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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२०५ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ता-ग्रस्त बना रहता है। धन-संचय न हो पाने से कभी-कभी अत्यधिक कष्ट पाता है तथा कौटुम्बिक कारणों से मानसिक क्लेश का शिकार भी होता है। वह धैर्य, साहस एवं गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर ही अपनी कठिनाइयों पर थोड़ी-बहुत विजय प्राप्त कर पाता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : तृतीय भाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आ जाती है। वह अपने पराक्रम-विषयक कारणों से ही परेशानी उठाता है। ऐसा जातक बड़ा दम्मी, हिम्मती, हठी, बहादुर तथा साहसी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक घरेलू सुखों की पाने के लिए बड़ी चतुराई का आश्रय लेकर सफल होता है। भूमि तथा भवन का सुख भी कुछ कमी के साथ मिलता है। अपने गुप्त साहस एवं धैर्य के बल पर अन्त में उसे सुख-प्राप्ति में सफलता भी मिलती है।

२०६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष में भी कठिनाइयों के साथ ही सामान्य सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति अपने गुप्त धैर्य की शक्ति, चातुर्य तथा हिम्मत के बल पर ही विद्या के तथा अन्य क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपनी गुप्त युक्तियों द्वारा शत्रुओं का दमन करने में समर्थ होता है तथा मुकदमे आदि में सफलताएँ प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति अपनी आन्तरिक कमजोरी को छिपाने में कुशल होता है तथा बड़ी हिम्मत से काम लेकर लोगों को आश्चर्य में डाल देता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद सफलता प्राप्त होती है। उसके जीवन में इन्द्रिय- भोगों की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति कठिन परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर अत्यधिक उन्नति भी कर लेता है।

२०७ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पुरातत्त्व की हानि होती है तथा आयु के सम्बन्ध में भी अनेक बार संकटों का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी हिम्मत तथा बहादुरी के बल पर संकट के समय भी धैर्य को नहीं खोता। उसे पेट की कोई बीमारी भी हो सकती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कुछ बाधाएँ आती हैं, परन्तु परिश्रम द्वारा थोड़ी- बहुत सफलता भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति धर्म का पूर्ण पालन नहीं कर पाता। वह अपनी गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बल पर सभी क्षेत्रों में न्यूनाधिक सफलताएँ प्राप्त करता रहता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मान-प्रतिष्ठा की भी कभी-कभी बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बाद ही उसे सामान्य सफलता मिल पाती है।

२०८ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की आमदनी के क्षेत्र में कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। अपने धैर्य, साहस तथा परिश्रम से ही उसे अन्त में कठिनाइयों पर विजय तथा आमदनी के क्षेत्र में थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, जिसके कारण उसे कभी-कभी भारी संकटों का सामना करना पड़ता है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी उसे कुछ परेशानी बनी रहती है। परन्तु ऐसा जातक अपनी हिम्मत, गुप्त युक्ति, परिश्रम तथा चतुराई के बल पर येन-केन-प्रकारेण अपना खर्च चलाता रहता है।

है;" - is it a semicolon (;)? "मिष्टान्न-भोजी होता है; परन्तु इसके साथ ही" Yes, it is a semicolon (;) followed by "परन्तु".

Line 10: "अत्यन्त ढीठ, कुटिल-स्वभाव, मित्र-द्रोही तथा कभी-कभी विपरीत-बुद्धि का परिचय" "ढीठ" - ढ + ी + ठ. Correct. "कुटिल-स्वभाव" - hyphenated. "मित्र-द्रोही" - hyphenated. "कभी-कभी" - hyphenated. "विपरीत-बुद्धि" - hyphenated.

Line 11: "देने वाला भी होता है।"

Line 12: "इस लग्न वाला व्यक्ति अपने शत्रुओं से पीड़ित रहता है। उसके कन्या-" "कन्या-" - hyphen at end of line.

Line 13: "सन्तानें अधिक होती हैं तथा उसे अपना जन्म-स्थान छोड़कर परदेश में निवास करना" "जन्म-स्थान" - hyphenated.

