक विद्वान ने आकर राजा से 'स्वस्ति' कहा । राजा ने उससे पूछा--'हे विद्वान्, तुम्हारा स्थान कहाँ है ?' विद्वानाह-- 'यत्राम्बु निन्दत्यमृतमन्त्यजाश्च सुरेश्वरान् । चिन्तामणिं च पाषाणास्तत्र नो वसतिः प्रभो' । २७१ ॥ विद्वान् बोला-- जहाँ का जल अमृत से श्रेष्ठ, देवराजों-से अंत्यज दास; दिव्य चिन्तामणिसे पाषाण, वहीं है देव, हमारा वास ।

१३८ भोजप्रबन्धः तदा राजा लक्षं दत्त्वा प्राह--'काशीदेशे का विशेषवार्ता' इति । स आह- 'देव, इदानीं काचिदद्भुतवार्ता तत्र लोकमुखेन श्रुता-देवा दुः- खेन दीनाः' इति । राजा--'देवानां कुतो दुःखं विद्वन्।' तो राजा ने लाख मुद्राएँ देकर कहा-'काशी देश का क्या विशेष समाचार है ?' वह बोला--'महाराज, वहाँ लोगों के मुँह से इन दिनों विचित्र बात सुनी गयी है कि-देवगण दुःख से दीन हैं।' राजा ने कहा-'हे विद्वान, देवों को कहाँ से दुःख ?' स चाह-- निवासः क्वाद्य नो दत्तो भोजेन कनकाचलः। इति व्यग्रधियो देवा भोज वार्तेति नूतना' ॥ २७२ ॥ ततो राजा कुतूहलोक्त्या तुष्टः संस्तस्मै पुनर्लक्षं ददौ। वह बोला--'महाराज, यही तो नयी बात है। देवगण, व्यग्र हो विचार रहे हैं कि राजा भोज ने स्वर्ण गिरि सुमेरु का दान कर दिया, आज हम रहेंगे कहाँ ?' तो राजा ने इस कुतूहल पूर्ण उक्ति पर संतुष्ट हो उसे पुनः लाख मुद्राएँ दीं। ततो द्वारपालः प्राह--'देव, श्रीशैलादागतः कश्चिद्विद्वान्ब्रह्मचर्यनिष्ठो द्वारि वर्तते' इति । राजा-'प्रवेशय' इत्याह। तत आगत्य ब्रह्मचारी 'चिरं- जीव' इति वदति। राजा तं पृच्छति--'ब्रह्मन्, बाल्य एव कलिकालाननु- रूपं किं नामव्रतं ते । अन्वहमुपवासेन कृशोऽसि । कस्यचिद्ब्राह्मणस्य कन्यां तुभ्यं दापयिष्यामि, त्वं चेद्गृहस्थधर्ममङ्गीकरिष्यसि' इति । तदनंतर द्वारपाल ने कहा--'महाराज, श्री शैल से आया कोई ब्रह्मचर्य व्रतधारी विद्वान् द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा--'प्रविष्ट कराओ।' तब ब्रह्मचारी ने आकर कहा-चिरकाल जिओ।' राजा ने उससे पूछा- 'हे ब्रह्मचारिन्, बाल्यावस्था में ही कलिकाल के असदृश यह तुम्हारा कैसा व्रत है ? प्रतिदिन के उपवास से दुर्बल हो गये हो । यदि तुम गृहस्थ धर्म स्वीकारो तो किसी ब्राह्मण की कन्या से तुम्हारा विवाह करा दूँ।'

भोजप्रबन्धः १३६ ब्रह्मचारी प्राह- 'देव, त्वमीश्वरः। त्वया किमसाध्यम्। सारङ्गाः सुहृदो गृहं गिरिगुहा शान्तिः प्रिया गेहिनी वृत्तिर्वन्यलताफलैर्निवसनं श्रेष्ठं तरूणां त्वचः। तद्ध्यानामृतपूरमग्नमनसां येषामियं निर्वृति- स्तेषामिन्दुकलावतंसयमिनां मोक्षेऽपि नो न स्पृहा'॥ २७३॥ ब्रह्मचारी बोला-'महाराज, आप समर्थ हैं, आप से क्या असाध्य है? - 'हिरन-चातकादि पशु-पक्षी मित्र हैं, पर्वत की गुफा घर है, शांति प्रिय घरनी है, वन-लताओं के फल आहार हैं और वृक्षों की छाल ही निःशेष वस्त्र हैं। उनके ध्यान रूपी अमृत प्रवाह में जिनका मन मग्न रहता है और जिनका जीवन व्यापार इसी प्रकार चलता है, उन चंद्रकला के धारी शिव के व्रतधारियों को मोक्ष की भी कामना नहीं रहती।' राजोत्थाय पादयोः पतति। आह च- 'ब्रह्मन्, मया किं कर्तव्यम्' इति। स आह- 'देव, वयं काशीं जिगमिषवः। तत्त एवं विधेहि। ये त्वत्सद्मने पण्डितवरास्तान्सर्वानपि सपत्नीकान्काशीं प्रति प्रेषय। ततोऽहं गोष्ठीतृप्तः काशीं गमिष्यामि' इति। राजा तथा चक्रे। राजा उठकर पैरों पड़ा और बोला-'ब्रह्मचारिन्, मुझे क्या करने को कहते हैं? उसने कहा-'महाराज, हम काशी जाना चाहते हैं; सो ऐसा करो। तुम्हारे भवन में जो अच्छे पंडित हैं, उन सबको भी सपत्नीक काशी भेज दो। तो मैं उनकी संगति में तृप्त होता काशी पहुँच जाऊँगा।' राजा ने वैसे कर दिया। ततः सर्वे पण्डितवरास्तदाज्ञया प्रस्थिताः। कालिदास एको न गच्छति स्म। तदा राजा कालिदासं प्राह-सुकवे, त्वं कुतो न गतोऽसि' इति। ततः कालिदासो राजानं प्राह-देव, सर्वज्ञोऽसि। ते यान्ति तीर्थेषु बुधा ये शम्भोर्दूरवर्तिनः। यस्य गौरीश्वरश्चित्ते तीर्थं भोज परं हि सः'॥ २७४॥ तब सब पंडितवर राजा की आज्ञा से चले गये, एक कालिदास नहीं गया। तो राजा ने कालिदास से कहा-'हे सुकवि, तुम क्यों नहीं गये?' तो कालिदास ने राजा से कहा-'देव, आप सर्वज्ञाता हैं।

