भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१५ 'कर्क' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५३६ से ५५० के बीच देखना चाहिए। २—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३६ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४० (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४१ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४२ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४३ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४४ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४६ (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४७ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४६ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५५० ● 'कर्क' लग्न में 'सूर्य' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : सूर्य प्रथमभाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, तेज तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। उसे धन तथा कुटुम्ब की शक्ति भी प्राप्त होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता है। ७४३