Line 14: "पड़ता है।"

Line 15: "इस लग्न पाने जातक का भाग्योदय १६-१७ वर्ष की आयु में ही ही जाता है।"

Wait, what about the chart? Let's include the chart representation clearly between and . Everything looks solid and accurate.२०६ 'कर्क' लग्न ५ |

२१० 'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न दालों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ४४३ से ५५० के बीच देखना चाहिए। गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए। 'कर्क' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४४३ से ४५४ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में सूर्य— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४४३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४४४ (ग) 'मिथुन' राशि पर ही तो संख्या ४४५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४४६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४४७ (च) 'कन्या' राशि पर ही तो संख्या ४४८ (छ) 'तुला' राशि पर हो की संख्या ४४९ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४५० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४५१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४५२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर ही तो संख्या ४५३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४५४ 'कर्क' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४५५ से ४६६ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित

२११ 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४५५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४५६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ४५७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४५८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४५६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ४६० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४६१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४६२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४६३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४६४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४६५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४६६ 'कर्क' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मङ्गल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४६७ से ४७८ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मङ्गल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मङ्गल'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६७ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६८ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६६ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७० (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७१ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७२ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७४ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७५ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७७ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७८

२१२ 'कर्क' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४७६ से ४६० के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७६ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८० (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८१ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८२ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८३ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८४ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८६ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८७ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित तो हो संख्या ४८६ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६० 'कर्क' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४६१ से ५०२ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६१ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६२ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो यो संख्या ४६३ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६४ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६५ (ज) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६६

२१३ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६८ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६६ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०० (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०१ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०२ 'कर्क' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५०३ से ५१४ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०३ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०४ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०५ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०६ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०७ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०८ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१० (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५११ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१३ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१४ 'कर्क' लग्न में 'शनि' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५१५ से ५२६ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'

२१४ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१५ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१६ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१७ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१८ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१६ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२० (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२२ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२३ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२५ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२६ 'कर्क' लग्न में 'राहु' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५२७ से ५३८ के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२७ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२८ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२६ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३० (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३१ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३२ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३४ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३५ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३७ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३८

२१५ 'कर्क' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५३६ से ५५० के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३६ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४० (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४१ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४२ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४३ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४४ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४६ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४७ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४६ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५५० ● 'कर्क' लग्न में 'सूर्य' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : सूर्य प्रथमभाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, तेज तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। उसे धन तथा कुटुम्ब की शक्ति भी प्राप्त होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता है। ७४३

२१६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के धन, कुटुम्ब, यश तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु में कमी आती है तथा पुरातत्त्व एवं दैनिक चर्या में भी सामान्य कठिनाइयों का शिकार होना पड़ता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख कुछ त्रुटियों के साथ प्राप्त होता है। पराक्रम के द्वारा धन-वृद्धि भी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक पराक्रम द्वारा भाग्य की वृद्धि तथा धर्म का पालन करता है। उसका प्रभाव एवं सम्मान भी बढ़ता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थ भाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में शत्रु शुक्र की राशिस्थ नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक के माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी कम मिलता है। सातवीं उच्च दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता, यश तथा धन की प्राप्ति होती है।

२१७ 'कर्क' लग्न को कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के सन्तान-सुख में बाधा आती है, परन्तु एक सन्तान अत्यन्त प्रभावशालिनी होती है । विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त होती है तथा धन की वृद्धि की होती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है। ऐसा जातक स्पष्ट वक्ता तथा उग्र स्वभाव का होता है । ४४७ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव रखता है, परन्तु धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी रहती है । सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी सम्बन्धो से लाभ होता है तथा खर्च अधिक [

२१८ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : सूर्य सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की आयु पर कभी- कभी संकट आते रहते हैं तथा पुरातत्त्व के लाभ में भी कमी आती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के द्वितीयभाव के देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कमी रहती है तथा पेट में भी कोई रोग हो सकता है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन धनवानों जैसा होता है। ४५०

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का भाग्य प्रबल होता है। वह धर्म का पालन भी करता है तथा मान-प्रतिष्ठा भी पाता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति पराक्रमी, सुखी, स्वार्थी तथा परमार्थी होता है। ४५१

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में स्थित उच्च के सूर्य के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, प्रतिष्ठा तथा लाभ की प्राप्ति होती है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के साथ ही घरेलू सुख में भी कुछ कमियां बनी रहती हैं। ४५२

२१६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को धन का विशेष लाभ होता है, परन्तु कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या-बुद्धि में प्रवीणता तथा सन्तान- पक्ष से लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यशाली जीवन बिताता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से धन का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु खर्च की अधिकता रहती है। वह रईसी ढंग का जीवन बिताता है। धन तथा कौटुम्बिक सुख में कमी बनी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। 'कर्क' लग्न में 'चन्द्रमा' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में स्वराशि में स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को सौन्दर्य, स्वास्थ्य, अधिक शक्ति, यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति उच्च कोटि का विचारक तथा सुखी होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष में असन्तोषपूर्ण सुख प्राप्त होता है, परन्तु व्यवसाय के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिलती है।