१४० भोजप्रबन्धः तीर्थ वे बुधजन जाते हैं, जो शिव से दूर रहते हैं। हे भोज, गौरी पति शिव जिसके चित्त में विराजित है, वही परम तीर्थ है।' ततो विद्वत्सु काशीं गतेषु राजा कदाचित्सभायां कालिदासं पृच्छति स्म—'कालिदास, अद्य किमपि श्रुतं किं त्वया' इति । स आह— 'मेरौ मन्दरकन्दरासु हिमवत्सानौ महेन्द्राचले. कैलासस्य शिलातलेषु मलयप्राग्भारभागेष्वपि । सह्याद्रावपि तेषु तेषु बहुशो भोज श्रुतं ते मया लोकालोकविचारचारणगणैरुद्गीयमानं यशः' ॥ २७५ ॥ ततश्चमत्कृतो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। तत्पश्चात् विद्वानों के काशी चले जाने पर एक दिन सभा में राजा ने कालिदास से पूछा--'कालिदास, आज तुमने कुछ सुना ?' उसने कहा- सुमेरु पर, मंदराचल की कंदराओं में, हिमालय के शिखरों पर, महेंद्र पर्वत पर, कैलास के शिलातलों पर, मलयाचल की ऊँची चोटियों और सह्याद्रि पर भी सर्वत्र गम्य और अगम्य स्थलों पर विचरण करते चारणों द्वारा हे भोज, मैंने बहुत बार तुम्हारा यश सुना ! चमत्कृत हो राजा ने प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। --:-- ( २३ ) शोकतप्तो राजा ततः कदाचिद्राजा विद्वद्वृन्दं निर्गतं कालिदासं चानवरतवेश्या लम्पटं ज्ञात्वा व्यचिन्तयत्--'अहह, बाणमयूरप्रभृतयो मदीयामाज्ञां व्यदधुः । अयं च वेश्यालम्पटतया ममाज्ञां नाद्रियते । किं कुर्मः' इति ततो राजा सावज्ञं कालिदासमपश्यत् । तत्पश्चात् विद्वन्मंडली को काशी गया और कालिदास को निरंतर वेश्याव्यसनी जानकर राजा ने सोचा--'अरे, बाणं, मयूर आदि ने मेरी आज्ञा का पालन किया और इस (कालिदास) ने वेश्याव्यसनी होने से मेरी आज्ञा का आदर नहीं किया। क्या किया जाय ?' तब राजा कालिदास कं अवज्ञा पूर्वक देखने लगा ।

भोजप्रबन्धः १४१ तत आत्मनि राज्ञोऽवज्ञां ज्ञात्वा कालिदासो वल्लालदेशं गत्वा तद्देशाधिनाथं प्राप्य प्राह—'देव, मालवेन्द्रस्य भोजस्यावज्ञया त्वद्देशं प्राप्तोऽहं कालिदासनामा कविः' इति । ततो राजा तमासन उपवेश्य प्राह—'सुकवे, भोजसभाया इहागतैः पण्डितैः समुदितः शतशस्ते महिमा । सुकवे, त्वां सरस्वतीं वदन्ति । ततः किमपि पठ' इति । तो अपने प्रति राजा की उपेक्षा जानकर कालिदास वल्लालदेश चला गया और वहाँ के स्वामी के पास पहुँच बोला—'महाराज, मालव के स्वामी भोज की उपेक्षा के कारण आपके देश में आया मैं कालिदास नामक कवि हूँ।' तो राजा ने उसे आसन पर बैठाकर कहा—'हे सुकवि, भोज की सभा से यहाँ आये पंडितों ने आपके महिमान का शतशः वर्णन किया है। सुकवे, वे आपको सरस्वती कहते हैं सो कुछ पढ़िए।' ततः कालिदास आह— 'वल्लालक्षोणिपाल त्वदहितनगरे सञ्चरन्ती किराती कीर्णान्यादाय रत्नान्युरुतरखदिराङ्गारशङ्काकुलाङ्गी । क्षिप्त्वा श्रीखण्डखण्डं तदुपरि मुकुलीभूतनेत्रा धमन्ती श्वासामोदानुयातैर्मधुकरनिकरैर्धूमशङ्कां विभर्ति' ॥ २७६ ॥ ततस्तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तो कालिदास ने कहा— हे वल्लाल भूमि के पालक, आपके शत्रुओं के नगर में घूमती किरात स्त्रियाँ बिखरे रत्नों को लेकर और उन्हें बड़े-बड़े कत्थे (खैर) के अंगार समझ व्याकुल हो उन पर चंदन की लकड़ी के टुकड़े रखकर आँखें आधी मूंद कर उन पर फूँकें मारती हैं; उन चंदन गंधी निःश्वासों से खिंचकर उन पर भौरों के समूह आ जाते हैं और किरातीयाँ उन्हें धुआँ समझने लगती हैं। तो राजा ने उन्हें प्रत्येक अक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं । ततः कदाचिद्वल्लालराजा कालिदासं पप्रच्छ—'सुकवे, एकशिला- नगरीं व्यावर्णय' इति । ततः कविराह— 'अपाङ्गपातैरुपदेशपूर्वैरेणीदृशामेकशिलानगर्याम् । वीथीषु वीथीषु विनापराधं पदे पदे शृङ्खलिता युवानः' ॥२७७॥

