भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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२०७ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पुरातत्त्व की हानि होती है तथा आयु के सम्बन्ध में भी अनेक बार संकटों का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी हिम्मत तथा बहादुरी के बल पर संकट के समय भी धैर्य को नहीं खोता। उसे पेट की कोई बीमारी भी हो सकती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कुछ बाधाएँ आती हैं, परन्तु परिश्रम द्वारा थोड़ी- बहुत सफलता भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति धर्म का पूर्ण पालन नहीं कर पाता। वह अपनी गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बल पर सभी क्षेत्रों में न्यूनाधिक सफलताएँ प्राप्त करता रहता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मान-प्रतिष्ठा की भी कभी-कभी बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बाद ही उसे सामान्य सफलता मिल पाती है।