भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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२०४ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर आमदनी की वृद्धि करता है तथा कठिन परिश्रम द्वारा पर्याप्त धन भी उपार्जित करता है। कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है परन्तु अन्त में विशेष सफलता भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति थोड़े लाभ से सन्तुष्ट रहकर भी विशेष लाभ के लिए नित नई योजनाएं बनाता रहता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है और इसी कारण उसे कभी-कभी बड़ी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है। उसे बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। गुप्त युक्तियों, परिश्रम तथा चातुर्य के बल पर वह अपना खर्च चलाता है तथा बाहरी लोगों की दृष्टि में वह प्रभावशाली बना रहता है। 'मिथुन' लग्न में 'केतु' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक में शारीरिक सौंदर्य में कमी रहती है। वह गुप्त चिंताओं, रोग, चोट आदि का शिकार बनता रहता है। गुप्त युक्तियों तथा शारीरिक परिश्रम के बल पर वह अपने स्वार्थों की पूर्ति करता है। विवेकी होने पर भी उसमें स्वाभिमान कम होता है।