२२० 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के साथ धन तथा कौटुम्बिक सुख पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु के विषय में परेशानियां आती हैं तथा पुरातत्त्व का लाभ कम होता है। ऐसा व्यक्ति शान-शौकत का जीवन बिताने वाला, प्रतिष्ठित या भाग्यशाली होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में अत्यन्त वृद्धि होती है। सातवीं मित्र दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की भी पर्याप्त उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक, दानी, उदार, ईश्वर-भक्त, धनी, उत्साही, पराक्रमी तथा पुरुषार्थी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में सामान्य-मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि भवन आदि का पर्याप्त सुख उपलब्ध होता है। उसका शरीर सुन्दर तथा मन कोमल होता है। सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में सफलता, सहयोग एवं यश की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक हर प्रकार से सम्पन्न एवं सुखी रहता है।

२२१ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित नीच के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाई से सफलता मिलती है। मन तथा शरीर भी दुर्बल रहता है। सातवीं उच्च दृष्टि से एकादशभाव को देखने से गुप्त मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों के बल पर आमदनी अच्छी बनी रहती है, परन्तु कुछ अशान्ति का अनुभव भी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में दुर्बलता रहती है और विनम्र बनकर काम निकालना पड़ता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से यश, सम्मान तथा धन प्राप्त होता है एवं खर्च की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति गौरवशाली तथा आत्मबली होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष में कुछ असन्तोष के बाद सफलता मिलती है तथा व्यवसाय पक्ष में भी कठिनाइयाँ आती हैं। ऐसा व्यक्ति भोगादि में अधिक रुचि रखता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, मनोबल तथा आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, विलासी, सुखी तथा सुन्दर होता है।

२२२ कर्क लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्कलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा पुरातत्त्व का लाभ असन्तोषजनक रहता है, परन्तु आयु की वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक अपने शारीरिक श्रम द्वारा धन-जन की वृद्धि करने में समर्थ होता है। ४६२ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्कलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को मन तथा शरीर की अच्छी शक्ति प्राप्त होती है, जिसके कारण वह अपने भाग्य की खूब उन्नति करता है तथा धर्म का पालन भी करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धर्मात्मा, सतोगुणी, ईश्वर-भक्त, यशस्वी तथा सज्जन होता है। ४६३ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्कलग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय पक्ष से प्रभाव, यश तथा लाभ प्राप्त होता है और वह किसी उच्च पद को प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति सुन्दर तथा शक्तिशाली होता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण जातक को भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है। ४६४

२२३ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव के जातक की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों एवं सौन्दर्य में वृद्धि होती है तथा आमदनी अच्छी रहती है। सातवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति अपने लाभ के लिए कटु शब्दों का प्रयोग करता पाया जाता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्पर्क से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में अपने शान्त स्वभाव के द्वारा प्रभाव-स्थापित करता है, परन्तु मन में कुछ अशान्ति भी बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति का शरीर दुबला-पतला होता है। 'कर्क' लग्न में मंगल 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी रहती है तथा पिता, राज्य, सन्तान एवं विद्या का पक्ष भी दुर्बल रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन का सुख मिलता है। सातवीं उच्च दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष में असन्तोष- पूर्ण वृद्धि होती है तथा व्यवसाय में कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि के अष्टम भाव को देखने से पुरातत्त्व तथा दैनिक जीवन में कमी रहती है।

२२४ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। राज्य तथा पिता से भी लाभ होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में पञ्चमभाव को देखने से विद्या तथा सन्तान की शक्ति मिलने पर भी कुछ कठिनाइयों का अनुभव होता रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्व के क्षेत्र में कमी आती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्य, यश तथा धर्म की वृद्धि होती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है। विद्या तथा सन्तान का लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक बुद्धि-बल से भाग्यशाली होता है तथा यश एवं धर्म का लाभ करता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। चौथी मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा विजय मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है। विद्या-बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। उच्च दृष्टि से सप्तम- भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय का अच्छा लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को देखने के राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सहयोग तथा यश का लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से धन की भी पर्याप्त आमदनी बनी रहती है।