भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२१६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के धन, कुटुम्ब, यश तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु में कमी आती है तथा पुरातत्त्व एवं दैनिक चर्या में भी सामान्य कठिनाइयों का शिकार होना पड़ता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख कुछ त्रुटियों के साथ प्राप्त होता है। पराक्रम के द्वारा धन-वृद्धि भी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक पराक्रम द्वारा भाग्य की वृद्धि तथा धर्म का पालन करता है। उसका प्रभाव एवं सम्मान भी बढ़ता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थ भाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में शत्रु शुक्र की राशिस्थ नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक के माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी कम मिलता है। सातवीं उच्च दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता, यश तथा धन की प्राप्ति होती है।