१४२ भोजप्रबन्धः पुनश्च प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। तदनंतर एक बार बल्लाल नरेश ने कालिदास से कहा - 'हे सुकवि, एक- शिला नगरी का वर्णन करो। तो कवि ने कहा-- एक शिला नगरी में मृगनयनाओं के कूटाघात पूर्वक कटाक्ष करने से गली-गली में तरुण बिना अपराध के ही पग-पग पर श्रृंखलित (जंजीर में बँधे, आकृष्ट) हो जाते हैं। राजा ने फिर से प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। पुनश्च पठति कविः-- 'अम्भोजपत्रायतलोचनानामम्भोधिदीर्घास्विह दीर्घिकासु । समागतानां कुटिलैरपाङ्गैरनङ्गवाणैः प्रहता युवानः' ॥ २७८ ॥ पुनश्च बल्लालनृपः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। एवं तत्रैव स्थितः कालिदासः। कवि ने फिर पढ़ा--- समुद्र के सदृश बड़ी-बड़ी (एक शिला की) बावडियों में आयीं कमल- पत्र के समान बड़ी-बड़ी आंखों वाली सुंदरियों के तिरछे कटाक्षों से तरुण- जन काम बाणों से पीडित होते रहते हैं। बल्लाल नरेश ने पुनः प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। इस प्रकार कालिदास वहीं रहने लगा। अत्रान्तरे धारानगर्यां भोजं प्राप्य द्वारपालः प्राह - 'देव, गुर्जरदेशा- न्माघनामा पण्डितवर आगत्य नगराद्बहिरास्ते; तेन च स्वपत्नी राजद्वारि प्रेषिता।' राजा - 'तां प्रवेशय' इत्याह। ततो माघपत्नी प्रवेशिता। सा राजहस्ते पत्रं प्रायच्छत्। इसी बीच धारा नगरी में भोज के पास पहुँच द्वारपाल ने कहा- 'महाराज, गुजरात देश से माघ नामक पंडितवर आकर नगर के बाहर स्थित है और उन्होंने अपनी पत्नी को राजद्वार पर भेजा है।' राजा ने कहा--'उन्हें प्रविष्ट कराओ।' तो माघ की पत्नी प्रविष्ट करायी गयीं। उन्होंने राजा के हाथ में पत्र दिया। राजा तदादाय वाचयति- "कुमुदवनमपश्रि श्रीमदम्भोजषण्डं त्यजति मुदमुलूकः प्रीतिमांश्चक्रवाकः ।

भोजप्रबन्धः १४३ उदयमहिमरश्मिर्याति शीतांशुरस्तं हतविधिनिहितानां ही विचित्रो विपाकः' ॥ २७६ ॥इति॥ राजा ने उसे लेकर वाँचा- कुमुदवन होता शोभा हीन और शोभा युत कमल निकुंज, कर रहा है उलूक मुद-त्याग और चकवा प्रसन्नता-युक्त उदय को प्राप्त दिवस कर सूर्य, शीतकर चंदा होता अस्त भाग्य के मारे मनुजों का हाय, कैसा है विचित्र परिणाम ! राजा तदद्भुतं प्रभातवर्णनमाकर्ण्य लक्षत्रयं दत्त्वा माघपत्नीमाह- 'मातः, इदं भोजनाय दीयते । प्रातरहं माघपण्डितमागत्य नमस्कृत्य पूर्णमनोरथं करिष्यामि' इति । ततः सा तदादाय गच्छन्ती याचकानां मुखात्स्वभर्तुः शारदचन्द्रकिरणगौरान्गुणान्श्रुत्वा तेभ्य एव धनमखिलं भोजदत्तं दत्तवती । माघपण्डितं स्वभर्तारमासाद्य प्राह-'नाथ, राज्ञा भोजेनाहं बहुमानिता । धनं सर्वं याचकेभ्यस्त्वद्गुणानार्ण्य दत्तवती ।' माघः प्राह--'देवि, साधु कृतम् । परमेते याचकाः समायान्ति किल । तेभ्यः किं देयम्' इति । राजा ने उस अद्भुत प्रभात के वर्णन को सुन तीन लाख देकर माघ की पत्नी से कहा--'माता, यह भोजनार्थ दिया जाता है। सवेरे मैं माघ पंडित के पास जा उन्हें प्रणाम कर उनके मनोरथ पूर्ण करूँगा।' तदनंतर उस धन को लेकर जाती हुई उसने याचकों से अपने पति के शरत्कालीन चंद्रमा के समान शुभ्र गुणों को सुनकर उन्हें ही भोजका दिया समस्त धन दे डाला । अपने भर्त्ता माघ पंडित के निकट पहुँच बोली---'स्वामी, राजा भोज ने मेरा बहुत सम्मान किया; परंतु आपके गुणों को सुनकर मैंने याचकों को सब धन दे दिया।' माघ ने कहा-'देवि, अच्छा किया । परन्तु ये याचक चले आ रहे हैं, इन्हें क्या दिया जाय ? ततो माघपण्डितं वस्त्रावशेषं ज्ञात्वा कोऽप्यर्थी प्राह-- 'आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्त- मुद्द्दामदावविधुराणि च काननानि ।

