भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०५ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ता-ग्रस्त बना रहता है। धन-संचय न हो पाने से कभी-कभी अत्यधिक कष्ट पाता है तथा कौटुम्बिक कारणों से मानसिक क्लेश का शिकार भी होता है। वह धैर्य, साहस एवं गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर ही अपनी कठिनाइयों पर थोड़ी-बहुत विजय प्राप्त कर पाता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : तृतीय भाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आ जाती है। वह अपने पराक्रम-विषयक कारणों से ही परेशानी उठाता है। ऐसा जातक बड़ा दम्मी, हिम्मती, हठी, बहादुर तथा साहसी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक घरेलू सुखों की पाने के लिए बड़ी चतुराई का आश्रय लेकर सफल होता है। भूमि तथा भवन का सुख भी कुछ कमी के साथ मिलता है। अपने गुप्त साहस एवं धैर्य के बल पर अन्त में उसे सुख-प्राप्ति में सफलता भी मिलती है।