भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 638 में से

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२०६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष में भी कठिनाइयों के साथ ही सामान्य सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति अपने गुप्त धैर्य की शक्ति, चातुर्य तथा हिम्मत के बल पर ही विद्या के तथा अन्य क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपनी गुप्त युक्तियों द्वारा शत्रुओं का दमन करने में समर्थ होता है तथा मुकदमे आदि में सफलताएँ प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति अपनी आन्तरिक कमजोरी को छिपाने में कुशल होता है तथा बड़ी हिम्मत से काम लेकर लोगों को आश्चर्य में डाल देता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मिथुन लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद सफलता प्राप्त होती है। उसके जीवन में इन्द्रिय- भोगों की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति कठिन परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर अत्यधिक उन्नति भी कर लेता है।

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