१४४ भोजप्रबन्धः नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा रिक्तोऽसि यज्जलद सैव तवोत्तमाश्रीः' ॥ २८० ॥ तो माघ पंडित को वस्त्रमात्रधारी जानकर एक याचक ने कहा-- ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से तपे पर्वतों को दे आश्वासन, तीक्ष्णदावानल से झुलसे लहलहाकार सब कानन-वन, पूर्ण करके नद-नदी अनेक हुए हो रीते तुम वादल, तुम्हारी यही उत्तमा श्री और शोभा है यही विमल। इत्येतदाकर्ण्य माघः स्वपत्नीमाह--'देवि, अर्था न सन्ति न च मुञ्चति मां दुराशा त्यागे रतिं वहति दुर्ललितं मनो मे । याच्ञा च लाघवकरी स्ववधे च पापं प्राणाः स्वयं व्रजत किं परिदेवनेन ॥ २८१ ॥ यह सुनकर माघ ने अपनी पत्नी से कहा--'देवि, अर्थ नहीं है, पर न छोड़ती मुझे दुराशा, मेरा मन दुर्ललित त्याग का ही प्रेमी है। और याचना छोटा करती; पाप स्ववध में, प्राणों, स्वयं चले जाओ; रोना निष्फल है। दारिद्र्यानलसन्तापः शान्तः सन्तोषवारिणा । याचकाशाविघातान्तर्दाहः केनोपशाम्यति' ॥ २८२ ॥ इति ॥ हुआ दारिद्र्य-अनल का ताप शांत संतोष-शीत जल से याचकों की आशा के घात से हुआ जो है अंतर्दाह, किस तरह होगा वह अब शांत ?' ततस्तदा माघपण्डितस्य तामवस्थां विलोक्य सर्वे याचका यथा- स्थानं जग्मुः । एवं तेषु याचकेषु यथायथं गच्छत्सु माघः प्राह-- 'व्रजत व्रजत प्राणा अर्थिभिर्व्यर्थतां गतैः । पश्चादपि च गन्तव्यं क्व सोऽर्थः पुनरीदृशः' ॥ २८३ ॥ इति विलपन्माघपण्डितः परलोकमगात् । तो माघ पंडित की उस अवस्था को देख उस समय वे सब याचक चले गये। उन याचकों को यथा स्थान जाते देख माघ ने कहा-

जाओ-जाओ मेरे प्राणो, याचक खाली हाथ गये; फिर पीछे भी जाना होगा, तब क्या होगा व्यर्थ गये ? इस प्रकार विलाप करते--करते माघ पंडित परलोक गये । ततो माघपत्नी स्वामिनि परलोकं गते सति प्राह-- 'सेवन्ते स्म गृहं यस्य दासवद्भूभुजः सदा । स स्वभार्यासहायोऽयं म्रियते माघपण्डितः' ॥ २८४ ॥ तब स्वामी के परलोक जाने पर माघ पत्नी ने कहा-- जिनके घर सदा राजागण दास के समान सेवा करते थे, वे माघ पंडित केवल पत्नी को सहायिका रूप में प्राप्त कर मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं । ततो राजा माघं विपन्नं ज्ञात्वा निजनगराद्विप्रशतादृतो मौनी रात्रा- वेव तत्रागात् । ततो माघपत्नी राजानं वीक्ष्य प्राह—'राजन्, यतः पण्डि- तवरस्त्वद्देशं प्रातः परलोकमगात्, ततोऽस्य कृत्यशेषं सम्यगाराधनीयं भवता' इति । ततो राजा माघं विपन्नं नर्मदातीरं नीत्वा यथोक्तेन वि- धिना संस्कारमकरोत् । तत्र च माघपत्नी वह्नौ प्रविष्टा । तयोश्च पुत्रवत्सर्वं चक्रे भोजः । तो माघ को विपद्-ग्रस्त ( मृत ) जानकर सौ ब्राह्मणों के साथ मौन धारण किये राजा अपने नगर से रात में ही वहाँ पहुँचा । तो माघ की पत्नी ने राजा को देखकर कहा--'हे राजा. क्योंकि पंडितवर ( माघ ) आपके देश में आकर ही परलोक सिधारे, सो इनका शेष कर्म आपको ही भली भाँति करना चाहिए ।' सो राजा ने मृत माघ को नर्मदा के किनारे ले जाकर शास्त्रोक्त विधि के अनुसार संस्कार किया । तदनंतर माघ की पत्नी भी अग्नि में प्रविष्ट हो गयीं । उन दोनों के सब संस्कार पुत्र की भाँति भोज ने किये ! ततो माघे दिवं गते राजा शोकाकुलो विशेषेण कालिदासवियोगेन च पण्डितानां प्रवासेन कृशोऽभूद्दिने दिने बहुलपक्षशशीव । ततोऽमात्यै- र्मिलित्वा चिन्तितम्—'वल्लालदेशे कालिदासो वसति । तस्मिन्नागते १० भोज०

१४६ भोजप्रबन्धः राजा सुखोभविष्यति' इति। एवं विचार्यामात्यैः पत्रे किमपि लिखित्वा तत्पत्रं चैकस्यामात्यस्य हस्ते दत्वा प्रेषितम्। स कालक्रमेण कालिदास- मासाद्य 'राज्ञोऽमात्यैः प्रेषितोऽस्मि' इति नत्वा तत्पत्रं दत्तवान्। तब फिर माघ के दिवंगत होने और विशेष रूप में कालिदास के वियोग और पंडितों के प्रवास के कारण शोक में व्याकुल राजा प्रतिदिन कृष्ण पक्ष में चंद्रमा के समान क्षीण होने लगा। तो मंत्रियों ने मिलकर सोचा--'कालिदास वल्लालदेश में वास कर रहे हैं। उनके आने पर ही राजा सुखी होंगे।' ऐसा विचार कर मंत्रियों ने पत्र में कुछ भी लिखा और उस पत्र को एक मंत्री के हाथ में देकर भेजा। वह यथा समय कालिदास के पास पहुँचा और 'मुझे राजा के मंत्रियों ने भेजा है' यह कह उसने प्रणाम करके वह पत्र कालिदास को दिया। ततस्तत्कालिदासो वाचयति- न भवति स भवति न चिरं भवति चिरं चेत्फले विसंवादी। कोपः सत्पुरुषाणां तुल्यः स्नेहेन नीचानाम् ॥ २८५ ॥ वह (प्रथम तो) होता नहीं, और होता है तो चिरकाल तक नहीं रहता और यदि चिरकाल तक रहता है तो इसका फल उलटा होता है; इस प्रकार सज्जनों का क्रोध नीचों के स्नेह के तुल्य होता है। सहकारे चिरं स्थित्वा सलीलं बालकोकिल। तं हित्वाद्यान्यवृक्षेषु विचरन्न विलज्जसे ॥ २८६ ॥ हे बाल कोकिल, बहुत दिनों तक आनंद-उल्लास के साथ आम के वृक्ष पर निवास करके, उसे छोड़कर आज तुम और वृक्षों पर विचरण करते लजाते नहीं? कलकण्ठ यथा शोभा सहकारे भवद्गिरः। खदिरे वा पलाश वा किं तथा स्याद्विचारय ॥ २८७ ॥ इति। तुम्हारे सुंदर कंठ और मधुरीवाणी की जो शोभा आम्र वृक्ष पर थी; विचार करो कि क्या वैसी शोभा कत्थे अथवा ढाक के पेड़ पर हुई? ततः कालिदासः प्रभाते तं भूपालमापृच्छद्य मालवदेशमागत्य राज्ञः क्रीडोद्याने तस्थौ। ततो राजा च तत्रागतं ज्ञात्वा स्वयं गत्वा महता

