भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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ग्रहों की वक्री तथा अतिचारी गति

सूर्य, चन्द्र, राहु तथा केतु—इनचार ग्रहों के अतिरिक्त शेष पांचों ग्रह—अर्थात् मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि—कभी-कभी वक्री अथवा अतिचारी हो जाते हैं। ग्रह के राशियों में क्रमशः परिभ्रमण को 'मार्गी', शीघ्रतापूर्वक परिभ्रमण को 'अतिचारी' तथा अगली राशि की ओर बढ़ने की बजाय पीछे की राशि में लौट पड़ने को 'वक्री' गति कहा जाता है। अतिचारी तथा वक्री ग्रह एक राशि पर अपने भ्रमण को निश्चित अवधि में पूरा करने की बजाय कुछ आगे पीछे भी हो जाते हैं। आकाश-मण्डल में किस समय कौनसा ग्रह मार्गी, वक्री अथवा अतिचारी चल रहा है, इसका ज्ञान पंचांग देखकर हो सकता है। जातक के जन्म के समय जो ग्रह आकाश-मण्डल में जिस गति से भ्रमण कर रहा होता है उसका वैसा ही प्रभाव जातक के ऊपर जीवन भर पड़ता रहता है।

ग्रहों की नैसर्गिक-मैत्री

कौनसा ग्रह किस ग्रह का मित्र, सम अथवा शत्रु है, इसे नीचे प्रदर्शित 'निसर्ग मैत्री चक्र' में देख कर समझ लेना चाहिए—

निसर्ग मैत्री चक्र

सम्बन्ध का स्वरूपग्रहों के नाम
सूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
मित्रचन्द्र<br>मंगल<br>बुधसूर्य<br>बुधसूर्य<br>चन्द्र<br>गुरुसूर्य<br>शुक्रसूर्य<br>चन्द्र<br>मंगलबुध<br>शनिबुध<br>शुक्र
समबुधमंगल<br>बुध<br>शुक्र<br>शनि<br>बुधशुक्र<br>शनिमंगल<br>गुरु<br>शनिशनिमंगल<br>गुरुबुध
शत्रुशुक्र<br>शनिबुधचन्द्रशुक्र<br>बुधसूर्य<br>चन्द्रसूर्य<br>चन्द्र<br>मंगल
टिप्पणी (१)—कुछ विद्वानों के मतानुसार चन्द्रमा गुरु से शत्रुता मानते हैं।