परिवारेण तमानीय सम्मानितवान् । ततः क्रमेण विद्वन्मण्डले च समा- याते सा भोजपरिषद्रागिव रेजे । तब फिर प्रातः काल कालिदास ने बल्लाल भूपाल से अनुमति ली और मालव देश में आकर राजा की क्रीडावाटिका में ठहर गया। तब वहां उसे आया जान राजा अपने बड़े परिवार के साथ स्वयं जाकर उसे ले आया और उसका संमान किया। फिर धीरे-धीरे विद्वन्मंडली के आ जाने पर वह भोज की सभा पहिले की भाँति सुशोभित हो गयी। :---:०:---: ( २४ ) काव्यक्रीडा ततः सिंहासनमलङ्कुर्वाणं भोजं द्वारपाल आगत्य प्रणम्याह—'देव, कोऽपि विद्वाञ्जालन्धरदेशादागत्य द्वार्यास्ते' इति । राजा—'प्रवेशय' इ- त्याह । स च विद्वानागत्य सभायां तथाविधं राजानं जगन्मान्यान्कालि- दासादीन्कविपुङ्गवान्वीक्ष्य बद्धजिह्व इवाजायत । सभायां किमपि तस्य मुखान्न निःसरति । तदा राज्ञोक्तम्—'विद्वन्, किमपि पठ' इति । तत्पश्चात् सिंहासन को सुशोभित करते भोज से द्वारपाल आकर और प्रणाम करके बोला—'महाराज, जालंधर देश से एक विद्वान् आकर द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' वह विद्वान् सभा में आया और उस प्रकार के राजा और जगन्मान्य कालिदास आदि कवि श्रेष्ठों को देख मानो उसकी जीभ ही बँध गयी। सभा में उसके मुंह से कुछ निकला ही नहीं। तो राजा ने कहा—'हे पंडित, कुछ पढ़ो।' स आह— आरनालगलदाहशङ्कया सन्मुखादपगता सरस्वती । तेन वैरिकमलाकरग्रहव्यग्रहस्त न कवित्वमस्ति मे ॥ २८८ ॥ राजा तस्मै महिषीशतं ददौ । वह बोला—तीखी-खट्टी, पतली लपसी पीने से गला जल जाने की आशंका से सरस्वती मेरे मुख से निकल गयीं; हे शत्रु-लक्ष्मी के केश-ग्रह में व्यग्र हाथों वाले महाराज, इस कारण मुझ में कवित्व-नहीं रहा। राजा ने सौ भैंसें दीं। :--:--:

४. दानशीलता, नीति-सुभाषित व उपसंहार

१४८ भोजप्रबन्धः अन्यदा राजा कौतुकाकुलः सीतां प्राह—'देवि, सुरतं पठ' इति। सीता प्राह— सुरताय नमस्तस्मै जगदानन्दहेतवे। आनुषङ्गि फलं यस्य भोजराज भवादृशाम् ॥ २८६ ॥ ततस्तुष्टो राजा तस्यै हारं ददौ। किसी दूसरी वार कौतुक में भर कर राजा ने सीता से कहा—देवि, सुरत का वर्णन करो।' सीता ने कहा— जगदानंदसुहेतु सुरत को नमस्कार है, जिसके गौणफल भोज, आप जैसे जनमें हैं। (जगत् के आनंद के कारण स्वरूप सुरत को नमस्कार है, जिसका गौण फल हे मोजराज, आप जैसों की उत्पत्ति है।) तुष्ट होकर राजा ने उसे हार दे दिया। ततो राजा चामरग्राहिणीं वेश्यामवलोक्य कालिदासं प्राह-'सुकवे, वेश्यामेनां वर्णय' इति। तामवलोक्य कालिदासः प्राह— 'कचभारात्कुचभारः कुचभाराद्भीतिमेति कचभारः। कचकुचभाराज्जघनं कोऽयं चन्द्रानने चमत्कारः' ॥ २६० ॥ तत्पश्चात् चँवर डुलाने वाली वेश्या को देखकर राजा ने कालिदास से कहा—'हे सुकवि, इस वेश्या का वर्णन करो।' उसे देख कालिदास ने कहा— केशों के बोझ से स्तनों का भार और स्तन भार से केशों का भार डर रहा है और केश और कुच--इन दोनों के भार से जघन स्थल डर रहा है; हे चंद्रमुखी, यह कैसा चमत्कार है। भोजस्तुष्टः सन्स्वयमपि पठति-- 'वदनात्पदयुगलीयं वचनादधरश्च दन्तपङ्क्तिश्च। कचतः कुचयुगलीयं लोचनयुगलं च मध्यतस्त्रसति' ॥ २६१ ॥ संतुष्ट होकर भोज ने स्वयं भी पढ़ा:— मुख से दोनों पैर और वचन से ओठ और दांत डर रहे हैं और केशों से दोनों कुच; और मध्य भाग (कमर) से दोनों नेत्र डर रहे हैं। —:०:—

· भोजप्रबन्धः १४६

( २५ ) अदृष्टपरहृदयबोद्धा कालिदासः अन्यदा भोजो राजा धारानगर एकाकी विचरन्कस्यचिद्विप्रवरस्य गृहं गत्वा तत्र काञ्चन पतिव्रतां स्वाङ्के शयानं भर्तारमुद्वहन्तीमपश्यत्। ततस्तस्याः शिशुः सुप्तोत्थितो ज्वालायाः समीपमगच्छत् । इयं च पति- धर्मपरायणा स्वपतिं नोत्थापयामास। ततः शिशुं च वह्नौ पतन्तं ना- गृहात्। राजा चाश्चर्यमालोक्यातिष्ठत् । दूसरी बार धारा नगर में राजा अकेले विचरण करते हुए किसी ब्राह्मण श्रेष्ठ के घर पहुँच गया; वहां उसने एक पतिव्रता नारी को अपनी गोद में सिर धर सोये स्वामी को लिये हुए देखा। तभी उसका छोटा बच्चा सोते से जाग कर जलती आग के पास जा पहुँचा। उस पतिधर्म परायणा (पति-सेवा में लगी) ने अपने पति को (गोद से) नहीं हटाया। आग में गिरते बच्चे को भी नहीं पकड़ा। राजा यह अनोखी बात देखकर रुक गया। ततः सा पतिधर्मपरायणा वैश्वानरमप्रार्थयत्—'यज्ञेश्वर ! त्वं सर्वकर्मसाक्षी सर्वधर्मज्ञानासि। मां पतिधर्मपराधीनां शिशुमगृह्णन्तीं च जानासि। ततो मदीयेशिशुमनुगृह्य त्वं मा दह' इति। ततः शिशुर्ये- ज्ञेश्वरं प्रविश्य तं च हस्तेन गृहीत्वार्धघटिकापर्यन्तं तत्रैवातिष्ठत् । तब उस पति धर्म का पालन करती नारी ने अग्नि देव से प्रार्थना की— 'हे यज्ञ के स्वामी, सब कर्मों के देखने वाले आप सब धर्मों के ज्ञाता हैं। पति धर्म का पालन करने से पराधीन हुई मैं अपने बच्चे को नहीं पकड़ पा रही हूँ— यह भी जानते हैं। तो मेरे बच्चे पर अनुग्रह करके आप इसे न जलायें।' तो वह बच्चा अग्नि में प्रविष्ट होकर और उसे हाथ से पकड़ कर घड़ी भर वहीं रहा। ततो नारोदीत्प्रसन्नमुखश्च शिशुः, सा च ध्यानारूढातिष्ठत् । ततो यदृच्छया समुत्थिते भर्तरि सा झटिति शिशुं जग्राह च परं धर्ममालोक्य विस्मयाविष्टो नृपतिराह—'अहो, मम समं भाग्यं कस्यास्ति, यदीदृश्यः पुण्यस्त्रियोऽपि मन्नगरे वसन्ति' इति।

१५० भोजप्रबन्धः तो वह बच्चा रोया नहीं और प्रसन्न मुख रहा और वह स्त्री ध्यान में लीन रही । तदनंतर स्वेच्छया स्वामी के जाग उठने पर उसने झट से बच्चे को ले लिया । धर्म की उस परमता को देख आश्चर्य में पड़े नरपति ने कहा—'अरे, मेरे जैसा भाग्य किसका है कि ऐसी पुण्यस्त्रियां मेरे नगर में निवास करती हैं !' ततः प्रातः सभायामागत्य सिंहासन उपविष्टो राजा कालिदासं प्राह—'सुकवे, महदाश्चर्यं मया पूर्वेद्यू रात्रौ दृष्टमस्ति' इत्युक्त्वा राजा पठति—'हुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः' । तत्पश्चात् प्रातः काल सभा में आकर सिंहासन पर बैठे राजा ने कालिदास से कहा--'हे सुकवि, बीती रात मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा है;' यह कहकर राजा ने पढ़ा—'चंदन-लेप-समान सुशीतल आग हो गयी ।' कालिदासस्ततश्चरणत्रयं झटिति पठति— 'सुतं पतन्तं प्रसमीक्ष्य पावके न बोधयामास पतिं पतिव्रता । तदाभवत्तत्पतिभक्तिगौरवाद्वहुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः' ॥ २६२ ॥ राजा च स्वाभिप्रायमालोक्य विस्मितस्तमालिङ्गय पादयोः पतति स्म । तो कालिदास ने झट से श्लोक के शेष तीन चरण पढ़ दिये-- 'बच्चा गिरता देख आग में पतिव्रता ने पति को नहीं जगाया । रखने को पति-भक्ति-मान चंदन-लेप समान सुशीतल आग हो गयी । और अपना अभिप्राय पूर्ण देख राजा ने विस्मित हो उसका आलिंगन किया और चरणों में गिर पड़ा । एकदा ग्रीष्मकाले राजान्तःपुरे विचरन्धर्मतापतप्त आलिङ्गनादिकम- कुर्वंस्ताभिः सह सरससंलापाद्युपचारमनुभूय तत्रैव सुप्तः । ततः प्रातरु- त्थाय राजा सभां प्रविष्टः कुतूहलात्पठति— 'मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव ।' एक बार ग्रीष्म ऋतु में राजा रनिवास में विचर रहा था; ग्रीष्म ऋतु की धूप के ताप से तप्त होने के कारण आलिंगन-आदि न करके वह रानियों से रस पूर्ण वार्तालाप आदि में आनन्द उठाता वहीं सो गया । फिर प्रातःकाल उठकर सभा में पहुँच कर राजा ने कुतूहल के कारण पढ़ा—

जब हवा वहने की वात तक नहीं थी, ऐसे समय में भी बढ़ाया ही। भवभूतिराह— 'उरगी शिशवे क्षुधुक्षवे स्वामदिशत्फूत्कृतिमाननानलेन। मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव' ॥ २६३ ॥ राजा प्राह— 'भवभूते, लोकोक्तिः सम्यगुक्ता' इति। भवभूति ने कहा— नागिन ने भूखे बच्चे को मुँह की श्वास-वायु से अपनी फुंकारी दी। जब हवा बहने की बात तक नहीं थी, ऐसे समय में भी बढ़ाया ही। (अर्थात् वायु-पान कराके अपने बच्चे का पालन-पोषण किया)। राजाने कहा— 'हे भवभूति, आपने अच्छी लोकोक्ति कही।' ततोऽपाङ्गेन राजा कालिदासं पश्यति। ततः स आह— 'अबलासु विलासीनोऽभवन्नयनैरेव नवोपगूहनानि। मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव' ॥ २६४ ॥ तदा राजा स्वाभिप्रायं ज्ञात्वा तुष्टः कालिदासं विशेषेण सम्मानितवान्। तब फिर राजा ने कनखी से कालिदास को संकेत दिया। तो उसने कहा— विलासी व्यक्तियों ने नेत्रों से ही नारियों में नवीन आलिंगन का अनुभव किया। जब हवा बहने की बात तक नहीं थी, ऐसे समय में भी बढ़ाया ही। (अर्थात् आनंद-वृद्धि की।) तो राजा अपना अभिप्राय समझ कर संतुष्ट हुआ और कालिदास को विशेष रूप से संमानित किया। अन्यदा मृगयापरवशो राजात्यन्तमार्तः कस्यचित्सरोवरस्य तीरे निविडच्छायस्य जम्बूवृक्षस्य मूलमुपाविशत्। तत्र शयाने राज्ञि जम्बो- रुपरि बहुभिः कपिभिर्जम्बूफलानि सर्वाण्यपि चालितानि। तानि सशब्दं पतितानि पश्यन्घटिकामात्रं स्थित्वा श्रमं परिहृत्य उत्थाय तुरङ्गमवर- मारुह्य गतः। एक और बार आखेट में लीन हो राजा अत्यंत थक कर किसी तालाब के किनारे घनी छायादार जामुन के पेड़ के नीचे बैठा था। वहाँ लेटे राजा पर जामुन के ऊपर के बहुत-से बंदरों ने सभी जामुनें झाड़ डालीं। एक घड़ी

१५२ भोजप्रबन्धः तक उन जामुनों को 'गुड़् प्-गुड़् प्' करके गिरती देखता राजा थकावट वीत जाने पर उठकर घोड़े पर चढ़ चला गया । ततः सभायां राजा पूर्वानुभूतकपिचलितफलपतनरवमनुकुर्वन्सम- स्यामाह- 'गुलुगुग्गुलुगुग्गुलु' । तत आह कालिदासः- 'जम्बूफलानि पक्वानि पतन्ति विमले जले । कपिकम्पितशाखाभ्यो गुलुगुग्गुलुगुग्गुलु' ॥ २६५ ॥ तो सभा में पहिले अनुभूत बंदरों द्वारा झाड़ी जाने से हुए जामुनों के गिरने के ( 'गुड़् प्-गुड़् प्' ) शब्द का अनुकरण करते हुए राजा ने एक समस्या कही- 'गुलुगुग्गुलुगुग्गलु' । तो कालिदास ने कहा- वानरदल के द्वारा कंपित शाखाओं से निर्मल जल में-पके हुए गिरते जंबूफल 'गुलु गुग्गुलु-गुग्गुलुगुग्गुलु ।' राजा तुष्ट आह- 'सुकवे, अदृष्टमपि परहृदयं कथं जानासि । साक्षा- च्छारदासि' इति मुहुर्मुहुः पादयोः पतति स्म । संतुष्ट हो राजा ने कहा- 'हे सुकवि, तुम अनदेखे भी दूसरे के हृदय को कैसे जान लेते हो ? तुम साक्षात् शारदा हो,' और पैरों पर गिर पड़ा । एकदा धारानगरे प्रच्छन्नवेषो विचरन्कस्यचिद्वृद्धब्राह्मणस्य गृहं राजा मध्याह्नसमये गच्छंस्तत्र तिष्ठति स्म । तदा वृद्धविप्रो वैश्वदेवं कृत्वा काकवलिं गृह्णन्गृहान्निर्गत्य भूमौ जलशुद्धायां निक्षिप्य काकमाह्वयति स्म । तत्र हस्तचिस्फोटालनेन हाहेतिशब्देन च काकाः समायाताः । तत्र कश्चित्का- कस्तारं रारटीति स्म । तच्छ्रुत्वा तत्पत्नी तरुणी भीतेव हस्तं निजोरसि निधाय 'अये मातः' इति चक्रन्द । एक बार धारा नगर में गुप्त वेष में विचरण करता हुआ राजा किसी ब्राह्मण के घर में दोपहरी के समय जाते हुए ठहरा हुआ था । उस समय बूढ़ा ब्राह्मण 'वैश्वदेव' ( देवताओं के निमित्त प्रातः सायम्, विशेषतः मध्याह्न समर्पित खाद्य सामग्री-वलिवैश्वदेव कर्म ) करके कौओं के निमित्त वलि लेकर घर से निकला और ( वलि को ) जल से स्वच्छ की गई भूमि पर रखकर कौए को बुलाने लगा । तालियां बजाने और

भोजप्रबन्धः १५३

'हाउ-हाउ' शब्द करने से वहां कौए आ गये । उनमें एक कौआ बड़े जोर से 'कांव-कांव' करने लगा । उसे सुन बूढ़े ब्राह्मण की तरुणी पत्नी जैसे डर कर हाथ को अपनी छाती पर रख चिल्ला पड़ी—'हाय मैया !'।

ततो ब्राह्मणः प्राह—'प्रिये साधुशीले, किमर्थं बिभेषि'—इति। सा प्राह—'नाथ ! मादृशीनां पतिव्रतास्त्रीणां कर्कशनिश्रवणं न सह्यम् । 'साधुशीले, तथा भवेदेव' इति विप्र आह।

तो ब्राह्मण बोला-'भली-भोली प्यारी, क्यों डर रही हो?' वह बोली— 'स्वामी, मुझ जैसी पतिव्रता स्त्रियों से कर्कश शब्द सुनना सहा नहीं जाता।' ब्राह्मण ने कहा—'हे सुचरिते, ऐसा तो होता ही रहता है।'

ततो राजा तच्चरितं सर्वं दृष्ट्वा व्यचिन्तयत्—'अहो, इयं तरुणी दुःशीला नूनम् । यतो निर्व्याजं बिभेति । स्वपातिव्रत्यं स्वयमेव कीर्तयति च । नूनमियं निर्भीका सती अत्यन्तं दारुणं कर्म रात्रौ करोत्येव । एवं निश्चित्य राजा तत्रैव रात्रावन्तर्हित एवातिष्ठत् ।

तो उसका सारा आचरण देख कर राजा ने विचारा—'अरे, निश्चय ही यह तरुणी दुष्ट चरित्र की है; क्योंकि अकारण ही डर रही है और अपने पातिव्रत का स्वयम् ही कीर्तन कर रही है । निश्चय ही यह निर्भय होकर रात में अत्यंत कठोर कर्म करती ही होगी।' ऐसा निश्चय करके राजा वहीं रात को छिप कर रह गया ।

अथ निशीथे भर्त्तरि सुप्ते सा मांसपेटिकां वेश्याकरेण वाहयित्वा नर्मदातीरमगच्छत् । राजाप्यात्मानं गोपयित्वानुगच्छति स्म । ततः सा नर्मदां प्राप्य तत्र समागतानां ग्राहाणां मांसं दत्त्वा नदीं तीर्त्वा परतीरस्थेन शूलाग्रारोपितेन स्वमनोरमेण सह रमते स्म ।

इसके बाद रात में पति के सो जाने पर वह मांस की पिटारी को एक वेश्या के हाथों उठवाकर नर्मदा के किनारे पहुँची । अपने को छिपाये राजा ने भी उसका पीछा किया । तदनंतर वह नर्मदा में पैठी और वहां आये मगर- मच्छों को मांस देकर नदी पार कर दूसरे किनारे पर स्थित सूली की नोक पर चढ़ाये गये अपने मनचीते पुरुष के साथ रमण करने लगी ।

१५४ भोजप्रबन्धः तच्चरित्रं दृष्ट्वा राजा गृहं समागत्य प्रातः सभायां कालिदासमालोक्य प्राह—'सुकवे, शृणु— 'दिवा काकरुताद्भीता' ततः कालिदास आह— 'रात्रौ तरति नर्मदाम्' । ततस्तुष्टो राजा पुनः प्राह— 'तत्र सन्ति जले ग्राहाः' ततः कविराह— 'मर्मज्ञा सैव सुन्दरी' ॥ २६६ ॥ ततो राजा कालिदासस्य पादयोः पतति । उसका चरित्र देख घर पहुँच कर राजाने सबेरे सभा में कालिदास को देखकर कहा—'हे सुकवे, सुनो— 'डरती दिन में 'कांव-कांव' से' तो कालिदासने कहा— 'तैर नर्मदा जाती रात ।' तब संतुष्ट हो राजाने फिर कहा— 'पानी में हैं मगर वहाँ तो' तो कवि ने कहा— 'मर्म सुंदरी को सब ज्ञात' तो राजा कालिदास के पैरों-पड़ा । एकदा धारानगरे विचरन्वेश्यावीथ्यां राजा कन्दुकलीलातत्परां तद्भ्र- मणवेगेन पादयोः पतितावतंसां काञ्चन सुन्दरीं दृष्ट्वा सभायामाह— 'कन्दुकं वर्णयन्ते कवयः' इति । एक बार धारानगर में वेश्या-गली में घूमते राजा ने कंदुकक्रीड़ा में लीन और उसके घूमने के वेग से जिसके कान का आभूषण पैरों पर गिर गया था, ऐसी, एक सुंदरी को देखकर सभा में कहा—'कविजन, कंदुक का वर्णन करें।' तदा भवभूतिराह—

भोजप्रबन्धः १५५ 'विदितं ननु कन्दुक ते हृदयं प्रमदाधरसङ्गमलुब्ध इव । वनिताकरतामरसाभिहतः पतितः पतितः पुनरुत्पतसि' ॥ २६७ ॥ तो भवभूति ने कहा- हे कंदुक, तुम्हारे हृदय की भावना ज्ञात ही है--तुम सुंदरी के अधर का संग करने के लोभी प्रतीत होते हो, इसी से सुंदरी के कर कमल से ताडित होने पर गिर-गिर कर पुनः पुनः उछलते हो । ततो वररुचिः प्राह- एकोऽपि त्रय इव भाति कन्दुकोऽयं कान्तायाः करतलरागरक्तरक्तः । भूमौ तच्चरणनखांशुगौरगौरः स्वस्थः सन्नयनमरीचिनीलनीलः' ॥ २६८ ॥ तब वररुचि ने कहा- सुंदरी की हथेली की लालिमा से लाल-लाल, धरती पर गिरा होने की अवस्था में उसके चरण-नखों के किरणजाल से शुभ्र और सामान्य स्थिति में आँखों की पुतलियों की नीलिमा से नीला-नीला-यह कंदुक एक होने पर भी तीन जैसा प्रतीत होता है। ततः कालिदास आह- 'पयोधराकारधरो हि कन्दुकः करेण रोषादभिहन्यते मुहुः । इतीव नेत्राकृतिभीतमुत्पलं स्त्रियः प्रसादाय पपात पादयो.' ॥ २६६ ॥ तब कालिदास ने कहा- क्योंकि इस कंदुक ने सुंदरी के पयोधरों का आकार-धारण किया, अतएव बार-बार यह उस सुंदरी के कर-द्वारा रोष के कारण ताडित किया जाता है। इसी से यह नयनों के आकार से डरे कमल के समान कर्ण भूषण सुंदरी को प्रसन्न करने के निमित्त पैरों पर गिर पड़ा है। तदा राजा तुष्टस्त्रयाणामक्षरलक्षं ददौ । विशेषेण च कालिदासम्- दृष्टावतंसकुसुमपतनयोद्धारं सम्मानितवान् । तब राजा ने संतुष्ट होकर तीनों को प्रत्यक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं ।